भारत में राष्ट्रवाद
भारत में राष्ट्रवाद अध्याय से 2026-27 के प्रतिदर्श प्रश्न-पत्र और 2026 के दोनों बोर्ड प्रश्न-पत्रों में 7 या 8 अंक आए, जिनमें 2 अंक का मानचित्र प्रश्न भी शामिल है, जो हर बार इसी अध्याय से आया है। प्रतिदर्श प्रश्न-पत्र (असहयोग के आर्थिक प्रभाव या सविनय अवज्ञा में व्यापारी) और मई 2026 (सविनय अवज्ञा में महिलाएँ) में इतिहास का 5 अंक वाला प्रश्न, फ़रवरी 2026 में स्रोत आधारित प्रश्न (भारत छोड़ो आंदोलन), 2025 में असहयोग पर 3 अंक का प्रश्न और हाल के हर प्रश्न-पत्र में एक बहुविकल्पीय प्रश्न इसी अध्याय से था।
सबसे ज़्यादा अंक इन गलतियों से कटते हैं: मानचित्र (खेड़ा, अहमदाबाद और दांडी तीनों गुजरात में हैं; कलकत्ता और नागपुर, दोनों में 1920 में अधिवेशन हुए), असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन को आपस में मिला देना, तिथियाँ, और ऐसे उत्तर जिनमें घटनाएँ तो गिनाई गई हों पर यह न बताया गया हो कि कोई समूह आंदोलन से क्यों जुड़ा या क्यों दूर रहा।
5 मिनट में दोहराएँ
समय-रेखा
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1915 | गांधीजी दक्षिण अफ़्रीका से लौटे (जनवरी) |
| 1917-1918 | चंपारण (नील बागान मालिक), खेड़ा (लगान) और अहमदाबाद (मिल मज़दूर, 1918) में सत्याग्रह |
| 1919 | रॉलट एक्ट; 6 अप्रैल को हड़ताल; 13 अप्रैल को अमृतसर में जलियाँवाला बाग; खिलाफ़त कमेटी, बंबई (मार्च) |
| 1920 | कलकत्ता अधिवेशन (सितंबर) में असहयोग पर सहमति; नागपुर अधिवेशन (दिसंबर) में कार्यक्रम स्वीकार; अवध किसान सभा (अक्टूबर) |
| 1922 | चौरी चौरा की हिंसा के बाद असहयोग आंदोलन वापस (फ़रवरी) |
| 1928 | साइमन कमीशन: 'साइमन कमीशन वापस जाओ' |
| 1929 | लाहौर अधिवेशन (दिसंबर): पूर्ण स्वराज; 26 जनवरी 1930 स्वतंत्रता दिवस |
| 1930 | 11 माँगों वाला इरविन को पत्र (31 जनवरी); नमक यात्रा, साबरमती से दांडी, 24 दिन; 6 अप्रैल को नमक कानून तोड़ा |
| 1931 | गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च); दूसरा गोलमेज़ सम्मेलन (दिसंबर) |
| 1932 | पूना समझौता (सितंबर) |
| 1942 | भारत छोड़ो: क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद; वर्धा प्रस्ताव (जुलाई); 'करो या मरो' (बंबई, 8 अगस्त) |
मानचित्र सूची: कलकत्ता (पश्चिम बंगाल), नागपुर (महाराष्ट्र), मद्रास (तमिलनाडु), चंपारण (बिहार), खेड़ा, अहमदाबाद और दांडी (गुजरात), अमृतसर (पंजाब)।
असहयोग की अलग-अलग धाराएँ: अवध के किसान (बाबा रामचंद्र; बेगार, ऊँचा लगान; नाई-धोबी बंद), गूडेम पहाड़ियाँ (अल्लूरी सीताराम राजू; जंगलों पर रोक), असम के बागान मज़दूर ('गांधी राज'), शहर (विद्यार्थी, वकील, बहिष्कार; विदेशी कपड़े का आयात लगभग आधा)।
असहयोग बनाम सविनय अवज्ञा: पहले में लोगों से सहयोग न करने को कहा गया; दूसरे में औपनिवेशिक कानून तोड़ने को भी कहा गया (नमक कानून, वन कानून, लगान)।
सविनय अवज्ञा में कौन जुड़ा और क्यों: धनी किसान (लगान में कमी); गरीब किसान (किराए की माफ़ी); व्यापारी वर्ग (औपनिवेशिक रोक-टोक का अंत; फ़िक्की, 1927); मज़दूर (मुख्य रूप से नागपुर क्षेत्र); महिलाएँ (शहरों की ऊँची जातियों और गाँवों के धनी किसान परिवारों से)। ज़्यादातर दलित और बहुत-से मुसलमान दूर रहे।
ध्यान दें
- मद्रास में जस्टिस पार्टी ने परिषद चुनावों का बहिष्कार नहीं किया।
- गांधी-इरविन समझौता (1931) और पूना समझौता (1932) अलग हैं।
- नमक यात्रा साबरमती (अहमदाबाद) से शुरू हुई; नमक कानून तट पर दांडी में तोड़ा गया।
