कविता: 'भारत की धरती' (मूल पाठ — प्रांतवार)
ध्रुव पंक्ति (टेक): भारत माता की धरती, वीरों, सन्तों की धरती है। राम-कृष्ण की जन्मभूमि, मन में मुद-मंगल भरती है॥
उत्तर प्रदेश: उत्तर में उत्तर प्रदेश, काशी, प्रयाग, हरिद्वार जहाँ। मलिक मुहम्मद के, कबीर के, तुलसी के उद्गार जहाँ। बद्रीनाथ, केदारनाथ-से, तीर्थों का यह स्थल पावन माखन भोग लगाने वाला, कृष्ण कन्हैया मनभावन॥ यही भूमि रावण-कंसों के दर्प-दलन भी करती है…
पंजाब: मस्तक ऊँचा किए हिमालय, जिसके बल पर खड़ा हुआ। यह पंजाब केसरी है, अपने ही बल पर अड़ा हुआ॥ रण में तेग बहादुर जिसका बच्चा-बच्चा वीर है। भजनभाव में गुरु नानक की वाणी जैसा धीर है॥ जिस धरती की गर्जन से, जगती की गर्जन डरती है…
हरियाणा: वेद और उपनिषद् ज्ञान गीता का तत्व प्रदाता है। सरस्वती सरिता तट वैदिक मन्त्रों का उद्गाता है॥ हरित-भरित हरियाणा, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर का स्थल है। धर्म-कर्म-संस्कृति-सभ्यता, बल-पौरुष का सम्बल है॥ इन्द्रप्रस्थ के सम्मुख इन्द्रपुरी भी पानी भरती है…
राजस्थान: राजस्थान चलो तो सुन लो, राणा की हुंकार यहाँ। हल्दी घाटी की चट्टानों पर खनकी तलवार जहाँ, स्वाभिमान से ऊँचे मस्तक, झुके नहीं, कट सकते हैं। युद्धक्षेत्र में, गोरा-बादल, कट कर भी डट सकते हैं॥ जहाँ वीरता, 'सेनाणी' 'जौहर' की कीर्ति निखरती है…
बिहार: यह बिहार की भूमि, जहाँ पितरों का तर्पण होता है। जे-पी के इंगित से दस्यु-आत्म-समर्पण होता है॥ विश्वगुरु कहलाने वाले, नालन्दा-वैशाली हैं। गौतम, महावीर ने अपनी परम्पराएँ पाली हैं॥ शान्त-क्रान्त दृष्टा प्रदेश, नूतनता नित्य उभरती है…
दक्षिण भारत: दक्षिण चरण पखारे रत्नाकर रत्नों की खान है। तमिलनाडु में कम्ब दे रहा रामायण का ज्ञान है॥ केरल, आन्ध्रप्रदेश, सभ्यता, संस्कृति, धर्म विधायक हैं। महाराष्ट्र मरहठे शिवाजी के कृत्यों के गायक हैं॥ कर्नाटक की मलयज शीतल मन्द सुगन्ध विचरती है…
कर्नाटक (प्रथम): क्रीड़ास्थली प्रकृति की कर्नाटक गौरव की गाथा है। भारत का सौभाग्य, विश्व भर का यह उन्नत माथा है॥ टीपू सुलतान, विश्व ने जिनकी शक्ति मानी है। रानी चेन्नम्मा के बलिदानों की एक कहानी है॥ भारतीयता कन्नड नाडू में बहु रूप संवरती है…
कर्नाटक (द्वितीय): परम पुनीत नीर कावेरी, मस्तक धर कर्नाटक में। पम्प महाकवि के दर्शन, कर लो चलकर कर्नाटक में॥ बसवेश्वर या अक्कमहादेवी कर्नाटक में गाते। रामानुज आचार्य 'मेलकोटे' में दर्शन दे जाते॥ धर्म-कर्म साहित्य-कला, संस्कृति का यह अनुवरत है…
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मुद-मंगल | प्रसन्नता, खुशी |
| पावन | पवित्र |
| मनभावन | मन को अच्छा लगने वाला |
| दर्प-दलन | घमंड/अभिमान का नाश करना |
| जगती | संसार |
| सम्बल | सहारा |
| पितर | परलोकवासी, पूर्वज |
| दस्यु | डाकू, लुटेरा |
| अनुवरत | अनुसरण करने वाला, पालन करने वाला |
| रत्नाकर | समुद्र |
| मलयज | चंदन/दक्षिणी पवन |
भावार्थ (प्रांतवार व्याख्या)
टेक: भारत माता की धरती वीरों और संतों की धरती है — यह राम और कृष्ण की जन्मभूमि होने के कारण मन में प्रसन्नता और मंगल-भाव भर देती है।
उत्तर प्रदेश: यहाँ काशी, प्रयाग, हरिद्वार जैसे पावन तीर्थ हैं; मलिक मुहम्मद जायसी, कबीर और तुलसीदास जैसे महान कवियों के उद्गार-स्थल यहीं हैं। बद्रीनाथ-केदारनाथ जैसे तीर्थ यहीं पावन स्थल हैं। यह कृष्ण कन्हैया की लीला-भूमि भी है, और इसी भूमि ने रावण-कंस जैसे दुष्टों के अभिमान का नाश भी किया।
