मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया
मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया अध्याय से 2026-27 के प्रतिदर्श प्रश्न-पत्र और 2026 के दोनों बोर्ड प्रश्न-पत्रों में 5 अंक आए। प्रतिदर्श प्रश्न-पत्र (भारत में मुद्रण का आना) और 2025 तथा मई 2026 (दोनों बार मुद्रण और प्रतिबंध; मई 2026 में मुद्रण और राष्ट्रवाद पर भी प्रश्न) में इतिहास का स्रोत आधारित प्रश्न इसी अध्याय से था; फ़रवरी 2026 में 3 अंक का प्रश्न आया (मुद्रण और फ़्रांसीसी क्रांति अथवा बौद्ध प्रचारकों की भूमिका); और कालक्रम, चित्र आधारित प्रश्न तथा लेखकों का उनकी कृतियों से मिलान जैसे एक-दो बहुविकल्पीय प्रश्न भी आए।
सबसे ज़्यादा अंक इन गलतियों से कटते हैं: दो बंगाल गज़ट (1780 का हिकी का और गंगाधर भट्टाचार्य का) आपस में मिला देना, प्रतिबंध वाले कानूनों और वर्षों में गलती करना, यह लिख देना कि अकेले छपाई ने फ़्रांसीसी क्रांति करवाई, और स्रोत आधारित प्रश्न के 2 अंक वाले भाग का उत्तर केवल अनुच्छेद से लिखना, जबकि वहाँ अपना ज्ञान माँगा गया हो।
5 मिनट में दोहराएँ
याद रखने योग्य तिथियाँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 594 | चीन: वुडब्लॉक से किताबें छपीं |
| 768-770 / 868 | हाथ की छपाई चीन से जापान पहुँची / बौद्ध डायमंड सूत्र वुडब्लॉक से छपा |
| 13वीं सदी का मध्य / 14वीं सदी का अंत | कोरिया: त्रिपिटक कोरियाना (लगभग 80,000 वुडब्लॉक) / जिक्जी (धातु के चल टाइप) |
| 1295 | मार्को पोलो वुडब्लॉक छपाई इटली लाए |
| 1448 | गुटेनबर्ग का प्रेस; बाइबिल, 3 साल में लगभग 180 प्रतियाँ |
| 1517 / 1558 | लूथर की 95 स्थापनाएँ / प्रतिबंधित किताबों की सूची |
| 1579 / 1713 | पहली तमिल (कोचीन) / पहली मलयालम किताब |
| 1753 | एदो में कितागावा उतामारो का जन्म (उकियो चित्र) |
| 1780 | हिकी का बंगाल गज़ट |
| 1810 | रामचरितमानस पहली बार छपा (कलकत्ता) |
| 1821 / 1822 | संवाद कौमुदी / फ़ारसी अखबार और गुजराती बंबई समाचार |
| 1857 / 1867 | फ़्रांस में बच्चों का प्रेस / देवबंद सेमिनरी |
| 1871 / 1876 | फुले की गुलामगिरी / राशसुंदरी देवी की आमार जीबन |
| 1878 | वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट |
| 1920 का दशक / 1930 का दशक | शिलिंग श्रृंखला / महामंदी के पेपरबैक |
| 1938 / 1942 | काशीबाबा की किताब / लगभग 90 अखबार बंद |
मशीनें: हो का बेलनाकार प्रेस (19वीं सदी का मध्य, 8,000 ताव प्रति घंटा); ऑफ़सेट प्रेस (19वीं सदी का अंत, छह रंग); बिजली के प्रेस (20वीं सदी)।
भारत के प्रेस: नवल किशोर (लखनऊ), श्री वेंकटेश्वर (बंबई), 1880 के दशक से; बटतला (कलकत्ता) में सस्ती किताबें।
व्यक्ति: इरैस्मस, मेनोकियो, मर्सिए, राजा रवि वर्मा, ताराबाई शिंदे, पंडिता रमाबाई, पेरियार।
कारण और परिणाम
- सस्ती किताबें → श्रोता जनता पाठक जनता बनी → धार्मिक बहस और धर्म-सुधार आंदोलन।
- गाँव के स्कूल और फेरीवाले → पढ़ने का जुनून → राजाओं और पुरोहितों पर सवाल।
- 1857 के बाद देसी अखबार राष्ट्रवादी हुए → वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (आयरिश प्रेस कानूनों पर)।
- अखबारों ने इलाके जोड़े, कुशासन उजागर किया → राष्ट्रवाद बढ़ा।
ध्यान दें
- दो बंगाल गज़ट: हिकी के (1780) से अंग्रेज़ी अखबार शुरू हुए; गंगाधर भट्टाचार्य का पहला भारतीय अखबार था।
- मैकॉले के नियमों (1835) ने प्रेस की आज़ादी लौटाई; 1878 के एक्ट ने उस पर रोक लगाई।
- छपाई ने सीधे फ़्रांसीसी क्रांति नहीं करवाई; उसने नई सोच संभव बनाई।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: हर प्रश्न पहले कॉपी पर हल कीजिए, फिर उत्तर पढ़िए। हर चरण के सामने लिखे अंक बताते हैं कि परीक्षक क्या देखता है। 1 अंक वाले बहुविकल्पीय और अभिकथन-कारण प्रश्न अंत की क्विज़ में हैं, साथ में ऐसे प्रश्न भी जो जाँचते हैं कि आपने अध्याय कितनी गहराई से समझा है; क्विज़ के हर उत्तर के साथ उसकी व्याख्या दी गई है।
लघु उत्तरीय प्रश्न (2 और 3 अंक)
प्रश्न 1 (2 अंक)
पंद्रहवीं सदी के यूरोप में पुस्तक-विक्रेताओं के कातिबों की पूरी टोलियाँ रखने के बाद भी हाथ से लिखी किताबें कम और महँगी रहीं। दो कारण दीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- हाथ से नकल महँगी, धीमी और मेहनत वाली थी, इसलिए कातिब कुछ ही प्रतियाँ बना पाते थे।