- खेड़ा और अहमदाबाद दोनों गुजरात के भीतरी भाग में, एक-दूसरे के पास हैं।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: हर प्रश्न पहले कॉपी पर हल कीजिए, फिर उत्तर पढ़िए। हर चरण के सामने लिखे अंक बताते हैं कि परीक्षक क्या देखता है। 1 अंक वाले बहुविकल्पीय और अभिकथन-कारण प्रश्न अंत की क्विज़ में हैं, साथ में ऐसे प्रश्न भी जो जाँचते हैं कि आपने अध्याय कितनी गहराई से समझा है; क्विज़ के हर उत्तर के साथ उसकी व्याख्या दी गई है।
लघु उत्तरीय प्रश्न (2 और 3 अंक)
प्रश्न 1 (2 अंक)
नीचे दिए गए भारत के रेखा-मानचित्र पर दो स्थान A और B अंकित हैं। निम्नलिखित जानकारी की सहायता से इन्हें पहचानिए और इनके सही नाम लिखिए।
A. पंजाब का वह शहर जहाँ 10 अप्रैल 1919 को पुलिस ने एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चलाई, जिसके बाद मार्शल लॉ लगा दिया गया।
B. पुरानी मद्रास प्रेसिडेंसी की राजधानी, पूर्वी तट पर, जहाँ 1927 में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ।

उत्तर।
आदर्श उत्तर:
A. अमृतसर, पंजाब में, उत्तर-पश्चिम की सीमा के पास।
B. मद्रास (अब चेन्नई), तमिलनाडु में पूर्वी तट पर।
अंक योजना:
- A: अमृतसर (पंजाब) — 1 अंक
- B: मद्रास, अब चेन्नई (तमिलनाडु) — 1 अंक
प्रश्न 2 (2 अंक)
नीचे दिए गए भारत के रेखा-मानचित्र पर दो स्थान A और B अंकित हैं। निम्नलिखित जानकारी की सहायता से इन्हें पहचानिए और इनके सही नाम लिखिए।
A. उत्तर बिहार का वह ज़िला जहाँ 1917 में भारत में गांधीजी का पहला सत्याग्रह हुआ।
B. वह शहर जिसके दिसंबर 1920 के कांग्रेस अधिवेशन के एक महीने बाद असहयोग-खिलाफ़त आंदोलन शुरू हुआ।

उत्तर।
आदर्श उत्तर:
A. चंपारण, बिहार के उत्तर-पश्चिम में, नेपाल की सीमा के पास।
B. नागपुर, महाराष्ट्र में, लगभग भारत के बीच में।
अंक योजना:
- A: चंपारण (बिहार) — 1 अंक
- B: नागपुर (महाराष्ट्र) — 1 अंक
प्रश्न 3 (3 अंक)
नीचे दिए गए भारत के रेखा-मानचित्र पर निम्नलिखित को उपयुक्त चिह्नों से अंकित कीजिए और उनके नाम लिखिए।
(a) पूर्व का वह शहर जहाँ सितंबर 1920 में कांग्रेस की बैठक हुई और असहयोग शुरू करने पर सहमति बनी।
(b) गुजरात का वह कपड़ा उद्योग वाला शहर जहाँ 1918 में गांधीजी ने सूती मिल मज़दूरों का पक्ष लिया।
(c) गुजरात के तट पर बसा वह गाँव जहाँ 1930 की 240 मील की पैदल यात्रा समाप्त हुई।

उत्तर।
आदर्श उत्तर:
(a) कलकत्ता (अब कोलकाता), पूर्व में, पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के किनारे।
(b) अहमदाबाद, गुजरात के भीतरी भाग में, साबरमती नदी के किनारे।
(c) दांडी, सूरत के दक्षिण में गुजरात के तट पर।
उत्तर-मानचित्र में तीनों स्थान a, b और c से दिखाए गए हैं।
अंक योजना:
- (a) कलकत्ता (अब कोलकाता), पश्चिम बंगाल, सही जगह अंकित और नाम लिखा — 1 अंक
- (b) अहमदाबाद, गुजरात, सही जगह अंकित और नाम लिखा — 1 अंक
- (c) दांडी, गुजरात, सही जगह अंकित और नाम लिखा — 1 अंक

प्रश्न 4 (2 अंक)
कुछ महीनों बाद शहरों में असहयोग आंदोलन धीमा पड़ गया। इसके दो कारण बताइए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- खादी मिल के कपड़े से महँगी थी, इसलिए गरीब लोग उसे खरीद नहीं पाते थे।
- अंग्रेज़ी संस्थाओं की जगह भारतीय स्कूल, कॉलेज और अदालतें धीरे-धीरे बनीं, इसलिए विद्यार्थी, शिक्षक और वकील लौटने लगे।
अंक योजना:
- खादी अक्सर मिलों में बड़े पैमाने पर बने कपड़े से महँगी थी, और गरीब लोग उसे खरीद नहीं पाते थे। — 1 अंक
- अंग्रेज़ी संस्थाओं का बहिष्कार तभी चल सकता था जब उनकी जगह भारतीय संस्थाएँ हों; ये धीरे-धीरे बनीं, इसलिए विद्यार्थी और शिक्षक सरकारी स्कूलों में और वकील अदालतों में लौटने लगे। — 1 अंक
प्रश्न 5 (3 अंक)
जलियाँवाला बाग हत्याकांड पर उत्तर भारत के लोगों ने क्या प्रतिक्रिया दी और सरकार ने क्या किया? तीन बिंदुओं में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- उत्तर भारत के कई शहरों में भीड़ सड़कों पर उतरी; हड़तालें, पुलिस से झड़पें और सरकारी इमारतों पर हमले हुए।
