कविता: 'अधिकार' (मूल पाठ)

वे मुस्काते फूल, नहीं- जिनको आता है मुरझाना, वे तारों के दीप, नहीं- जिनको भाता है बुझ जाना; वे नीलम से मेघ, नहीं- जिनको है घुल जाने की चाह, वह अनन्त ऋतुराज, नहीं- जिसने देखी जाने की राह !

वे सूने से नयन, नहीं- जिनमें बनते आँसू-मोती; वह प्राणों की सेज, नहीं- जिनमें बेसुध पीड़ा सोती; ऐसा तेरा लोक, वेदना नहीं, नहीं जिसमें अवसाद, जलना जाना नहीं, नहीं- जिसने जाना मिटने का स्वाद !

क्या अमरों का लोक मिलेगा ? तेरी करुणा का उपहार ? रहने दो हे देव! अरे यह मेरा मिटने का अधिकार !

कठिन शब्दार्थ

शब्द अर्थ
भाना अच्छा लगना
ऋतुराज वसंत ऋतु
अनंत जिसका अंत न हो
सेज शय्या (बिस्तर)
अवसाद दुःख
उपहार भेंट
नीलम से मेघ नीले रत्न के समान बादल
बेसुध अचेत, गहरी

भावार्थ (पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या)

प्रथम अंतरा: कवयित्री कहती हैं कि वे उन मुस्काते फूलों की बात नहीं कर रहीं जिन्हें मुरझाना नहीं आता, न ही उन तारों के दीपकों की जिन्हें बुझ जाना अच्छा नहीं लगता। वे उन नीले रत्न-जैसे बादलों की भी बात नहीं करतीं जिन्हें घुल जाने (बरस कर विलीन होने) की चाह नहीं है, और न ही उस अनंत वसंत ऋतु की जिसने जाने (समाप्त होने) की राह कभी नहीं देखी। अर्थात् कवयित्री उन चीज़ों को महत्व नहीं देतीं जो स्थायी और अपरिवर्तनशील मानी जाती हैं — क्योंकि सच्चा सौंदर्य नश्वरता (परिवर्तनशीलता) में ही है।

द्वितीय अंतरा: इसी प्रकार वे उन सूनी आँखों की बात नहीं करतीं जिनमें आँसू-रूपी मोती नहीं बनते, न ही प्राणों की उस सेज की जिसमें अचेत पीड़ा नहीं सोती। हे वेदना! तेरा लोक ऐसा नहीं है जिसमें दुःख न हो, जलना (तपना) न हो — क्योंकि जिसने मिटने का स्वाद कभी नहीं चखा, वह जीवन के सच्चे अर्थ को कभी नहीं जान सकता। यहाँ कवयित्री वेदना को संबोधित करते हुए बताती हैं कि वेदना का सच्चा स्वरूप दुःख और नश्वरता में ही निहित है।

तृतीय अंतरा (अंतिम): कवयित्री परमात्मा (देव) से पूछती हैं — क्या मुझे अमरों का लोक (अमरत्व) प्राप्त होगा? क्या यह तेरी करुणा का उपहार होगा? किन्तु वे स्वयं ही उत्तर देती हुई कहती हैं — हे देव! इसे रहने दो, मुझे यह उपहार नहीं चाहिए। यह मेरा 'मिटने का अधिकार' है — अर्थात् नश्वर होना, परिवर्तनशील होना और वेदना का अनुभव करना ही जीवन का सच्चा सौंदर्य है, और कवयित्री इसी अधिकार को बचाए रखना चाहती हैं।

अलंकार एवं काव्य-सौंदर्य

आवृत्ति/पुनरुक्ति की शैली: पूरी कविता में 'वे…नहीं' और 'जिनको/जिनमें' की संरचना बार-बार दोहराई गई है — यह शैलीगत आवृत्ति कविता को एक लयबद्ध, मंत्रोच्चार जैसा प्रभाव देती है और नकारात्मक कथन के माध्यम से सकारात्मक भाव (नश्वरता का महत्व) को उभारती है।

रूपक अलंकार: 'प्राणों की सेज' में प्राणों की तुलना शय्या से की गई है, जिस पर पीड़ा 'सोती' है — यह मानवीकरण एवं रूपक का सुंदर संगम है। 'तारों के दीप' में तारों को दीपक के रूप में चित्रित किया गया है।

उपमा अलंकार: 'नीलम से मेघ' में बादलों की तुलना नीलम रत्न से की गई है।

मानवीकरण अलंकार: पीड़ा का 'सोना', आँसुओं का 'मोती' बनना, वेदना को सीधे संबोधित करना ('तेरा लोक') — इन सभी में निर्जीव/अमूर्त भावों को सजीव रूप में चित्रित किया गया है।

विरोधाभास अलंकार: कवयित्री का अमरता को अस्वीकार कर नश्वरता (मिटने) को अपना 'अधिकार' मानना एक गहरा विरोधाभास प्रस्तुत करता है — सामान्यतः मनुष्य अमरता चाहता है, किंतु यहाँ कवयित्री उसका उल्टा चाहती हैं।

रस: इस कविता में करुण रस प्रधान है, साथ ही जीवन-दर्शन की गंभीरता के कारण शांत रस की भी अनुभूति होती है — यह छायावाद की विशिष्ट शैली है जिसमें वेदना को सौंदर्यबोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।