- पांडुलिपियाँ नाज़ुक थीं और सँभालने में कठिन, इसलिए न आसानी से ले जाई जा सकती थीं, न पढ़ी जा सकती थीं।
अंक योजना:
- हाथ से किताब की नकल में बहुत समय, पैसा और मेहनत लगती थी, इसलिए कुछ ही प्रतियाँ बन पाती थीं। — 1 अंक
- पांडुलिपियाँ नाज़ुक थीं और सँभालने में कठिन; उन्हें न आसानी से साथ ले जाया जा सकता था, न पढ़ा जा सकता था, इसलिए कम लोग उनका उपयोग कर पाते थे। — 1 अंक
प्रश्न 2 (2 अंक)
'यूरोप में छपाई आने के बाद सुनना और पढ़ना दो अलग दुनिया नहीं रह गए।' दो बिंदुओं में इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- ज़्यादातर लोग पढ़ नहीं सकते थे, इसलिए छपे गाथा-गीत और लोक कथाएँ गाँवों और शराबखानों में गाकर या पढ़कर सुनाई जाती थीं।
- पहले केवल सुने जाने वाले गीत-कहानियाँ अब छपने लगीं, यानी मौखिक संस्कृति छपाई में आई।
अंक योजना:
- ज़्यादातर लोग अब भी पढ़ नहीं सकते थे, इसलिए चित्रों से भरे छपे गाथा-गीत और लोक कथाएँ गाँवों और शराबखानों की बैठकों में गाकर या पढ़कर सुनाई जाती थीं; छपी सामग्री ज़ुबानी आगे बढ़ती थी। — 1 अंक
- जो गीत और कहानियाँ लोग पहले केवल सुनते थे, वे अब छपने लगीं, यानी पुरानी मौखिक संस्कृति छपाई में आ गई और पढ़ने वाले व सुनने वाले एक ही सामग्री से जुड़ गए। — 1 अंक
प्रश्न 3 (2 अंक)
ग्रिम बंधुओं ने जर्मनी के किसानों से बरसों तक लोक कथाएँ इकट्ठी कीं और फिर उन्हें किताब के रूप में छापा। दो बिंदुओं में स्पष्ट कीजिए कि छपाई ने इन कथाओं को बचाया भी और बदला भी।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- जो कथाएँ केवल ज़ुबानी चलती थीं, वे छापी गईं, इसलिए बची रहीं और नए पाठकों तक पहुँचीं।
- भाइयों ने बच्चों के लिए अनुचित या भद्दे लगने वाले हिस्से हटा दिए, इसलिए छपी कथाएँ बदल गईं।
अंक योजना:
- बचाया: जो कथाएँ केवल ज़ुबानी चलती थीं, वे लिखकर छापी गईं, इसलिए बची रहीं और गाँवों से दूर के पाठकों तक पहुँचीं। — 1 अंक
- बदला: भाइयों ने छापने से पहले कथाओं का संपादन किया और बच्चों के लिए अनुचित या ऊँचे तबके को भद्दा लगने वाला हिस्सा निकाल दिया, इसलिए छपी कथाओं का रूप बदल गया। — 1 अंक
प्रश्न 4 (3 अंक)
अठारहवीं सदी के यूरोप में छपाई ने वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के विचारों को आम लोगों की पहुँच में कैसे ला दिया? तीन बिंदुओं में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- प्राचीन और मध्यकालीन वैज्ञानिक ग्रंथ इकट्ठा करके छापे गए, और नक्शे तथा वैज्ञानिक आरेख बड़े पैमाने पर छपे।
- आइज़क न्यूटन ने अपनी खोजें छापीं, जो विज्ञान में रुचि रखने वाले कहीं ज़्यादा पाठकों तक पहुँचीं।
- टॉमस पेन, वॉल्तेयर और रूसो का लेखन खूब पढ़ा गया, जिससे विज्ञान, तर्क और विवेक के विचार लोकप्रिय साहित्य में आए।
अंक योजना:
- प्राचीन और मध्यकाल की पुरानी वैज्ञानिक किताबें इकट्ठा करके छापी गईं, और नक्शे व वैज्ञानिक आरेख बड़ी संख्या में छपे। — 1 अंक
- आइज़क न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने अपनी खोजें छापीं, इसलिए विज्ञान में रुचि रखने वाले कहीं ज़्यादा पाठक उन्हें समझ सके। — 1 अंक
- टॉमस पेन, वॉल्तेयर और रूसो जैसे विचारकों की किताबें खूब छपीं और पढ़ी गईं, इसलिए विज्ञान और तर्क के विचार लोकप्रिय लेखन तक पहुँचे। — 1 अंक
प्रश्न 5 (3 अंक)
स्पष्ट कीजिए कि पढ़ने के फैलाव ने उन्नीसवीं सदी के भारत में लेखन के नए रूपों को कैसे बढ़ावा दिया। तीन बिंदु दीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- नए पाठक किताबों में अपना जीवन और भावनाएँ देखना चाहते थे, इसलिए यूरोप से आया उपन्यास लोकप्रिय हुआ और भारतीय रूप में ढल गया।
- गीत, कहानियाँ और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर निबंध भी आए, जिनमें भावनाओं और सामाजिक नियमों पर ध्यान था।
- इस लेखन ने पाठकों को मानव जीवन की विविधता दिखाई।
अंक योजना:
- जैसे-जैसे ज़्यादा लोग पढ़ना सीखे, वे ऐसी किताबें चाहने लगे जिनमें उनका अपना जीवन, भावनाएँ और रिश्ते दिखें; यूरोप से आए उपन्यास ने यह ज़रूरत पूरी की और जल्द ही भारतीय रूप और शैलियाँ अपना लीं। — 1 अंक
- दूसरे नए रूप भी आए: गीत, कहानियाँ, और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर निबंध, जिनमें लोगों के मन की दुनिया और उसे गढ़ने वाले सामाजिक नियमों पर ध्यान था। — 1 अंक