- सरकार ने सत्याग्रहियों को अपमानित किया: उनसे नाक रगड़वाई, सड़कों पर रेंगवाया और हर साहब को सलाम करवाया।
- लोगों पर कोड़े बरसे और गुजराँवाला के पास गाँवों पर बम गिरे। हिंसा बढ़ती देख गांधीजी ने आंदोलन रोक दिया।
अंक योजना:
- खबर फैलते ही उत्तर भारत के कई शहरों में भीड़ सड़कों पर उतर आई: हड़तालें हुईं, पुलिस से झड़पें हुईं और सरकारी इमारतों पर हमले हुए। — 1 अंक
- सरकार ने लोगों को अपमानित करने और डराने के लिए क्रूर दमन किया: सत्याग्रहियों से ज़मीन पर नाक रगड़वाई गई, सड़कों पर रेंगवाया गया और हर साहब को सलाम करवाया गया। — 1 अंक
- लोगों को कोड़े मारे गए और पंजाब में गुजराँवाला के आसपास के गाँवों पर बम गिराए गए; हिंसा फैलती देख गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया। — 1 अंक
प्रश्न 6 (3 अंक)
1928 में साइमन कमीशन का स्वागत 'साइमन कमीशन वापस जाओ' के नारे से क्यों हुआ? 1929 में इसके बाद कौन-से दो कदम उठाए गए?
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, इसलिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग समेत सभी दलों ने विरोध किया।
- अक्टूबर 1929 में लॉर्ड इरविन ने भविष्य में कभी 'डोमिनियन स्टेटस' देने और गोलमेज़ सम्मेलन की पेशकश की।
- दिसंबर 1929 में नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर अधिवेशन ने पूर्ण स्वराज को लक्ष्य घोषित किया।
अंक योजना:
- ब्रिटेन की टोरी सरकार ने भारत में संवैधानिक व्यवस्था के कामकाज की जाँच के लिए सर जॉन साइमन के नेतृत्व में यह कमीशन बनाया था, पर इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था; इसलिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग समेत सभी दलों ने विरोध किया। — 1 अंक
- अक्टूबर 1929 में वायसराय लॉर्ड इरविन ने भविष्य में किसी अनिश्चित समय पर भारत को 'डोमिनियन स्टेटस' देने की अस्पष्ट पेशकश की और गोलमेज़ सम्मेलन की घोषणा की। — 1 अंक
- इससे उग्र नेता संतुष्ट नहीं हुए; दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर अधिवेशन ने पूर्ण स्वराज की माँग को औपचारिक रूप दिया, और 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाना तय हुआ। — 1 अंक
प्रश्न 7 (3 अंक)
कल्पना कीजिए कि एक भारतीय मिल-मालिक ने 1930 में कांग्रेस को पैसा दिया और आयातित सामान का व्यापार करने से इनकार किया, पर 1932 तक वह सतर्क हो गया। स्पष्ट कीजिए कि उसे स्वराज से क्या उम्मीद थी, उसने कैसे मदद की और उसका उत्साह क्यों ठंडा पड़ा।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- वह विदेशी आयात से सुरक्षा और आयात घटाने वाली विनिमय दर चाहता था; उसके लिए स्वराज यानी रोक-टोक से मुक्त व्यापार।
- उसने पैसा दिया और आयातित सामान का व्यापार नहीं किया, जैसे फ़िक्की के ठाकुरदास और बिड़ला ने किया।
- गोलमेज़ सम्मेलन की असफलता के बाद उसे उग्र गतिविधियों, व्यापार में लंबे घाटे और युवा कांग्रेसियों में समाजवाद से डर लगा।
अंक योजना:
- उम्मीद: पहले विश्वयुद्ध में भारी मुनाफ़ा कमा चुके व्यापारी विदेशी आयात से सुरक्षा और ऐसी रुपया-स्टर्लिंग विनिमय दर चाहते थे जो आयात को हतोत्साहित करे; स्वराज का अर्थ था व्यापार और उद्योग पर औपनिवेशिक रोक-टोक का अंत। — 1 अंक
- मदद: पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला जैसे लोगों के नेतृत्व वाले फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (1927) जैसे संगठनों के ज़रिए उन्होंने आंदोलन को पैसा दिया और आयातित सामान खरीदने-बेचने से इनकार किया। — 1 अंक
