कविता: 'गहने' (मूल पाठ)
सोने के गहने क्योंकर, माँ ? तकलीफ देते हैं, नहीं चाहिए, माँ ! रंगीन कपड़े क्योंकर, माँ ? मिट्टी में खेलने नहीं देते, माँ !
ताकि दिखाई दो सुंदर, बहुत ही सुंदर-यों कहती हो सुंदर लगे किसको, कहो माँ ? देखनेवालों को लगता है सुंदर, देता है आनंद ; मगर मुझे बनता है बड़ा बंधन !
मेरा यह बचपन, तुम्हारा मातृत्व ये ही गहने हैं मेरे लिए, माँ; मैं तुम्हारा गहना; तुम मेरा गहना; फिर अन्य गहने क्यों चाहिए, माँ ?
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तकलीफ | कष्ट |
| बंधन | रुकावट |
| मातृत्व | माँ होने का भाव/गुण |
| निश्छल | निष्कपट, सरल |
भावार्थ (पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या)
प्रथम अंतरा: बेटी माँ से पूछती है कि उसे सोने के गहने क्यों चाहिए? वह कहती है कि ये गहने उसे तकलीफ (कष्ट) देते हैं, इसलिए उसे नहीं चाहिए। इसी प्रकार वह रंगीन कपड़ों को भी अस्वीकार करती है क्योंकि वे उसे मिट्टी में खेलने की स्वतंत्रता नहीं देते — अर्थात् बच्ची अपने स्वाभाविक बचपन और खेल-कूद की आज़ादी को भौतिक साज-सज्जा से अधिक महत्व देती है।
द्वितीय अंतरा: जब माँ कहती है कि इन गहनों और कपड़ों से बेटी बहुत सुंदर दिखाई देगी, तो बेटी एक गहरा प्रश्न पूछती है — यह सुंदरता आखिर किसके लिए है? वह स्वयं उत्तर देती है कि यह सुंदरता तो देखने वालों को अच्छी लगती है और उन्हें आनंद देती है, परन्तु उसके लिए (बेटी के लिए) यह एक बड़ा बंधन बन जाती है। यहाँ कविता समाज द्वारा थोपी गई कृत्रिम सुंदरता की अवधारणा पर एक मार्मिक प्रश्नचिह्न लगाती है — क्या श्रृंगार वास्तव में बच्चे के लिए है, या केवल दूसरों को दिखाने के लिए?
तृतीय अंतरा (अंतिम): बेटी अंत में अत्यंत भावुक होकर कहती है कि उसका अपना बचपन और माँ का मातृत्व (माँ का स्नेह और ममता) ही उसके लिए वास्तविक गहने हैं। वह कहती है — "मैं तुम्हारा गहना हूँ, तुम मेरा गहना हो" — अर्थात् माँ-बेटी का पारस्परिक प्रेम और अटूट बंधन ही सबसे बड़ा और सच्चा आभूषण है। फिर किसी अन्य भौतिक गहने की क्या आवश्यकता है?
अलंकार एवं काव्य-सौंदर्य
संवाद शैली: पूरी कविता माँ-बेटी के बीच एक सहज संवाद के रूप में रची गई है, जो इसे अत्यंत जीवंत एवं मार्मिक बनाती है।
रूपक अलंकार: "मैं तुम्हारा गहना; तुम मेरा गहना" में बच्ची और माँ के पारस्परिक स्नेह को सीधे 'गहना' कहकर रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है — यहाँ भौतिक आभूषण की तुलना भावनात्मक बंधन से की गई है, जो कविता की केंद्रीय उक्ति है।
प्रश्नोत्तर शैली/वक्रोक्ति: कविता में बार-बार प्रश्न पूछकर ('क्योंकर माँ?', 'सुंदर लगे किसको?') पाठक को गहराई से सोचने पर विवश किया गया है।
प्रतीकात्मकता: 'गहने' और 'बंधन' शब्द यहाँ प्रतीक बन जाते हैं — भौतिक आभूषण बंधन (रुकावट) का प्रतीक है, जबकि माँ-बेटी का प्रेम स्वतंत्रता एवं सच्चे सौंदर्य का प्रतीक है।
रस: इस कविता में वात्सल्य रस प्रधान है — माँ-बेटी के स्नेह-भाव का सुंदर चित्रण हुआ है। साथ ही बालसुलभ निश्छलता के कारण एक कोमल, सरल भाव-सौंदर्य भी विद्यमान है।