लघु-उत्तरीय प्रश्न (आदर्श उत्तर)
प्रश्न 1: जापान के भारतीय रेस्तराँ 'कलकत्ता' का वर्णन कीजिए।
उत्तर: तोक्यो में स्थित यह भारतीय रेस्तराँ प्रतिनिधिमंडल के लिए एक छोटा-सा भारत जैसा अनुभव लेकर आया। इसकी दीवार पर ताजमहल के सामने ऊँटों की तस्वीर लगी थी और हिन्दी संगीत बज रहा था। यहाँ पहुँचते ही मेहमानों को पहले गर्म पानी (जापानी रिवाज़ के अनुसार) और फिर दालचीनी, काली मिर्च व चायपत्ती से बनी खुशबूदार मसाला चाय दी गई। यहाँ इतना स्वादिष्ट भारतीय भोजन — साबुत काली उड़द की दाल, तंदूरी रोटी, आलू के पराँठे, सरसों का साग — मिला कि प्रतिनिधिमंडल को लगा जैसे वे भारत के किसी प्रसिद्ध रेस्तराँ में बैठे हों।
प्रश्न 2: जापान के रेलवे स्टेशन और रेल-यात्रा के बारे में लेखिका क्या कहती हैं?
उत्तर: लेखिका के अनुसार जापान में क़दम-क़दम पर रेलवे स्टेशन हैं और रेल-व्यवस्था अत्यंत जटिल पर अनुशासित है। प्लेटफॉर्म पर खिंची लाल लकीरों के अनुसार यात्री खड़े होते हैं, बीच की जगह से उतरने वालों को रास्ता मिलता है, और कोई धक्का-मुक्की नहीं करता। रेल में बैठने से अधिक खड़े होने का स्थान है, तथा 'सौजन्य स्थान' विशेष ज़रूरतमंद यात्रियों के लिए आरक्षित हैं। यात्री शांत रहकर पढ़ते या फोन देखते रहते हैं — पूरा डिब्बा सन्नाटे से भरा रहता है।
प्रश्न 3: 'टफ्स' के पुस्तकालय के बारे में लिखिए।
उत्तर: 'टफ्स' (तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ़ फॉरेन स्टडीज़) का पुस्तकालय चार मंज़िला भवन में स्थित है, जिसकी हर मंज़िल पर विशाल वाचनालय है। इसमें कुल 6,18,615 पुस्तकें विद्युतचालित आलमारियों में सुरक्षित रखी हैं, जो एक बटन दबाने से खुलती हैं। यह व्यवस्था जगह की बचत और पुस्तकों की सुरक्षा दोनों सुनिश्चित करती है। इंडिक भाषा विभाग में हिन्दी, अवधी, ब्रजभाषा, राजस्थानी, भोजपुरी, पहाड़ी और मैथिली की पुस्तकों की बहुतायत है। 'नवलकिशोर संग्रह' में 987 दुर्लभ ग्रंथ हैं, जिनमें 1805 ई. का 'सिंहासन बत्तीसी' तथा फीजी का प्रथम हिन्दी उपन्यास 'डउका पुरान' भी शामिल हैं।
प्रश्न 4: जापान के 'बुलेट-ट्रेन' पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर: 'शिन्कान्सेन' (शाब्दिक अर्थ: न्यू ट्रंक लाइन) जापान की सबसे तेज़ गति की रेल है, जिसे बुलेट ट्रेन भी कहा जाता है। यह 16 डिब्बों की गाड़ी है, जिसमें 1300 यात्री बैठ सकते हैं और इसमें 40 मोटर जेनरेटर लगे हैं। यह 170 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है और रुकने के लिए भी कम-से-कम 5 किलोमीटर की गुंजाइश चाहिए। तोक्यो और ओसाका के बीच इस रेल-मार्ग में 66 गुफाएँ आती हैं, और प्रतिदिन 8600 कर्मियों की कार्यक्षमता इसके संचालन में लगती है — यह जापान की तकनीकी श्रेष्ठता का प्रतीक है।
प्रश्न 5: ओसाका के क़िले का चित्रण कीजिए।