- उत्साह ठंडा पड़ना: गोलमेज़ सम्मेलन असफल होने के बाद उन्हें उग्र गतिविधियों, व्यापार में लंबी रुकावट और कांग्रेस के युवा सदस्यों में समाजवाद के बढ़ते असर का डर था। — 1 अंक
प्रश्न 8 (3 अंक)
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान गरीब किसानों और कांग्रेस के संबंध अनिश्चित क्यों बने रहे? तीन बिंदु स्पष्ट कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- गरीब किसान ज़मींदारों से ज़मीन किराए पर लेते थे। नकद आय घटने से वे किराया नहीं चुका पाते थे और उसकी माफ़ी चाहते थे।
- उनमें से बहुत-से समाजवादियों और कम्युनिस्टों के उग्र आंदोलनों से जुड़ गए।
- कांग्रेस धनी किसानों और ज़मींदारों को नाराज़ नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसने ज़्यादातर जगह 'किराया मत दो' अभियानों का साथ नहीं दिया।
अंक योजना:
- गरीब किसान ज़मींदारों से किराए पर ली गई ज़मीन जोतने वाले छोटे काश्तकार थे; नकद आय घटने से वे किराया नहीं चुका पा रहे थे और चाहते थे कि बकाया किराया माफ़ हो। — 1 अंक
- उनमें से बहुत-से अक्सर समाजवादियों और कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले उग्र आंदोलनों में शामिल हो गए। — 1 अंक
- कांग्रेस धनी किसानों और ज़मींदारों को नाराज़ नहीं करना चाहती थी, इसलिए ज़्यादातर जगहों पर उसने 'किराया मत दो' अभियानों का समर्थन नहीं किया। — 1 अंक
प्रश्न 9 (2 अंक)
बहिष्कार और पिकेटिंग में क्या अंतर है? असहयोग आंदोलन से दोनों का एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- बहिष्कार: विरोध में किसी चीज़ को न खरीदना, न इस्तेमाल करना। लोगों ने विदेशी कपड़ा खरीदना छोड़ा और उसकी होली जलाई।
- पिकेटिंग: दुकान या दफ़्तर का रास्ता रोकना। स्वयंसेवकों ने शराब की दुकानों पर पिकेटिंग की।
अंक योजना:
- बहिष्कार: विरोध के रूप में लोगों से संबंध न रखना, गतिविधियों में भाग न लेना या चीज़ें न खरीदना और न इस्तेमाल करना; उदाहरण: विदेशी कपड़ा न खरीदना और उसकी होली जलाना (या विद्यार्थियों का सरकारी स्कूल छोड़ना)। — 1 अंक
- पिकेटिंग: प्रदर्शनकारी किसी दुकान, कारखाने या दफ़्तर का रास्ता रोक देते हैं; उदाहरण: स्वयंसेवकों ने शराब की दुकानों और विदेशी कपड़ा बेचने वाली दुकानों पर पिकेटिंग की। — 1 अंक
दीर्घ उत्तरीय और स्रोत आधारित प्रश्न
प्रश्न 10 (5 अंक)
हिंद स्वराज (1909) में गांधीजी ने लिखा था कि अंग्रेज़ों ने भारत लिया नहीं है, हमने उन्हें दिया है। स्पष्ट कीजिए कि इस विचार और खिलाफ़त के मुद्दे ने असहयोग आंदोलन को कैसे आकार दिया, और आंदोलन के तय किए गए चरणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- पहले विश्वयुद्ध में तुर्की हारा और खलीफ़ा पर कठोर संधि का डर था। मार्च 1919 में बंबई में खिलाफ़त कमेटी बनी।
- गांधीजी को हिंदुओं और मुसलमानों को जोड़ने का मौका दिखा। 1920 की गर्मियों में उन्होंने और शौकत अली ने दूर-दूर तक दौरे करके समर्थन जुटाया।
- उनका विचार था कि अंग्रेज़ी राज भारतीयों के सहयोग से ही टिका है; सहयोग रुका तो यह एक साल में ढह जाएगा।
- पहले लोग सरकारी उपाधियाँ लौटाते और सिविल सेवा, सेना, पुलिस, अदालतों, परिषदों और स्कूलों का बहिष्कार करते।
- फिर विदेशी सामान का बहिष्कार होता, और सरकार दमन करती तो पूरा सविनय अवज्ञा अभियान चलता।
अंक योजना:
- पहला विश्वयुद्ध ऑटोमन तुर्की की हार के साथ खत्म हुआ; ऑटोमन सम्राट, यानी खलीफ़ा, पर कठोर शांति-संधि थोपे जाने की अफ़वाहें फैलीं, और मार्च 1919 में बंबई में खिलाफ़त कमेटी बनी। — 1 अंक
- गांधीजी को हिंदुओं और मुसलमानों को एक जन-आंदोलन में साथ लाने का मौका दिखा; 1920 की गर्मियों में उन्होंने और शौकत अली ने दूर-दूर तक दौरे करके समर्थन जुटाया। — 1 अंक