- ऐसे लेखन ने पाठकों के सामने अनुभवों की नई दुनिया खोली और उन्हें दिखाया कि मानव जीवन कितना विविध है। (यह भी स्वीकार्य: स्त्रियों के जीवन और भावनाओं पर जीवंत ढंग से लिखा जाने लगा, जैसे आत्मकथाओं में।) — 1 अंक
प्रश्न 6 (3 अंक)
स्पष्ट कीजिए कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में छापेखानों के फैलने से एक नई दृश्य संस्कृति कैसे बनी। तीन बिंदु दीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- चित्रों की ढेरों प्रतियाँ छपने लगीं। राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों ने आम लोगों के लिए चित्र बनाए।
- नक्काश छापेखानों के लिए काम करने लगे, और बाज़ार के सस्ते चित्र व कैलेंडर गरीबों के घरों तक पहुँचकर सोच गढ़ने लगे।
- 1870 के दशक से अखबारों के कार्टून सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करने लगे, साम्राज्यवादी भी, राष्ट्रवादी भी।
अंक योजना:
- अब चित्र हज़ारों की संख्या में छप सकते थे; राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों ने आम खरीदारों के लिए चित्र बनाए। — 1 अंक
- गरीब नक्काशों को छापेखानों में काम मिला, और बाज़ार में बिकने वाले सस्ते चित्र और कैलेंडर गरीबों के घरों की दीवारों पर भी लगने लगे, जिनसे धर्म, राजनीति, परंपरा और आधुनिक जीवन के बारे में लोगों की सोच बनी। — 1 अंक
- 1870 के दशक से पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर कार्टून छपने लगे: कुछ पश्चिमी तौर-तरीकों की नकल करने वाले पढ़े-लिखे भारतीयों पर हँसते थे, राष्ट्रवादी कार्टून अंग्रेज़ी राज पर चोट करते थे और अंग्रेज़ों के कार्टून राष्ट्रवादियों का मज़ाक उड़ाते थे। — 1 अंक
प्रश्न 7 (3 अंक)
'औपनिवेशिक भारत में छपाई ने स्त्रियों के लिए नए दरवाज़े खोले, पर कुछ छपी किताबों ने उन दरवाज़ों को बंद रखने की कोशिश की।' तीन बिंदुओं में इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- पत्रिकाओं ने स्त्रियों के लेख छापे, उनकी शिक्षा का पक्ष लिया और घर पर पढ़ाई की सामग्री दी।
- बीसवीं सदी की शुरुआत में कुछ स्त्रियों द्वारा संपादित हिंदी पत्रिकाओं में विधवापन, विधवा-विवाह और राष्ट्रीय आंदोलन पर चर्चा हुई।
- पर पंजाब में इस्त्री धर्म विचार और खालसा ट्रैक्ट सोसाइटी की पुस्तिकाओं ने स्त्रियों को आज्ञाकारी पत्नी बनना सिखाया।
अंक योजना:
- मध्यवर्गीय घरों में स्त्रियाँ कहीं ज़्यादा पढ़ने लगीं; पत्रिकाओं ने स्त्रियों का लेखन छापा, स्त्री-शिक्षा के पक्ष में लिखा और घर पर पढ़ाई के लिए पाठ्यक्रम व पठन-सामग्री दी। — 1 अंक
- बीसवीं सदी की शुरुआत में स्त्रियों के लिए लिखी और कभी-कभी उन्हीं के द्वारा संपादित हिंदी पत्रिकाओं में स्त्री-शिक्षा, विधवापन, विधवा-विवाह और राष्ट्रीय आंदोलन पर चर्चा हुई। — 1 अंक
- पर कुछ छपी सामग्री उल्टी दिशा में ले गई: पंजाब में राम चड्ढा की खूब बिकने वाली इस्त्री धर्म विचार और खालसा ट्रैक्ट सोसाइटी की सस्ती पुस्तिकाओं ने स्त्रियों को आज्ञाकारी पत्नी बनना सिखाया। (यह भी स्वीकार्य: रूढ़िवादी परिवार पढ़ने से डरते थे, जैसे कि पढ़ी-लिखी लड़की विधवा हो जाएगी या उर्दू के रूमानी किस्से स्त्रियों को बिगाड़ देंगे।) — 1 अंक
प्रश्न 8 (2 अंक)
मध्य कलकत्ता के बटतला इलाके के लोकप्रिय किताबों के कारोबार ने उन्नीसवीं सदी के अंत में बंगाल की स्त्रियों के जीवन में पढ़ने को किन दो तरीकों से पहुँचाया? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- बटतला में सस्ती धार्मिक किताबें और काठ-चित्रों व रंगीन तस्वीरों वाली कहानियाँ छपती थीं, इसलिए किताबें सस्ती और आकर्षक थीं।
- फेरीवाले ये किताबें घर-घर ले जाते थे, इसलिए स्त्रियाँ खाली समय में इन्हें पढ़ सकती थीं।
अंक योजना:
- बटतला में धार्मिक पर्चों और ग्रंथों के सस्ते संस्करण और काठ-चित्रों व रंगीन तस्वीरों से भरी रोचक किताबें छपती थीं, इसलिए किताबें सस्ती और आकर्षक हो गईं। — 1 अंक
- फेरीवाले बटतला की किताबें घर-घर ले जाते थे, इसलिए स्त्रियाँ बाहर गए बिना उन्हें खरीदकर खाली समय में पढ़ सकती थीं। — 1 अंक
प्रश्न 9 (2 अंक)
1870 में एक भारतीय अखबार ने लिखा कि भारत में अखबारों और राजनीतिक संगठनों को वही काम करना चाहिए जो ब्रिटिश संसद में विपक्ष करता है। ऐसे विचार से औपनिवेशिक सरकार चिंतित क्यों हुई होगी? दो कारण दीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- अखबार नीतियों की खुलकर आलोचना करते और दिखाते कि नुकसान कहाँ है।
