लेखक परिचय: हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य लेखक हैं। इनका जन्म मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी नामक गाँव में २२ अगस्त १९२४ ई. को हुआ था। इनका समस्त साहित्य सामाजिक, राजनीतिक एवं आम आदमी के जीवन की विडंबनाओं तथा विरोधाभासों का प्रतिबिंब है। इनकी भाषा बोलचाल की भाषा है, जिसमें तीखे हास्य-व्यंग्य का पुट रहता है। २० अगस्त १९९५ ई. को इनका स्वर्गवास हुआ।

प्रमुख रचनाएँ:

व्यंग्य-संग्रह: 'बेईमानी की परत', 'भूत के पाँव पीछे', 'सदाचार का तावीज़', 'तब की बात और थी', 'पगडंडियों का ज़माना' आदि।

उपन्यास: 'रानी नागफनी की कहानी', 'तट की खोज', 'ज्वाला और जल' आदि।

कहानी-संग्रह: 'हँसते हैं रोते हैं', 'जैसे उनके दिन फिरे' आदि।

पाठ का परिचय एवं उद्देश्य

प्रस्तुत कहानी परसाई जी की व्यंग्यात्मक तथा मार्मिक रचना है, जिसमें भोलाराम जैसे एक नगण्य, दीन, सामान्य सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी के पेंशन के लिए पाँच वर्षों तक चले संघर्ष की मर्मव्यथा का हृदयस्पर्शी चित्रण है। इसमें वर्तमान समाज की गरीबी, भुखमरी, स्वार्थपरता, भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं तथा आम आदमी की विवशता और लाचारी का वर्णन है।

विद्यार्थियों को व्यंग्य-साहित्य की विधा से परिचित कराने के उद्देश्य से इस पाठ का चयन किया गया है।

कहानी का सार भाग 1: यमलोक में अफरा-तफरी

धर्मराज लाखों वर्षों से कर्म और सिफारिश के आधार पर आदमियों को स्वर्ग या नरक में स्थान देते आ रहे थे, परन्तु ऐसा कभी नहीं हुआ था कि कोई जीव गायब हो जाए। चित्रगुप्त परेशान होकर रजिस्टर देख रहे थे — भोलाराम के जीव ने पाँच दिन पहले देह त्यागी थी और यमदूत के साथ इस लोक (यमलोक) के लिए रवाना हुई थी, परन्तु वह अब तक नहीं पहुँची। यमदूत भी लापता था।

तभी एक बदहवास यमदूत हाथ जोड़कर आया और बताया कि नगर के बाहर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार होते ही भोलाराम का जीव उसकी पकड़ से छूटकर गायब हो गया। पाँच दिनों तक सारा ब्रह्मांड छान डालने पर भी जीव नहीं मिला। धर्मराज क्रोधित हुए, तो चित्रगुप्त ने व्यंग्यपूर्वक कहा कि आजकल पृथ्वी पर चीज़ों के रास्ते में ग़ायब हो जाने का व्यापार बहुत चल पड़ा है — शायद किसी विरोधी नेता ने भोलाराम के जीव को भी उड़ा दिया हो!

कहानी का सार भाग 2: नारद की खोज और भोलाराम का परिचय

इसी समय नारद मुनि वहाँ आ पहुँचे। धर्मराज ने उन्हें बताया कि नरक में स्थान की समस्या तो भ्रष्ट ठेकेदारों, इंजीनियरों और ओवरसीयरों के आने से हल हो गई है, परन्तु भोलाराम के गायब जीव की समस्या विकट बनी हुई है। नारद को कौतूहल हुआ और उन्होंने भोलाराम का पता माँगा।

चित्रगुप्त ने रजिस्टर से बताया कि भोलाराम जबलपुर शहर के घमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक टूटे-फूटे डेढ़ कमरे के मकान में परिवार सहित रहता था। लगभग साठ वर्ष की उम्र में सरकारी नौकरी से रिटायर हुए भोलाराम पाँच साल से पेंशन की प्रतीक्षा कर रहे थे। मकान का किराया न देने पर मकान-मालिक उन्हें निकालना चाहता था, तभी उन्होंने संसार छोड़ दिया।

कहानी का सार भाग 3: भोलाराम की पत्नी से भेंट

पृथ्वी पर पहुँचकर नारद माँ-बेटी के रुदन से भोलाराम का घर पहचान गए। भोलाराम की पत्नी ने बताया कि उनके पति को 'गरीबी की बीमारी' थी — पाँच साल से पेंशन पर बैठे थे, बार-बार दरख्वास्त देते रहे, पर कोई जवाब न मिलता था। इन पाँच सालों में सारे गहने और बर्तन बिक गए, फाके होने लगे, और अंततः चिंता तथा भूख में घुलते-घुलते भोलाराम ने दम तोड़ दिया। पत्नी ने नारद से विनती की कि वे कुछ ऐसा करें कि रुकी हुई पेंशन मिल जाए ताकि बच्चों का पेट भर सके। दया से भरकर नारद ने सरकारी दफ्तर जाने का वादा किया।

कहानी का सार भाग 4: सरकारी दफ्तर की लालफीताशाही

सरकारी दफ्तर में नारद एक बाबू से दूसरे, तीसरे, चौथे — यूँ पचीस-तीस बाबुओं और अफसरों के पास घुमाए गए। एक चपरासी ने सलाह दी कि सीधे बड़े साहब से मिलकर उन्हें 'खुश' कर लिया जाए तो काम तुरंत हो जाएगा। बड़े साहब ने नारद को समझाया कि दफ्तर भी एक 'मंदिर' है, जहाँ दान-पुण्य ज़रूरी है — दरख्वास्तों पर 'वज़न' रखना पड़ता है। कुटिल मुस्कान के साथ साहब ने नारद की वीणा माँग ली, यह कहकर कि इससे उनकी बेटी को गाना सिखाया जाएगा। वीणा खोने के डर से घबराए नारद ने अंततः वीणा दे दी, तब जाकर साहब ने भोलाराम की फ़ाइल मँगवाई।

कहानी का सार भाग 5: अंतिम चमत्कारिक मोड़

चपरासी सौ-डेढ़ सौ दरख्वास्तों से भरी मोटी फ़ाइल लेकर आया। साहब ने नाम पूछा और नारद ने ज़ोर से 'भोलाराम' पुकारा। सहसा फ़ाइल में से आवाज़ आई — 'कौन पुकार रहा है मुझे? पोस्टमैन है क्या? पेंशन का ऑर्डर आ गया?' नारद चौंक गए — यह भोलाराम के जीव की ही आवाज़ थी, जो पाँच दिनों से इसी फ़ाइल में फँसा हुआ था!

नारद ने कहा कि वे उन्हें स्वर्ग ले जाने आए हैं, जहाँ उनका इंतज़ार हो रहा है। परन्तु भोलाराम के जीव ने उत्तर दिया — 'मुझे नहीं जाना। मैं तो पेंशन की दरख्वास्तों में अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता।' इस मार्मिक और व्यंग्यात्मक अंत के माध्यम से लेखक भारतीय सरकारी तंत्र की क्रूर लालफीताशाही पर करारा प्रहार करते हैं — जहाँ एक गरीब आदमी को मरने के बाद भी अपने अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ता है।