- हिंद स्वराज का तर्क था कि अंग्रेज़ी राज भारतीयों के सहयोग से ही बना और टिका है; अगर भारतीय सहयोग करना बंद कर दें, तो यह एक साल के भीतर ढह जाएगा और स्वराज आ जाएगा। — 1 अंक
- पहले चरण: सरकार की दी हुई उपाधियाँ लौटाना; सिविल सेवाओं, सेना, पुलिस, अदालतों, विधान परिषदों और स्कूलों का बहिष्कार। — 1 अंक
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार; और अगर सरकार दमन करे, तो पूरा सविनय अवज्ञा अभियान। — 1 अंक
अथवा
गांधीजी ने फ़रवरी 1922 में और फिर मार्च 1931 में देशव्यापी आंदोलन वापस लिया। दोनों निर्णयों के कारणों और उनके बाद जो हुआ, उसकी तुलना कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- 1922 में गांधीजी ने आंदोलन रोका, क्योंकि यह हिंसक हो रहा था, जैसे गोरखपुर के चौरी चौरा में।
- उन्हें लगा कि जन-संघर्ष से पहले सत्याग्रहियों को प्रशिक्षण चाहिए।
- इसके बाद कुछ नेताओं ने परिषदों में जाने के लिए स्वराज पार्टी बनाई, जबकि नेहरू और बोस पूर्ण स्वतंत्रता के लिए उग्र संघर्ष चाहते थे।
- 1931 में कठोर दमन और लगभग 1,00,000 गिरफ़्तारियों के बाद उन्होंने गांधी-इरविन समझौता किया: वे गोलमेज़ सम्मेलन में जाएँगे और कैदी छोड़े जाएँगे।
- सम्मेलन असफल रहा, दमन फिर शुरू हुआ और कांग्रेस गैरकानूनी घोषित हुई। दोबारा शुरू हुआ आंदोलन 1934 तक कमज़ोर पड़ गया।
अंक योजना:
- 1922, कारण: असहयोग आंदोलन कई जगह हिंसक हो रहा था; गोरखपुर के चौरी चौरा में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन पुलिस से हिंसक टकराव में बदल गया। — 1 अंक
- गांधीजी को लगा कि जन-संघर्ष के लिए तैयार होने से पहले सत्याग्रहियों को ठीक से प्रशिक्षण चाहिए। — 1 अंक
- 1922 के बाद: जन-संघर्ष से थके कुछ नेताओं ने परिषदों में जाने के लिए स्वराज पार्टी बनाई, जबकि नेहरू और बोस जैसे युवा नेता उग्र आंदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता पर ज़ोर देते रहे। — 1 अंक
- 1931, कारण: क्रूर दमन के बाद, जिसमें शांत सत्याग्रहियों को पीटा गया और लगभग 1,00,000 लोग गिरफ़्तार हुए, गांधीजी ने 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता किया; वे गोलमेज़ सम्मेलन में जाने को राज़ी हुए और सरकार राजनीतिक कैदियों को छोड़ने को। — 1 अंक
- 1931 के बाद: लंदन का सम्मेलन असफल रहा, सरकार ने नया दमन शुरू किया और कांग्रेस को गैरकानूनी घोषित किया; आंदोलन फिर शुरू हुआ, पर 1934 तक कमज़ोर पड़ गया। — 1 अंक
प्रश्न 11 (5 अंक)
उन्नीसवीं सदी के अंत से भारतीय राष्ट्रवादियों ने चित्रों, लोककथाओं, प्रतीकों और इतिहास का उपयोग करके लोगों में एक राष्ट्र से जुड़े होने की भावना कैसे जगाई? चार तरीके स्पष्ट कीजिए और इससे पैदा हुई एक समस्या बताइए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का 'वंदे मातरम्', जो बाद में आनंदमठ में शामिल हुआ, स्वदेशी आंदोलन में गाया गया। अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता को शांत और आध्यात्मिक रूप में चित्रित किया।
- टैगोर ने गाथा-गीत, बाल-गीत और मिथक इकट्ठे किए, और नटेसा शास्त्री ने तमिल लोककथाओं का चार खंडों का संग्रह छापा।
- स्वदेशी झंडे पर आठ कमल और अर्धचंद्र थे; चरखे वाला गांधीजी का स्वराज ध्वज जुलूसों में विरोध के प्रतीक के रूप में उठाया गया।
- राष्ट्रवादियों ने विज्ञान, कला और दर्शन में भारत के महान अतीत और औपनिवेशिक शासन में उसके पतन पर लिखा।
- समस्या: यह अतीत और इसकी छवियाँ ज़्यादातर हिंदू थीं, इसलिए दूसरे समुदायों को लगा कि वे छूट गए हैं।
अंक योजना:
- भारत माता की छवि: बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में 'वंदे मातरम्' लिखा, जो बाद में उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल हुआ और स्वदेशी आंदोलन में खूब गाया गया; अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता को शांत, गंभीर, दैवी और आध्यात्मिक रूप में चित्रित किया। — 1 अंक
- लोककथाएँ: राष्ट्रवादियों ने लोककथाएँ, लोकगीत और किंवदंतियाँ दर्ज कीं; रवींद्रनाथ टैगोर ने गाथा-गीत, बाल-गीत और मिथक इकट्ठे किए और लोक-परंपरा को फिर से जीवित करने का आंदोलन चलाया; नटेसा शास्त्री ने तमिल लोककथाओं का चार खंडों का संग्रह 'द फ़ोकलोर ऑफ़ सदर्न इंडिया' प्रकाशित किया। — 1 अंक
- प्रतीक और चिह्न: बंगाल का स्वदेशी झंडा (लाल, हरा और पीला, आठ कमल और अर्धचंद्र के साथ) और 1921 तक बना गांधीजी का स्वराज ध्वज (लाल, हरा और सफ़ेद, बीच में चरखा), जिसे जुलूसों में विरोध के प्रतीक के रूप में उठाया जाता था। — 1 अंक
- इतिहास: राष्ट्रवादियों ने कला और स्थापत्य, विज्ञान और गणित, धर्म, कानून और दर्शन, शिल्प और व्यापार में भारत के गौरवशाली अतीत और औपनिवेशिक शासन में उसके पतन के बारे में लिखा, ताकि भारतीय अपने अतीत पर गर्व करें। — 1 अंक
- समस्या: जिस अतीत का गुणगान हुआ वह मुख्य रूप से हिंदू अतीत था और छवियाँ हिंदू प्रतीकों से ली गई थीं, इसलिए दूसरे समुदायों के लोगों को लगा कि उन्हें छोड़ दिया गया है। — 1 अंक
अथवा
'1932 के पूना समझौते ने एक तीखा मतभेद सुलझा दिया, पर दलितों की शंकाएँ दूर नहीं कीं।' इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- गांधीजी ने 'अछूतों' को हरिजन कहा, उनके मंदिर-प्रवेश और सार्वजनिक कुओं तथा स्कूलों तक पहुँच के लिए काम किया और ऊँची जातियों से हृदय बदलने को कहा।
- बहुत-से दलित नेता इसके बजाय राजनीतिक हल चाहते थे: शिक्षा में आरक्षण और पृथक निर्वाचिका।
- 1930 में दमित वर्ग संघ बनाने वाले डॉ. अंबेडकर ने दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में पृथक निर्वाचिका माँगी, और अंग्रेज़ मान गए।
- गांधीजी ने आमरण अनशन किया, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे दलित समाज से अलग पड़ जाएँगे। पूना समझौते (1932) से दमित वर्गों को आरक्षित सीटें मिलीं, पर चुनाव सामान्य निर्वाचक मंडल से होना था।
- दलित फिर भी कांग्रेस के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलन पर शंका करते रहे।
अंक योजना:
- गांधीजी ने 'अछूतों' को हरिजन (ईश्वर की संतान) कहा; उन्होंने मंदिरों में प्रवेश और सार्वजनिक कुओं, तालाबों, सड़कों और स्कूलों तक पहुँच के लिए सत्याग्रह किए, खुद शौचालय साफ़ किए और ऊँची जातियों से हृदय बदलने को कहा। — 1 अंक
- बहुत-से दलित नेता राजनीतिक हल चाहते थे: शिक्षा संस्थानों में आरक्षित सीटें और ऐसी पृथक निर्वाचिका जो विधान परिषदों के लिए दलित सदस्य चुने। — 1 अंक
- 1930 में दमित वर्ग संघ (डिप्रेस्ड क्लासेज़ एसोसिएशन) बनाने वाले डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका की माँग पर गांधीजी से टकराव किया, और ब्रिटिश सरकार ने यह माँग मान ली। — 1 अंक
- गांधीजी ने आमरण अनशन शुरू किया, क्योंकि उन्हें लगता था कि पृथक निर्वाचिका से दलितों का समाज में घुलना-मिलना धीमा पड़ेगा; अंबेडकर ने उनकी बात मानी, और सितंबर 1932 के पूना समझौते से दमित वर्गों को प्रांतीय और केंद्रीय विधान परिषदों में आरक्षित सीटें मिलीं, जिन पर सामान्य निर्वाचक मंडल वोट देता। — 1 अंक
- फिर भी दलित आंदोलन कांग्रेस के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलन को लेकर आशंकित रहा। — 1 अंक
प्रश्न 12 (4 अंक)
नीचे दिए गए स्रोत को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
जब नाई नहीं आया