- भारत में चुना हुआ विपक्ष नहीं था, इसलिए प्रेस बिना चुनी सरकार के विरुद्ध जनता की आवाज़ बनता और संगठित विरोध खड़ा हो सकता था।
अंक योजना:
- अखबार सरकार की नीतियों को खुलकर परखेंगे और उनकी आलोचना करेंगे, और बताएँगे कि जनता का नुकसान कहाँ है, जिससे जनमत अफ़सरों के विरुद्ध होगा। — 1 अंक
- भारत में कोई चुना हुआ विपक्ष नहीं था, इसलिए प्रेस बिना चुनी सरकार के विरुद्ध जनता की आवाज़ बन जाता और आलोचना संगठित राजनीतिक विरोध में बदल सकती थी। (यह भी स्वीकार्य: 1857 के बाद सरकार पहले से डरती थी कि भारतीय भाषाओं के अखबार राष्ट्रवादी हो रहे हैं।) — 1 अंक
प्रश्न 10 (3 अंक)
बीसवीं सदी की शुरुआत में पंजाब के किसी छोटे कस्बे का पाठक अपने साप्ताहिक अखबार से पूना की किसी विरोध सभा या कलकत्ता के किसी मुकदमे के बारे में जान सकता था। ऐसे अखबारों ने भारतीय राष्ट्रवाद को बढ़ाने में किन तीन तरीकों से मदद की? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- खबरें एक इलाके से दूसरे तक पहुँचीं, इसलिए दूर-दूर के लोग खुद को एक देश का हिस्सा मानने लगे।
- अखबारों ने औपनिवेशिक कुशासन उजागर किया, इसलिए स्थानीय शिकायतें देश की शिकायत बन गईं।
- सभाओं और आंदोलनों की खबरों ने पाठकों को राष्ट्रवादी गतिविधियों में भाग लेने को प्रेरित किया।
अंक योजना:
- खबरें एक इलाके से दूसरे इलाके तक पहुँचीं, इसलिए दूर-दूर रहने वाले लोग महसूस करने लगे कि वे एक ही देश के हैं (अखिल भारतीय पहचान)। — 1 अंक
- अखबारों ने औपनिवेशिक कुशासन और अन्याय की घटनाएँ छापीं, इसलिए स्थानीय शिकायतें पूरे देश की साझा शिकायत बन गईं। — 1 अंक
- अखबारों ने सभाओं और आंदोलनों की खबरें देकर और पाठकों से उनमें शामिल होने की अपील करके राष्ट्रवादी गतिविधियों को बढ़ावा दिया। (यह भी स्वीकार्य: जब सरकार अखबारों या संपादकों को सज़ा देती, तो विरोध फैलता और और लोग आंदोलन से जुड़ते।) — 1 अंक
दीर्घ उत्तरीय और स्रोत आधारित प्रश्न
प्रश्न 11 (4 अंक)
नीचे दिए गए स्रोत को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
गुटेनबर्ग से पहले: पूर्वी एशिया में छपाई
(एक संग्रहालय प्रदर्शनी का परिचय-पट, इस प्रश्न के लिए लिखा गया)
यूरोप में किसी के किताब छापने से बहुत पहले पूर्वी एशिया के छापने वाले पाठ की बहुत-सी प्रतियाँ बनाने के तरीके खोज चुके थे। चीन में छठी सदी के अंत से पूरे पन्ने का पाठ लकड़ी के एक ठप्पे पर खोदा जाता था; ठप्पे पर स्याही लगाई जाती थी और उस पर कागज़ रगड़ा जाता था। बौद्ध भिक्षु और प्रचारक इस कला को आगे ले गए। आठवीं सदी में यह चीन से जापान पहुँची, और इस क्षेत्र की सबसे पुरानी छपी रचनाओं में बहुत-से बौद्ध ग्रंथ हैं।
कोरिया ने इस कला को दो दिशाओं में बढ़ाया। तेरहवीं सदी के मध्य में कोरियाई नक्काशों ने त्रिपिटक कोरियाना नाम के बौद्ध ग्रंथों को लगभग 80,000 लकड़ी के ठप्पों पर खोदा, जो आज भी सुरक्षित हैं। चौदहवीं सदी के अंत तक कोरियाई छापने वाले धातु में ढले अलग-अलग अक्षरों का भी उपयोग करने लगे थे, जिन्हें किसी भी क्रम में जमाया और दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता था।
इसके उलट, यूरोप तब भी अपनी ज़्यादातर किताबें हाथ से ही नकल कर रहा था।
(a) छपाई किस देश से और किस सदी में जापान पहुँची? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
चीन से, आठवीं सदी में।
अंक योजना:
- चीन से, आठवीं सदी में (लगभग सन् 768-770)। — 1 अंक
(b) चीन में वुडब्लॉक से एक पन्ना कैसे छापा जाता था? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
पाठ लकड़ी के ठप्पे पर खोदा जाता, स्याही लगाई जाती और उस पर कागज़ रगड़ा जाता था।
अंक योजना:
- पन्ने का पाठ लकड़ी के ठप्पे पर खोदा जाता, उस पर स्याही लगाई जाती और फिर उस पर कागज़ रगड़ा जाता था। — 1 अंक
(c) पूरे पन्ने को वुडब्लॉक पर खोदने का एक लाभ और धातु के चल टाइप के उपयोग का एक लाभ, मूल्यांकन करते हुए बताइए। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- खुदा हुआ ठप्पा रखकर उसी पाठ को बार-बार छापा जा सकता था, जैसा त्रिपिटक के ठप्पे दिखाते हैं।
- धातु के अक्षर किसी भी नए पाठ के लिए फिर से जमाए जा सकते थे, इसलिए नई किताब के लिए नई खुदाई नहीं करनी पड़ती थी।
अंक योजना:
- वुडब्लॉक: एक बार खुदा ठप्पा लंबे समय तक रखा जा सकता था और उसी पाठ को बार-बार छापने के काम आता था (त्रिपिटक के ठप्पे आज भी बचे हैं); यह चित्रों और जटिल अक्षरों के लिए भी ठीक था। — 1 अंक
- धातु के चल टाइप: वही अक्षर किसी भी नए पाठ के लिए फिर से जमाए और इस्तेमाल किए जा सकते थे, इसलिए नई किताब के लिए नए सिरे से खुदाई नहीं करनी पड़ती थी। — 1 अंक
अथवा
(c) पंद्रहवीं सदी के मध्य से पहले पूर्वी एशिया और यूरोप में छपाई की स्थिति की तुलना कीजिए। दो बिंदु दीजिए। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- पूर्वी एशिया में छठी सदी से वुडब्लॉक छपाई थी और कोरिया में 1300 के दशक के अंत तक धातु के टाइप थे, जबकि यूरोप हाथ से नकल करता था।
- यूरोप ने एशिया से सीखा: कागज़ चीन से आया, और वुडब्लॉक छपाई 1295 में मार्को पोलो के बाद इटली पहुँची।
अंक योजना:
- पूर्वी एशिया में छठी सदी के अंत से वुडब्लॉक से छपाई होती थी और चौदहवीं सदी के अंत तक कोरिया में धातु के चल टाइप आ गए थे, जबकि यूरोप तब भी ज़्यादातर किताबें हाथ से नकल करता था। — 1 अंक
- यूरोप ने बुनियादी बातें एशिया से सीखीं: कागज़ ग्यारहवीं सदी में रेशम मार्ग से चीन से आया, और वुडब्लॉक छपाई इटली में 1295 में मार्को पोलो के चीन से लौटने के बाद ही पहुँची। — 1 अंक
प्रश्न 12 (5 अंक)
स्पष्ट कीजिए कि सोलहवीं सदी के यूरोप में छापेखाने ने धार्मिक विचारों और चर्च को कैसे प्रभावित किया।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- किताबें सस्ती और जल्दी बनने लगीं, इसलिए ज़्यादा लोग धार्मिक ग्रंथ खुद पढ़ सके।
- चर्च के नेताओं से असहमत लोग अपने विचार छापकर दूर-दूर तक फैला सके।
- 1517 में मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च की प्रथाओं के विरुद्ध 95 स्थापनाएँ लिखीं और चर्च को बहस की चुनौती दी।
- उनका लेखन भारी संख्या में छपा; उनके न्यू टेस्टामेंट की 5,000 प्रतियाँ कुछ हफ़्तों में बिक गईं। चर्च बँट गया और प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार आंदोलन शुरू हुआ।
- चर्च के नेता विद्रोही और अधार्मिक विचारों के फैलने से डरे, इसलिए चर्च ने प्रकाशकों और पुस्तक-विक्रेताओं पर कड़े प्रतिबंध लगाए।
अंक योजना:
- किताबें सस्ती और जल्दी बनने लगीं, इसलिए पढ़ना पादरियों और कुलीनों से आगे फैला और ज़्यादा लोग धार्मिक ग्रंथ खुद पढ़ सके। — 1 अंक
- चर्च के नेताओं से असहमत लोग अब अपने विचार छापकर दूर-दूर तक फैला सकते थे। — 1 अंक
- 1517 में मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च के कई रीति-रिवाज़ों और कर्मकांडों पर चोट करती 95 स्थापनाएँ लिखीं और चर्च को बहस की चुनौती दी; छपी प्रतियों ने उनके विचार तेज़ी से फैलाए। — 1 अंक
- उनका लेखन भारी संख्या में छपा, और न्यू टेस्टामेंट के उनके अनुवाद की 5,000 प्रतियाँ कुछ ही हफ़्तों में बिक गईं; चर्च बँट गया और प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार आंदोलन शुरू हुआ। — 1 अंक
- चर्च के नेता और शासक डरते थे कि विद्रोही और अधार्मिक विचार फैलेंगे, इसलिए चर्च ने प्रकाशकों और पुस्तक-विक्रेताओं पर कड़े प्रतिबंध लगाए। — 1 अंक
अथवा
अठारहवीं सदी के अंत से बीसवीं सदी की शुरुआत तक छपाई की तकनीक और किताबें बेचने के तरीकों में आए बदलावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- अठारहवीं सदी के अंत तक प्रेस धातु के बनने लगे। उन्नीसवीं सदी के मध्य में रिचर्ड एम. हो का शक्ति-चालित बेलनाकार प्रेस एक घंटे में 8,000 ताव छापता था, जो अखबारों के लिए बढ़िया था।
- ऑफ़सेट प्रेस एक साथ छह रंग तक छापता था, और बीसवीं सदी की शुरुआत के बिजली वाले प्रेसों ने छपाई तेज़ की।
- पत्रिकाओं ने उपन्यास किस्तों में छापे, जिससे उपन्यास लिखने का ढंग बदला।
- 1920 के दशक में इंग्लैंड में सस्ती 'शिलिंग श्रृंखला' आई और किताबों पर धूल-आवरण लगने लगे।
- 1930 के दशक की महामंदी में बिक्री बनाए रखने के लिए प्रकाशकों ने सस्ते पेपरबैक निकाले।
अंक योजना:
- अठारहवीं सदी के अंत तक प्रेस धातु के बनने लगे; उन्नीसवीं सदी के मध्य में न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो ने शक्ति-चालित बेलनाकार प्रेस बनाया, जो एक घंटे में 8,000 ताव छापता था और अखबारों के लिए बहुत उपयोगी था। — 1 अंक
