लेखक परिचय: डॉ. भीष्म साहनी
भीष्म साहनी प्रगतिशील कहानीकार हैं। इनका जन्म १९१५ ई. में रावलपिंडी में हुआ था। लाहौर से अंग्रेज़ी में एम.ए. करने के पश्चात इन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। ये दिल्ली कॉलेज में अंग्रेज़ी के वरिष्ठ प्रवक्ता के पद पर कार्यरत रहे।
इनकी विचार-दृष्टि राष्ट्रीय एवं समाजपरक थी। मध्यमवर्गीय परिवारों की समस्याओं और विसंगतियों को इन्होंने प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है। यांत्रिक जीवन का तनाव, व्यक्ति की स्वार्थ-भावना, विभाजन की पीड़ा, राजनैतिक जीवन तथा भ्रष्टाचार इनकी कहानियों के प्रमुख विषय बने। इनका निधन ११ जुलाई २००३ ई. को हुआ।
प्रमुख रचनाएँ: उपन्यास — 'बसन्ती', 'तमस' (साहित्य अकादमी पुरस्कार, १९७५); कहानी-संकलन — 'पहला पाठ', 'भाग्य रेखा', 'मेरी प्रिय कहानियाँ' आदि।
पाठ का परिचय एवं उद्देश्य
प्रस्तुत कहानी में वृद्धों की समस्याएँ, समाज का दिखावापन तथा मनुष्य की उधेड़बुन का मार्मिक चित्रण किया गया है। शामनाथ के घर होने वाली 'चीफ़ की दावत' में जो घटनाएँ घटती हैं, उनसे यह विडंबना उजागर होती है कि जिस माँ को पार्टी के लिए बाधा समझा जा रहा था, अंततः उसी के कारण शामनाथ को तरक्की मिलने की सम्भावना बनती है।
बुजुर्गों के प्रति आदर-भाव रखने तथा माँ की ममता का परिचय देने के उद्देश्य से इस कहानी का चयन किया गया है।
कहानी का सार भाग 1: दावत की तैयारी और माँ की समस्या
मिस्टर शामनाथ के घर आज उनके दफ्तर के 'चीफ़' (अमरीकी अफसर) की दावत है। शाम पाँच बजते-बजते तैयारी लगभग पूरी हो जाती है — कुर्सियाँ, मेज, नैपकिन बरामदे में सजाए जाते हैं, ड्रिंक का इंतज़ाम बैठक में होता है, घर का 'फालतू सामान' छिपाया जाता है। तभी शामनाथ को एक बड़ी समस्या याद आती है — माँ का क्या होगा?
पत्नी सुझाव देती है कि माँ को पिछवाड़े उसकी सहेली के घर भेज दिया जाए, पर शामनाथ इसे अस्वीकार करते हैं क्योंकि 'उस बुढ़िया का आना-जाना' पड़ोस में उन्होंने बड़ी मुश्किल से बंद कराया था। अंततः तय होता है कि माँ जल्दी खाना खाकर अपनी कोठरी में चली जाएँ, ताकि मेहमानों के आने (साढ़े सात बजे) से पहले वे नज़रों से दूर हो जाएँ। पत्नी को चिंता होती है कि माँ सो गईं और खर्राटे लेने लगीं तो क्या होगा — क्योंकि माँ की कोठरी का दरवाज़ा उसी बरामदे में खुलता है जहाँ खाना परोसा जाएगा।
कहानी का सार भाग 2: माँ को दी गई हिदायतें
शामनाथ माँ के पास जाकर उन्हें कई हिदायतें देते हैं — जल्दी खाना खा लेना, गुसलखाने के रास्ते होकर ही आना-जाना करना, खर्राटे न लेना, नंगे पाँव या खड़ाऊँ पहनकर सामने न आना। माँ, जो बीमारी के बाद नाक से साँस नहीं ले पातीं, विवश होकर 'अच्छा बेटा' कहती रहती हैं। शामनाथ माँ को सफेद कमीज-शलवार पहनने को कहते हैं और चूड़ियाँ पहनने का सुझाव भी देते हैं। माँ बताती हैं कि उनके सारे गहने बेटे की पढ़ाई में बिक गए थे — यह सुनकर शामनाथ को बुरा लगता है, वे तिनककर जवाब देते हैं। माँ अपनी अनपढ़ता का हवाला देकर मेहमानों से बातचीत से बचने की कोशिश करती हैं, पर शामनाथ उन्हें ठीक तरह से जवाब देने की हिदायत देकर तैयार होने चले जाते हैं।
कहानी का सार भाग 3: पार्टी और माँ का अपमान
पार्टी शुरू होती है और शराब के दौर के साथ माहौल जमने लगता है। साहब (चीफ़) को व्हिस्की, उनकी पत्नी (मेमसाहब) को घर की सजावट पसंद आती है। साढ़े दस बजे जब मेहमान खाना खाने बरामदे की ओर बढ़ते हैं, तो शामनाथ ठिठक जाते हैं — माँ कुर्सी पर पाँव ऊपर चढ़ाए, सिर झुलाते हुए गहरी नींद में खर्राटे ले रही होती हैं। कुछ स्त्रियाँ हँस पड़ती हैं, पर चीफ़ सहानुभूतिपूर्वक कहते हैं — 'पूअर डियर!' माँ घबराकर उठती हैं, ठीक से नमस्ते भी नहीं कर पातीं और भूल से बायाँ हाथ मिला बैठती हैं, जिससे और हँसी होती है। चीफ़ माँ से 'हाउ डू यू डू' कहलवाते हैं और वातावरण फिर से सहज हो जाता है।
कहानी का सार भाग 4: गीत, फुलकारी और अंतिम मोड़
शामनाथ के अनुरोध पर माँ काँपती आवाज़ में एक पुराना विवाह-गीत गाती हैं, जिस पर बरामदा तालियों से गूँज उठता है — शामनाथ की खीझ प्रसन्नता और गर्व में बदल जाती है। चीफ़ पंजाब की दस्तकारी के बारे में पूछते हैं और माँ की पुरानी फुलकारी देखकर बहुत रुचि दिखाते हैं। शामनाथ वादा कर देते हैं कि माँ नई फुलकारी बनाकर देंगी, यद्यपि माँ धीरे से कहती हैं कि अब उनकी नज़र कमज़ोर हो गई है।
मेहमानों के जाने के बाद माँ अपनी कोठरी में जाकर फूट-फूट कर रोती हैं। आधी रात को शामनाथ झूमते हुए आकर माँ को गले लगाते हैं और खुशी जताते हैं कि साहब बहुत प्रसन्न हुआ। माँ भावुक होकर बेटे से हरिद्वार भेजने का अनुरोध करती हैं, पर जब शामनाथ बताते हैं कि फुलकारी बनाने से उन्हें बड़ी नौकरी और तरक्की मिल सकती है, तो माँ तुरंत मान जाती हैं और मन-ही-मन बेटे के उज्ज्वल भविष्य की कामना करने लगती हैं। कहानी बुजुर्गों की उपेक्षा और स्वार्थपरता के बीच माँ की निश्छल ममता को मार्मिक ढंग से उभारती है।