उत्तर: ओसाका जो (किला) 1585 ई. में सम्राट तोयोतोमी हिदेयोशी द्वारा निर्मित एक विशाल क़िला है, जो हरियाली और रंगबिरंगे पुष्प-पादपों से घिरा है। इसके चारों ओर गहरी खाई और जलाशय है, प्रवेश-द्वार एक काला विशाल फाटक है और काले पत्थर की प्राचीरें हैं। यह क़िला जापानी संघर्षधर्मिता और जिजीविषा का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि यह कई बार आग लगने तथा बिजली गिरने से नष्ट होकर पुनर्निर्मित हुआ — अंतिम नवीनीकरण 1931 ई. में हुआ। इसी परिसर में ओसाका जो का संग्रहालय भी है, और रात में यह सुनहरी-रूपहरी रोशनी में नयनाभिराम दिखता है।
प्रश्न 6: 'तोदायजी मंदिर' का वर्णन कीजिए।
उत्तर: नारा शहर का प्रसिद्ध तोदायजी मंदिर 743 ई. में स्थापित हुआ था। इसके अधिष्ठाता गौतम बुद्ध हैं, जिन्हें जापानी भाषा में 'दायबुत्सु' कहा जाता है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि बिना सीमेंट और पत्थर के, केवल काली-भूरी लकड़ी से बना यह विशाल भवन सैकड़ों वर्षों से मज़बूती से खड़ा है। बड़े आँगन के बीचोंबीच एक गोलाकार वृत्त में दिव्य ज्योति जलती रहती है, जिसकी श्रद्धालु भारतीय शैली में आरती करते हैं। प्रवेश-द्वार पर दो प्रहरी-प्रतिमाएँ हैं, जो 'ओम्' के उच्चार का प्रतीकात्मक संकेत देती हैं। मंदिर परिसर में स्वच्छंद घूमते हिरण पर्यटकों से केले खाते हैं।
प्रश्न 7: अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के बारे में लेखिका के क्या विचार हैं?
उत्तर: लेखिका के लिए यह सम्मेलन एक अप्रतिम अनुभव था, जहाँ इतने सारे जापानी विद्वान हिन्दी भाषा व लेखन से जुड़ी जानकारियाँ साझा कर रहे थे। मंच पर भारत सरकार के उच्चायुक्त विकास स्वरूप और डॉ. अजय कुमार गुप्ता जैसे गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। प्रो. तोमियो मिज़ोकामी जैसे विद्वानों ने हिन्दी-जापानी के बीच सेतु बनाने का अद्भुत कार्य किया है। छात्रों ने पूरी एकाग्रता से वक्ताओं को सुना और हिन्दी में प्रश्न भी पूछे — इससे स्पष्ट होता है कि जापानी शिक्षकों ने हिन्दी सिखाने में गहरा परिश्रम किया है।
प्रश्न 8: जापान में हिन्दी के प्रभाव-प्रसार पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर: जापान में हिन्दी भाषा के प्रति गहरा आकर्षण देखने को मिलता है। तोक्यो विश्वविद्यालय में हिन्दी-उर्दू शिक्षण की एक शताब्दी बीत चुकी है, और वहाँ शोधकार्य की सुविधा भी है। प्रो. यामाने यो जैसे विशुद्ध जापानी विद्वान न केवल उर्दू सीखकर सिखाते हैं बल्कि शेर भी कहते हैं। प्रो. तोमियो मिज़ोकामी ने पुराने हिन्दी फ़िल्मी गीतों का जापानी अनुवाद कर हिन्दी सिनेमा को जापान में लोकप्रिय बनाया। यह सब दर्शाता है कि जापान में हिन्दी भाषा और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी रुचि और सम्मान है।