- उन्नीसवीं सदी के अंत का ऑफ़सेट प्रेस एक साथ छह रंगों तक छाप सकता था; बीसवीं सदी की शुरुआत में बिजली से चलने वाले प्रेसों ने छपाई तेज़ की, और कागज़ डालने के तरीके, प्लेटें, अपने-आप चलने वाली कागज़ की रीलें और रंगों के नियंत्रण बेहतर हुए। — 1 अंक
- उन्नीसवीं सदी की पत्रिकाओं ने बड़े उपन्यास किस्तों में छापे, जिससे उपन्यास लिखने का एक खास ढंग बना। — 1 अंक
- 1920 के दशक में इंग्लैंड में लोकप्रिय किताबें सस्ती 'शिलिंग श्रृंखला' में बिकीं, और बीसवीं सदी में किताबों पर धूल-आवरण (डस्ट कवर) आया। — 1 अंक
- 1930 के दशक में महामंदी शुरू होने पर प्रकाशकों को डर हुआ कि लोग किताबें खरीदना बंद कर देंगे, इसलिए उन्होंने सस्ते पेपरबैक संस्करण निकाले। — 1 अंक
प्रश्न 13 (4 अंक)
नीचे दिए गए स्रोत को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
घर के नाम एक चिट्ठी
(एक कल्पित चिट्ठी, इस प्रश्न के लिए लिखी गई)
पेरिस, वसंत 1786
प्रिय भाई,
तुम हमारे गाँव को अब शायद पहचान भी न पाओ। जब से चर्च ने अपना छोटा-सा स्कूल खोला है, आधे लड़के और बहुत-सी लड़कियाँ पूरा पन्ना हिज्जे लगाकर पढ़ लेते हैं, और जब फेरीवाला पंचांगों, गीतों और पतले किस्सों की अपनी गठरी लेकर आता है, तो शाम से पहले ही सब बिक जाता है।
यहाँ पेरिस में भी यही बुखार है, बस ज़्यादा शोर के साथ। हर कॉफ़ी-घर में कोई न कोई वॉल्तेयर या रूसो को ज़ोर से पढ़कर सुना रहा होता है, और किताब बेचने वाले माँग पूरी नहीं कर पाते। मेरी मुलाकात एक नौजवान से हुई जो उपन्यासकार मर्सिए की कसमें खाता है। उसके अनुसार छापाखाना ही सारी प्रगति का इंजन है, और एक दिन पाठकों की राय इतनी ताकतवर होगी कि किसी भी तानाशाह को उखाड़ फेंकेगी।
मुझे इतना यकीन नहीं। जो लोग रूसो के उद्धरण देते हैं, वही राजा और बिशपों के लिए छपे पर्चे भी खरीदते हैं, और हर कोई अपने पढ़े में से वही लेता है जो उसे जँचे। फिर भी, अब लोग उन बातों पर बहस करते हैं जिन पर सवाल उठाने की हम अपनी जवानी में हिम्मत भी नहीं करते थे।
तुम्हारा भाई, एतिएन
(a) चिट्ठी में नौजवान के अनुसार एक दिन तानाशाहों को क्या उखाड़ फेंकेगा? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
पाठकों की राय, यानी पढ़ने से बना जनमत।
अंक योजना:
- पाठकों की राय, यानी पढ़ने से बना जनमत। — 1 अंक
(b) चिट्ठी लिखने वाले को नौजवान की बात पर पूरा यकीन क्यों नहीं था? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
लोग राजा और चर्च के पर्चे भी पढ़ते थे और अपने मतलब की बात ही चुनते थे, इसलिए पढ़ने से वे अपने-आप शासकों के विरोधी नहीं बनते थे।
अंक योजना:
- पाठक राजा और चर्च के लिए छपे पर्चे भी खरीदते थे और अपने मतलब की बात ही लेते थे, इसलिए पढ़ने से वे अपने-आप शासकों के विरोधी नहीं बन जाते थे। — 1 अंक
(c) चिट्ठी और अपने ज्ञान के आधार पर मूल्यांकन कीजिए कि चर्च के स्कूलों और फेरीवालों ने मिलकर अठारहवीं सदी के यूरोप में 'पढ़ने का जुनून' कैसे पैदा किया। दो बिंदु दीजिए। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- गाँवों के चर्च स्कूलों ने किसानों और कारीगरों को पढ़ना सिखाया, इसलिए पाठक तेज़ी से बढ़े।
- फेरीवाले सस्ते पंचांग, गाथा-गीत और किस्से गाँवों तक लाते थे, इसलिए नए पाठकों के पास खरीदने को हमेशा कुछ रहता था।
अंक योजना:
- अलग-अलग संप्रदायों के चर्चों ने गाँवों में स्कूल खोले, इसलिए किसान और कारीगर पढ़ना सीखे; सदी के अंत तक कुछ इलाकों में 60 से 80 प्रतिशत लोग पढ़ सकते थे। — 1 अंक
- फेरीवाले सस्ती छोटी किताबें (पंचांग, गाथा-गीत, लोक कथाएँ, किस्से) गाँवों तक ले जाते थे, इसलिए नए पाठकों को पढ़ने को कुछ मिल जाता था, और माँग पूरी करने के लिए छापने वाले और ज़्यादा छापते गए। — 1 अंक
अथवा
(c) चिट्ठी में फ़्रांस के एक गाँव में सस्ती किताबें बेचते फेरीवाले का ज़िक्र है। अठारहवीं सदी के यूरोप और उन्नीसवीं सदी के मद्रास में सस्ती छपाई गरीब पाठकों तक कैसे पहुँची, इसकी तुलना कीजिए। दो बिंदु दीजिए। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- यूरोप में फेरीवाले सस्ती चैपबुक गाँव-गाँव ले जाते थे, जबकि मद्रास के कस्बों में सस्ती पुस्तिकाएँ बाज़ार जाते लोगों को चौराहों पर बेची जाती थीं।
- दोनों जगह किताबें सस्ती रखी गईं और वहाँ पहुँचाई गईं जहाँ गरीब पहले से थे, इसलिए पढ़ना अमीरों से आगे फैला।
अंक योजना:
- यूरोप: फेरीवाले (इंग्लैंड में चैपमेन) एक पेनी की चैपबुक और 'बिब्लियोथीक ब्ल्यू' जैसी छोटी किताबें गाँव-गाँव ले जाते थे; मद्रास के कस्बों में बहुत सस्ती छोटी किताबें चौराहों पर बिकती थीं, जहाँ बाज़ार जाते गरीब लोग उन्हें खरीद सकते थे। — 1 अंक
- दोनों जगह किताबें जान-बूझकर सस्ती और छोटी बनाई गईं और वहाँ पहुँचाई गईं जहाँ गरीब लोग पहले से होते थे (गाँव, बाज़ार), इसलिए पढ़ना अमीरों से आगे फैला। — 1 अंक
प्रश्न 14 (4 अंक)
नीचे दिए गए स्रोत को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
पांडुलिपि कक्ष में
(दर्शकों के लिए एक सूचना, इस प्रश्न के लिए लिखी गई)
इस कक्ष की किताबें कभी छपी नहीं थीं। हर किताब हाथ से लिखी गई, ताड़ के पत्तों की पट्टियों पर या हाथ से बने कागज़ पर, संस्कृत, अरबी, फ़ारसी या भारत की अनेक क्षेत्रीय भाषाओं में से किसी एक में। ध्यान से देखिए, तो समझ आएगा कि इनमें से कुछ को पूरा होने में महीनों क्यों लगे: सुनहरे रंग से सजे हाशिये, छंदों के पास छोटे-छोटे चित्र, और पंक्ति-दर-पंक्ति सधा हुआ सुलेखन। ताड़पत्र के गट्ठरों के दोनों ओर लगी पट्टियों और दूसरी किताबों को बाँधने वाले धागे ने नाज़ुक पन्नों को बिखरने से बचाए रखा।
दर्शक अक्सर पूछते हैं कि क्या लोग ऐसी किताबें रोज़ पढ़ते थे। ज़्यादातर नहीं पढ़ते थे। एक पांडुलिपि की कीमत आम परिवार की पहुँच से बाहर थी, एक पल की लापरवाही उसे बिगाड़ सकती थी, और हर कातिब अपनी अलग शैली की लिपि में लिखता था, इसलिए उसे पढ़ने के लिए हुनर और धीरज चाहिए था। फिर भी, भारत में छापेखाने आने पर यह कला खत्म नहीं हुई। इन अलमारियों की कुछ पोथियाँ उन्नीसवीं सदी के अंत में लिखी गईं, जब छपी किताबें कब की बिकने लगी थीं।
(a) पांडुलिपियों के साथ पट्टियों और धागे का उपयोग क्यों किया जाता था? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
नाज़ुक पन्नों को बचाने और बिखरने से रोकने के लिए।
अंक योजना:
- नाज़ुक पन्नों को बचाने और सुरक्षित रखने के लिए। — 1 अंक
(b) ज़्यादातर लोग पांडुलिपियाँ रोज़ क्यों नहीं पढ़ते थे? एक कारण बताइए। (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
वे लिपि की अलग-अलग शैलियों में लिखी होती थीं, इसलिए उन्हें पढ़ना कठिन था।
अंक योजना:
- कोई एक: वे बहुत महँगी थीं; वे नाज़ुक थीं और आसानी से बिगड़ जाती थीं; हर एक की लिपि की शैली अलग थी, इसलिए उन्हें पढ़ना कठिन था। — 1 अंक
(c) स्रोत में बताई गई पांडुलिपियों की दुनिया की तुलना में मूल्यांकन कीजिए कि सस्ती छपी किताबों के आने से आम भारतीयों के पढ़ने में क्या बदलाव आया। दो बिंदु दीजिए। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- छपी किताबें सस्ती थीं और पढ़ने में आसान, इसलिए आम लोग ग्रंथ खरीदकर खुद पढ़ सकते थे।
- प्रतियाँ कहीं भी ले जाई और न पढ़ पाने वालों को सुनाई जा सकती थीं, इसलिए ग्रंथ स्त्रियों और गरीबों तक भी पहुँचे।
अंक योजना:
- छपी किताबें सस्ती, मज़बूत और साफ़, एक जैसे अक्षरों वाली थीं, इसलिए आम लोग महँगी और कठिन पांडुलिपियों पर निर्भर रहने के बजाय खुद ग्रंथ खरीदकर पढ़ सकते थे। — 1 अंक
- बहुत-सी प्रतियाँ कहीं भी ले जाई जा सकती थीं और न पढ़ पाने वालों को पढ़कर सुनाई जा सकती थीं, इसलिए ग्रंथ स्त्रियों और गरीबों समेत कहीं बड़े वर्ग तक पहुँचे। — 1 अंक
अथवा
(c) स्रोत के अनुसार उन्नीसवीं सदी के अंत में भी पांडुलिपियाँ लिखी जा रही थीं। भारत में छापेखाने आने के बाद भी यह कला क्यों चलती रही? दो संभावित कारणों का मूल्यांकन कीजिए। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- छपाई कुछ इलाकों और भाषाओं तक बहुत देर से पहुँची, इसलिए बहुत-से ग्रंथों की नकल हाथ से ही करनी पड़ती थी।
- सुंदर पांडुलिपियाँ कला और परिवार या धर्म की धरोहर मानी जाती थीं, जिनकी जगह सादी छपी प्रति नहीं ले सकती थी।
अंक योजना:
- छपाई धीरे-धीरे और असमान रूप से फैली: कुछ इलाकों और भाषाओं तक छापेखाने बहुत पहले पहुँचे, कुछ तक बहुत बाद में, इसलिए बहुत-से ग्रंथ केवल हस्तलिखित रूप में थे और उनकी नकल हाथ से ही करनी पड़ती थी। — 1 अंक
- सुलेखन, रँगे हाशियों और चित्रों वाली सुंदर पांडुलिपियाँ कला के नमूने और परिवार या धर्म की अनमोल धरोहर मानी जाती थीं, जिनकी जगह सादी छपी प्रति नहीं ले सकती थी। — 1 अंक
प्रश्न 15 (5 अंक)
