लेखिका परिचय: ममता कालिया
ममता कालिया का जन्म 2 नवम्बर 1940 ई. को वृंदावन में हुआ। इन्होंने अपने पिता श्री विद्याभूषण अग्रवाल से साहित्य-सृजन की प्रेरणा पाई। इनकी शिक्षा नागपुर, मुम्बई, पुणे, इन्दौर और दिल्ली में हुई। 1963 ई. में दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। दिल्ली के दौलतराम कॉलेज में प्राध्यापिका रहीं, तत्पश्चात एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका नियुक्त हुईं। बाद में इलाहाबाद के महिला सेवा सदन कॉलेज में प्राचार्या के पद पर कार्यरत रहीं। 2001 ई. में सेवानिवृत्त होने के बाद पाँच वर्ष तक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की अंग्रेज़ी पत्रिका 'हिन्दी' की संपादिका रहीं।
इन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का 'यशपाल स्मृति सम्मान', 'साहित्य भूषण', 'सीता स्मृति सम्मान' तथा 'लमही कथा सम्मान' शामिल हैं।
प्रमुख रचनाएँ: कहानी-संग्रह — 'छुटकारा', 'जांच अभी जारी है', 'सीट नंबर छः', 'प्रतिदिन'; उपन्यास — 'नरक दर नरक', 'दौड़', 'बेघर', 'अंधेरे का ताला'; संस्मरण — 'कितने शहरों में कितनी बार'।
पाठ का परिचय एवं उद्देश्य
प्रस्तुत यात्रा-वृत्तांत में जापान के तोक्यो विश्वविद्यालय में सम्पन्न विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान मिले अनुभवों एवं प्रसंगों को लेखिका ने रोचक ढंग से चित्रित किया है। इसमें जापान के जनजीवन, संस्कृति, जापानियों की कर्तव्य-निष्ठता, शालीनता तथा हिन्दी भाषा के प्रति उनके प्रेम की चर्चा है। लेखिका ने जापान के 'तोदायजी मंदिर' का भी सुंदर वर्णन किया है।
जापान में हुई तकनीकी प्रगति तथा जापानियों की कर्मनिष्ठता का परिचय देने के उद्देश्य से इस पाठ का चयन किया गया है।
यात्रा-सार भाग 1: तोक्यो की ओर प्रस्थान
तोक्यो विश्वविद्यालय में आयोजित सम्मेलन तथा ओसाका विश्वविद्यालय के 2010 ई. के अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने छह सदस्यों का प्रतिनिधिमंडल 24 अक्टूबर, 2010 ई. को इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय विमानस्थल टर्मिनल तीन से रवाना हुआ। नरीता एयरपोर्ट पर उतरने के बाद तोक्यो विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि वैन लेकर आए और 100 किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर वे तोक्यो के निशिकासाइ स्थित सनपेटियो होटल पहुँचे। वहाँ की सड़कें और होटल एकदम प्रदूषणरहित तथा शांत थे। अतिथि-प्रोफेसर सुरेश ऋतुपर्ण उन्हें निकट के भारतीय रेस्तराँ 'कलकत्ता' ले गए, जहाँ स्वादिष्ट भारतीय भोजन, गर्म पानी तथा मसाला चाय की परंपरा ने उन्हें जापान में एक छोटा-सा भारत महसूस कराया।
यात्रा-सार भाग 2: रेल-यात्रा और जापानी अनुशासन
तोक्यो विश्वविद्यालय जाने के लिए प्रतिनिधिमंडल ने रेल का प्रयोग किया। जापान में हर क़दम पर रेलवे स्टेशन हैं, और सुरेश ऋतुपर्ण उन्हें कभी ज़मीन के नीचे तो कभी ऊपर ले जाते रहे। रेल में अनुशासन अद्भुत था — प्लेटफॉर्म पर खिंची लाल लकीरों के अनुसार यात्री खड़े होते, बिना धक्का-मुक्की किए चढ़ते-उतरते। रेल में 'सौजन्य स्थान' (Courtesy Seats) आरक्षित थे, जिन पर चित्रों द्वारा बताया गया था कि वे व्हीलचेयर-उपयोगकर्ताओं, बच्चों वाली स्त्रियों, वृद्धों, बोझ ढोने वालों और रोगियों के लिए हैं — भारत की तरह अलग-अलग वर्गीकरण के बजाय एक समावेशी व्यवस्था। लेखिका ने जापानियों की शालीनता, कम-से-कम शब्दों के प्रयोग तथा शांत, सौम्य चेहरों पर टिप्पणी की, जिन्हें उन्होंने गौतम बुद्ध के बोधित्व से जोड़ा।
यात्रा-सार भाग 3: टफ्स विश्वविद्यालय और पुस्तकालय
तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ़ फॉरेन स्टडीज़ (टफ्स) के सभागार में जापानी छात्र हिन्दी में बातचीत करने का प्रयास कर रहे थे। निदेशक प्रोफेसर फुजिई ताकेशी से मुलाकात हुई, जो लेखिका की ही तरह दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज के छात्र रह चुके थे। टफ्स में लगभग 50 विदेशी भाषाओं के अध्ययन की सुविधा है, और यहाँ हिन्दी-उर्दू शिक्षण की एक शताब्दी बीत चुकी है। पुस्तकालय की चार मंज़िलों में कुल 6,18,615 पुस्तकें थीं, जो विद्युतचालित आलमारियों में सुरक्षित रखी गई थीं। यहाँ लेखिका ने 1805 ई. में प्रकाशित दुर्लभ ग्रंथ 'सिंहासन बत्तीसी' तथा फीजी के प्रथम हिन्दी उपन्यास 'डउका पुरान' जैसी अनमोल पुस्तकें देखीं।
यात्रा-सार भाग 4: तोक्यो की शाम और बुलेट ट्रेन से ओसाका यात्रा
शाम को सुरेश ऋतुपर्ण ने उन्हें विभिन्न रेलों में घुमाया, जहाँ स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी की प्रतिकृति भी देखने को मिली। जापान में भूकंप-प्रवण होने के बावजूद गगनचुम्बी इमारतें भूकंप के धक्के सहने के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन की गई हैं। महँगाई और मुद्रा-विनिमय की समस्या का सामना करते हुए उन्होंने 100 येन की दुकान से खरीदारी की, जहाँ रवि ने कई शू-हॉर्न खरीद डाले।
तोक्यो से ओसाका जाने के लिए उन्होंने जापान की सबसे तेज़ रेल 'शिन्कान्सेन' (बुलेट ट्रेन) पकड़ी — 16 डिब्बों की यह रेल 1300 यात्रियों को ले जा सकती है और 170 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलती है। रास्ते में उन्होंने हिमाच्छादित फूजी पर्वत का विहंगम दृश्य देखा, जिसके विषय में मान्यता है कि उससे मनोकामना माँगने पर वह पूरी होती है।
यात्रा-सार भाग 5: ओसाका का किला और सांस्कृतिक संध्या
ओसाका पहुँचने पर प्रोफेसर अकिरा ताकाहाशि और हर्जेन्द्र चौधरी ने उनका स्वागत किया। उन्होंने ओसाका जो (किला) देखा, जो 1585 ई. में सम्राट तोयोतोमी हिदेयोशी ने बनवाया था — यह किला जापानी संघर्षधर्मिता और जिजीविषा का प्रतीक है, जो कई बार आग और बिजली गिरने से नष्ट होकर पुनर्निर्मित हुआ। किले के प्रांगण में उन्होंने जुड़वाँ शिशु और एक फटेहाल व्यक्ति को घड़ियाल के बच्चे के साथ बैठा देखा, जिस दृश्य ने लेखिका को गहराई से छू लिया।
रात्रि में हर्जेन्द्र चौधरी के घर हिन्दी-उर्दू प्रेमियों का जमावड़ा हुआ, जहाँ उनकी नई कहानी-संग्रह का लोकार्पण हुआ। वहाँ जापानी विद्वान प्रो. यामाने यो से मुलाकात हुई, जो प्रवाहपूर्ण उर्दू बोलते थे — यह देखकर लेखिका को गहरा विस्मय हुआ।
यात्रा-सार भाग 6: सेमिनार, मिनो जलप्रपात और नारा की यात्रा
अगले दिन सेमिनार के उद्घाटन में भारत सरकार के उच्चायुक्त श्री विकास स्वरूप (जिनकी पुस्तक पर ऑस्कर-विजेता फ़िल्म 'स्लमडॉग मिलियनेयर' बनी) तथा डॉ. अजय कुमार गुप्त उपस्थित थे। प्रोफेसर तोमियो मिज़ोकामी ने 1951-1980 की हिन्दी फ़िल्मों के लगभग तीन सौ लोकप्रिय गीतों का संकलन और जापानी अनुवाद किया था — यह हिन्दी-जापानी सेतु का अद्भुत उदाहरण है।
इसके बाद प्रतिनिधिमंडल मिनो जलप्रपात देखने गया, जहाँ का सुंदर दृश्य और रंगबिरंगी पत्तियाँ मनमोहक थीं। अंतिम पड़ाव नारा में था — प्राचीन काल में जापान की राजधानी रहे इस शहर में तोदायजी मंदिर है, जिसकी स्थापना 743 ई. में हुई थी। यहाँ लकड़ी से बना विशाल गौतम बुद्ध (दायबुत्सु) का स्थापत्य देखकर लेखिका चकित रह गईं। मंदिर परिसर में स्वच्छंद घूमते हिरणों को केले खिलाने का अनुभव यात्रा का एक मधुर क्षण बना। जापान से लौटते समय लेखिका एक छोटा जिउतिया पौधा साथ लाईं, जो जापान की यादों की तरह हरा-भरा बना रहा।