पंजाब: हिमालय जिसके बल पर मस्तक ऊँचा किए खड़ा है, ऐसा 'पंजाब केसरी' अपने बल पर अड़ा हुआ है। यहाँ का बच्चा-बच्चा तेग बहादुर जैसा वीर है, और गुरु नानक की वाणी जैसा धीरजवान है। इस धरती की गर्जना से संसार भी डरता है।
हरियाणा: यह वेद-उपनिषद और गीता के ज्ञान की भूमि है, सरस्वती नदी तट पर वैदिक मंत्रों का उद्गम-स्थल है। हरा-भरा हरियाणा अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर की कर्मभूमि है, जहाँ धर्म-कर्म-संस्कृति-सभ्यता और बल-पौरुष का सहारा है। इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) के सामने स्वर्ग की इंद्रपुरी भी नतमस्तक होकर जल भरती प्रतीत होती है।
राजस्थान: यहाँ महाराणा प्रताप की हुंकार सुनाई देती है, हल्दीघाटी की चट्टानों पर तलवारें खनकी थीं। यहाँ के स्वाभिमानी लोग सिर झुकाने के बजाय कट जाना पसंद करते हैं। गोरा-बादल जैसे वीर युद्धक्षेत्र में कटकर भी डटे रहते थे। यहाँ की सेनानी और जौहर की वीर-गाथाएँ प्रसिद्ध हैं।
बिहार: यह वह भूमि है जहाँ पितरों का तर्पण (गया में) होता है, और जे.पी. (जयप्रकाश नारायण) के आह्वान पर डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया। नालंदा-वैशाली विश्वगुरु के रूप में प्रसिद्ध हैं; गौतम बुद्ध और महावीर ने यहीं अपनी परंपराएँ स्थापित कीं।
दक्षिण भारत: समुद्र दक्षिण के चरण पखारता है और रत्नों की खान है। तमिलनाडु में कम्ब कवि रामायण का ज्ञान देते हैं; केरल-आंध्रप्रदेश सभ्यता-संस्कृति-धर्म के विधायक हैं; महाराष्ट्र में शिवाजी के शौर्य के गीत गाए जाते हैं; कर्नाटक की शीतल-मंद सुगंध सर्वत्र फैलती है।
कर्नाटक: प्रकृति की क्रीड़ास्थली कर्नाटक भारत का सौभाग्य और विश्व का उन्नत माथा है। टीपू सुलतान की शक्ति को विश्व ने माना; रानी चेन्नम्मा के बलिदानों की गाथाएँ प्रसिद्ध हैं। कावेरी का पुनीत जल कर्नाटक के मस्तक पर सुशोभित है; पम्प महाकवि, बसवेश्वर, अक्कमहादेवी तथा मेलकोटे में रामानुज आचार्य के दर्शन कर्नाटक की धर्म-कर्म-साहित्य-कला-संस्कृति की समृद्ध और सतत परंपरा को दर्शाते हैं।
अलंकार एवं काव्य-सौंदर्य
पुनरुक्ति/टेक (ध्रुव पंक्ति): 'भारत माता की धरती, वीरों, सन्तों की धरती है' पंक्ति प्रत्येक प्रांत-वर्णन के बाद दोहराई गई है, जो कविता को एक सूत्र में बाँधती है और राष्ट्रीय एकता का भाव सुदृढ़ करती है।
रूपक अलंकार: 'यह पंजाब केसरी है' में पंजाब की तुलना सिंह (केसरी) से सीधे की गई है।
मानवीकरण अलंकार: 'इन्द्रप्रस्थ के सम्मुख इन्द्रपुरी भी पानी भरती है' और 'दक्षिण चरण पखारे रत्नाकर' में समुद्र व स्वर्गपुरी का मानवीकरण किया गया है।
अनुप्रास अलंकार: 'धर्म-कर्म-संस्कृति-सभ्यता' तथा 'हरित-भरित हरियाणा' में समान ध्वनियों की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार बनता है।
ऐतिहासिक/पौराणिक संदर्भ: प्रत्येक प्रांत के वर्णन में ऐतिहासिक व्यक्तित्वों (तेग बहादुर, महाराणा प्रताप, टीपू सुलतान, शिवाजी) एवं पौराणिक चरित्रों (राम-कृष्ण, अर्जुन-भीम-युधिष्ठिर) का उल्लेख कविता को गौरवशाली बनाता है।
रस एवं गुण: इस कविता में वीर रस एवं ओज गुण प्रधान है, साथ ही राष्ट्रभक्ति की भावना के कारण इसे देशभक्ति काव्य की श्रेणी में रखा जाता है।