'भारत में प्रेस के प्रति औपनिवेशिक सरकार का रवैया इस बात के साथ बदलता रहा कि उसे उस समय किस बात का डर था।' पाँच बिंदुओं में इस कथन का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- 1798 से पहले कंपनी इंग्लैंड के आलोचकों से डरती थी, इसलिए उसने कुशासन के आलोचक अंग्रेज़ों पर नियंत्रण रखा।
- 1820 के दशक तक वह अपने पक्ष का प्रेस चाहती थी: कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट ने प्रेस पर रोक लगाई और राज की तारीफ़ करने वाले अखबार बढ़ाए गए।
- 1835 में संपादकों की अर्ज़ी पर बेंटिंक राज़ी हुए और मैकॉले के नियमों से पुरानी आज़ादी लौटी।
- 1857 के बाद उसे राष्ट्रवादी देसी अखबारों का डर था। वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878) से सेंसरशिप और प्रेस ज़ब्ती संभव हुई।
- युद्धों में अशांति का डर था। पहले विश्वयुद्ध में ज़मानत माँगे गए 22 में से 18 अखबार बंद हुए, और अगस्त 1942 में लगभग 90 अखबार बंद किए गए।
अंक योजना:
- 1798 से पहले कंपनी की मुख्य चिंता भारत में रह रहे वे अंग्रेज़ थे जो उसके कुशासन की आलोचना करते थे, क्योंकि इंग्लैंड में उसके विरोधी इसका इस्तेमाल उसके व्यापारिक एकाधिकार के खिलाफ़ कर सकते थे; इसलिए उसके शुरुआती नियंत्रण उन्हीं पर थे। — 1 अंक
- 1820 के दशक तक कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट ने प्रेस की आज़ादी पर नियंत्रण के नियम बनाए, और कंपनी ने अंग्रेज़ी राज की तारीफ़ करने वाले अखबारों को बढ़ावा दिया, क्योंकि वह अपने पक्ष का प्रेस चाहती थी। — 1 अंक
- 1835 में अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं के अखबारों के संपादकों की अर्ज़ियों के बाद गवर्नर-जनरल बेंटिंक प्रेस कानून बदलने को राज़ी हुए, और टॉमस मैकॉले के नए नियमों ने पुरानी आज़ादी लौटा दी। — 1 अंक
- 1857 के विद्रोह के बाद, जब भारतीय भाषाओं के अखबार राष्ट्रवादी होने लगे, गुस्साए अंग्रेज़ों ने उन पर शिकंजा कसने की माँग की; आयरिश प्रेस कानूनों पर आधारित 1878 के वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट से सरकार खबरों और संपादकीय पर सेंसरशिप लगा सकती थी, अखबार को चेतावनी दे सकती थी और बात न मानने पर उसका प्रेस ज़ब्त कर सकती थी। — 1 अंक
- दोनों विश्वयुद्धों में अशांति के डर से नए नियंत्रण आए: भारत रक्षा नियमों के तहत 22 अखबारों से ज़मानत जमा करने को कहा गया, जिनमें से 18 ने इसके बजाय अखबार बंद कर दिया; दूसरे विश्वयुद्ध में युद्ध और भारत छोड़ो आंदोलन की खबरों पर सेंसरशिप लगी, और अगस्त 1942 में लगभग 90 अखबार बंद कर दिए गए। — 1 अंक
अथवा
'भारतीय राष्ट्रवाद को केवल अखबारों ने नहीं, बल्कि कई तरह की छपी सामग्री ने आगे बढ़ाया।' पाँच बिंदुओं में इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- अखबारों ने खबरें एक इलाके से दूसरे तक पहुँचाकर लोगों को जोड़ा और अखिल भारतीय पहचान बनाने में मदद की।
- 1857 के बाद देसी अखबार राष्ट्रवादी हुए और कुशासन उजागर किया; उन्हें चुप कराने की हर कोशिश से और विरोध हुआ।
- 1870 के दशक से राष्ट्रवादी कार्टूनों ने अंग्रेज़ी राज का मज़ाक उड़ाया और कम पढ़े लोगों तक भी पहुँचे।
- बीसवीं सदी की शुरुआत में स्त्रियों की हिंदी पत्रिकाओं ने राष्ट्रीय आंदोलन पर चर्चा करके स्त्रियों को राजनीति से जोड़ा।
- स्वतंत्र प्रेस खुद राष्ट्रवादी माँग बना। 1922 में गांधीजी ने लिखा कि स्वराज का संघर्ष पहले बोलने, प्रेस और संगठन की आज़ादी का संघर्ष है।
अंक योजना:
- अखबारों ने एक इलाके की खबरें दूसरे इलाके तक पहुँचाईं और पूरे भारत के लोगों को जोड़ा, जिससे अखिल भारतीय पहचान बनने में मदद मिली। — 1 अंक
- 1857 के बाद भारतीय भाषाओं के अखबार खुलकर राष्ट्रवादी हो गए, उन्होंने औपनिवेशिक कुशासन की खबरें दीं और राष्ट्रवादी गतिविधियों को बढ़ावा दिया; उन्हें चुप कराने की हर कोशिश से और विरोध हुआ। — 1 अंक
- 1870 के दशक से पत्रिकाओं में छपे राष्ट्रवादी कार्टून और व्यंग्यचित्र अंग्रेज़ी राज का मज़ाक उड़ाते थे और कम पढ़े-लिखे लोगों तक भी पहुँचते थे। — 1 अंक
- बीसवीं सदी की शुरुआत में स्त्रियों की हिंदी पत्रिकाओं में स्त्री-शिक्षा और विधवा-विवाह के साथ राष्ट्रीय आंदोलन पर भी चर्चा होती थी, जिससे स्त्रियाँ राजनीतिक बहस से जुड़ीं। — 1 अंक
- प्रेस की आज़ादी खुद एक राष्ट्रवादी माँग बन गई: 1922 में गांधीजी ने लिखा कि सरकार बोलने, प्रेस और संगठन बनाने की आज़ादी को कुचलना चाहती है, और स्वराज का संघर्ष सबसे पहले इन्हीं आज़ादियों का संघर्ष है। — 1 अंक