1920 में अवध के कुछ गाँवों में कोई ज़मींदार सुबह उठता तो पाता कि न नाई उसकी हजामत बनाने आया है और न धोबी उसके कपड़े लेने। गाँव की पंचायत ने उसका बहिष्कार कर दिया था। यह नाई-धोबी बंद उन हथियारों में से एक था, जिनका इस्तेमाल किसान उन तालुकदारों और ज़मींदारों के खिलाफ़ करते थे जो बहुत ऊँचा लगान और कई तरह के दूसरे कर वसूलते थे, उनसे बिना मज़दूरी के काम (बेगार) करवाते थे और जब चाहे किसी काश्तकार को ज़मीन से बेदखल कर सकते थे।
इस गुस्से को आवाज़ देने वाले थे बाबा रामचंद्र, एक संन्यासी जो कभी फ़िजी में गिरमिटिया मज़दूर रह चुके थे। जून 1920 से जवाहरलाल नेहरू भी इन गाँवों में जाने और किसानों की बातें सुनने लगे। अक्टूबर तक अवध किसान सभा बन गई, और एक महीने के भीतर उसकी 300 से ज़्यादा शाखाएँ हो गईं।
कांग्रेस चाहती थी कि यह संघर्ष असहयोग आंदोलन का हिस्सा बने। पर 1921 में विरोध ने ऐसा मोड़ लिया जिसकी उसने योजना नहीं बनाई थी: तालुकदारों और व्यापारियों के घरों पर हमले हुए, बाज़ार लूटे गए और अनाज के भंडार कब्ज़े में ले लिए गए। स्थानीय नेता तो किसानों से यह तक कहने लगे कि गांधीजी ने घोषणा की है कि कोई कर नहीं दिया जाएगा और ज़मीन गरीबों में बाँटी जाएगी।
(a) नाई-धोबी बंद क्या था, और इसका इस्तेमाल किसके खिलाफ़ होता था? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
यह सामाजिक बहिष्कार था, जिसमें पंचायतें नाई और धोबी को अत्याचारी ज़मींदारों और तालुकदारों की सेवा करने से रोक देती थीं।
अंक योजना:
- गाँव की पंचायतों द्वारा किया गया सामाजिक बहिष्कार: नाई और धोबी अत्याचारी ज़मींदारों और तालुकदारों की सेवा करने से इनकार कर देते थे (0.5 + 0.5)। — 1 अंक
(b) 1921 में कांग्रेस को अवध का आंदोलन चिंताजनक क्यों लगा? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
यह हिंसक हो गया: तालुकदारों और व्यापारियों के घरों पर हमले हुए, बाज़ार लूटे गए और अनाज के भंडार कब्ज़े में लिए गए।
अंक योजना:
- यह हिंसक हो गया: तालुकदारों और व्यापारियों के घरों पर हमले हुए, बाज़ार लूटे गए और अनाज के भंडार कब्ज़े में लिए गए। (यह भी स्वीकार्य: नेताओं ने गांधीजी के नाम पर कर न देने और गरीबों को ज़मीन मिलने की अफ़वाहें फैलाईं।) — 1 अंक
(c) स्पष्ट कीजिए कि अवध के किसानों का स्वराज का विचार कांग्रेस के संघर्ष के विचार से दो तरह से कैसे अलग था। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- किसान कम लगान, बेगार का अंत और गरीबों के लिए ज़मीन चाहते थे; कांग्रेस अंग्रेज़ी राज खत्म करना चाहती थी।
- किसानों ने तालुकदारों और व्यापारियों पर हमले किए, पर कांग्रेस अहिंसक संघर्ष चाहती थी।
अंक योजना:
- किसानों के लिए स्वराज का अर्थ ज़मींदारों से राहत था: कम लगान और कर, बेगार का अंत और गरीबों को ज़मीन भी; कांग्रेस का लक्ष्य अंग्रेज़ी राज खत्म करना था। — 1 अंक
- किसान तालुकदारों और व्यापारियों के खिलाफ़ बल प्रयोग को तैयार थे, जबकि कांग्रेस अहिंसक संघर्ष चाहती थी। — 1 अंक
अथवा
(c) अवध किसान सभा का मूल्यांकन कीजिए। उसकी ताकत दिखाने वाला एक बिंदु और उसकी सीमा दिखाने वाला एक बिंदु दीजिए। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- ताकत: यह तेज़ी से फैली, एक महीने में 300 से ज़्यादा शाखाएँ बनीं, और इसने गाँवों की शिकायतों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा।
- सीमा: यह विरोध को शांत नहीं रख सकी, और गांधीजी के नाम पर अफ़वाहें फैलाई गईं।
अंक योजना:
- ताकत: एक महीने में इसकी 300 से ज़्यादा शाखाएँ बन गईं और इसने किसानों की स्थानीय शिकायतों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा। — 1 अंक
- सीमा: यह आंदोलन को शांत नहीं रख सकी; 1921 में हमले और लूट हुई, और गांधीजी के नाम पर अफ़वाहें फैलाई गईं। — 1 अंक
प्रश्न 13 (4 अंक)
नीचे दिए गए स्रोत को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
टिन खदानों में गांधी टोपियाँ
छोटा नागपुर की टिन खदानों के मज़दूरों ने बुलावे का इंतज़ार नहीं किया। 1930 में उनमें से हज़ारों गांधी टोपी पहनकर विरोध रैलियों में पहुँचे और विदेशी सामान के बहिष्कार अभियानों में शामिल हुए। उसी साल रेल लाइनों पर और दो साल बाद बंदरगाहों पर मज़दूरों ने हड़ताल की।
ये लोग केवल कांग्रेस के आदेश नहीं मान रहे थे। कम मज़दूरी और काम की कठिन परिस्थितियों को लेकर मालिकों से उनके अपने झगड़े थे, और उन्होंने गांधीवादी कार्यक्रम के वे हिस्से, जैसे बहिष्कार, अपना लिए जो इन लड़ाइयों में उनके काम आते थे।
दूसरी ओर, कांग्रेस ने उनकी माँगों को अपने कार्यक्रम से बाहर रखा। उन वर्षों में कांग्रेस के करीब आ रहे उद्योगपति इससे घबरा जाते, और नेताओं को डर था कि अंग्रेज़ी राज के खिलाफ़ खड़ी ताकतें बँट जाएँगी। नतीजा मिला-जुला रहा। ज़्यादातर भारत में औद्योगिक मज़दूर बड़ी संख्या में आंदोलन से दूर रहे; केवल नागपुर क्षेत्र में वे बड़े पैमाने पर इसमें शामिल हुए।
(a) किस क्षेत्र में औद्योगिक मज़दूर बड़े पैमाने पर आंदोलन में शामिल हुए? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
नागपुर क्षेत्र में।
अंक योजना:
- नागपुर क्षेत्र। — 1 अंक
(b) स्रोत के अनुसार कुछ मज़दूरों ने बहिष्कार को क्यों अपनाया? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
यह कम मज़दूरी और खराब कार्य-परिस्थितियों को लेकर मालिकों से उनकी अपनी लड़ाई में मददगार था।
अंक योजना:
- यह कम मज़दूरी और खराब कार्य-परिस्थितियों को लेकर मालिकों से उनके अपने संघर्ष में मददगार था। — 1 अंक
(c) मज़दूरों की माँगों को अपने कार्यक्रम से बाहर रखने के कांग्रेस के निर्णय का मूल्यांकन कीजिए। एक बिंदु इसके पक्ष में और एक विपक्ष में दीजिए। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- पक्ष में: आंदोलन को पैसा देने और बहिष्कार का साथ देने वाले उद्योगपति जुड़े रहे, और अंग्रेज़ी राज के खिलाफ़ ताकतें एकजुट रहीं।
- विपक्ष में: मज़दूरों को लगा कि उनकी कम मज़दूरी और खराब हालात की अनदेखी हुई, इसलिए ज़्यादातर दूर रहे और आंदोलन ने व्यापक समर्थन खोया।
अंक योजना:
- पक्ष में: इससे आंदोलन को पैसा और बहिष्कार में सहयोग देने वाले उद्योगपति साथ बने रहे और साम्राज्यवाद-विरोधी ताकतें एकजुट रहीं। — 1 अंक
- विपक्ष में: मज़दूरों को लगा कि कम मज़दूरी और खराब हालात की उनकी समस्याएँ अनदेखी की गईं, इसलिए ज़्यादातर मज़दूर दूर रहे और आंदोलन ने समर्थन का बड़ा आधार खो दिया। — 1 अंक
अथवा
(c) स्रोत कहता है कि मज़दूर 'केवल कांग्रेस के आदेश नहीं मान रहे थे'। स्रोत से दो प्रमाण देकर इसे स्पष्ट कीजिए। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- मज़दूरी और हालात को लेकर मालिकों से उनकी अपनी लड़ाइयाँ थीं; उन्होंने बहिष्कार जैसी काम की बातें ही अपनाईं।
- वे अपने दम पर उठे: टिन खदान मज़दूर बिना बुलाए रैलियों में आए, और रेल तथा बंदरगाह मज़दूरों ने हड़ताल की।
अंक योजना:
- कम मज़दूरी और कठिन कार्य-परिस्थितियों को लेकर मालिकों से उनके अपने झगड़े थे, और उन्होंने कार्यक्रम के केवल वे हिस्से, जैसे बहिष्कार, अपनाए जो उनके काम के थे। — 1 अंक
- उन्होंने अपने दम पर कदम उठाए: टिन खदानों के मज़दूर बिना बुलाए रैलियों में पहुँचे, और रेलवे मज़दूरों (1930) तथा बंदरगाह मज़दूरों (1932) ने हड़ताल की, जबकि कांग्रेस ने उनकी माँगों को अपने कार्यक्रम से बाहर रखा। — 1 अंक