लेखक परिचय: डॉ. बरसाने लाल चतुर्वेदी

हिन्दी साहित्य में ख्याति-प्राप्त हास्य-व्यंग्य रस के कवि एवं लेखक बरसाने लाल चतुर्वेदी जी का जन्म 15 अगस्त 1920 को मथुरा, उत्तर प्रदेश में हुआ। इन्होंने 'हिन्दी साहित्य में हास्यरस' विषय पर पी.एच.डी. तथा 'आधुनिक काव्य में व्यंग्य' विषय पर डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की। इनका व्यंग्य पाठकों को हास्य के साथ-साथ गहरी सोच में भी डाल देता है। इन्होंने काव्य, निबंध एवं कैरिकेचर (व्यंग्य-चित्रण) — तीनों रूपों को व्यंग्य के लिए अपनाया। लेखन का आरंभ इन्होंने विशुद्ध हास्य से किया, परंतु अनुभव बढ़ने के साथ-साथ इनकी रचनाओं में व्यंग्य की मात्रा बढ़ती गई।

डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी के शब्दों में — "बरसाने लाल चतुर्वेदी का व्यंग्य लेखन हँसाता है और विसंगतियों के प्रति सचेत भी करता है।" इनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार, हिन्दी अकादमी आदि संस्थाओं ने इन्हें सम्मानित किया।

प्रमुख कृतियाँ

भोलाराम पंडित की बैठक, मिस्टर चोखेलाल, बुरे फँसे, मिस्टर खोए-खोए, हास्य निबंध संग्रह आदि।

पाठ का परिचय एवं उद्देश्य

प्रस्तुत साक्षात्कार 'मुसीबत है' नामक संग्रह से लिया गया है। लेखक ने इसमें एक काल्पनिक इंटरव्यू की शैली अपनाकर गंगा मैया के माध्यम से आज के भ्रष्टाचार, महँगाई और धर्म के नाम पर होने वाले ढकोसलों पर तीखा व्यंग्य किया है।

आज की ज्वलंत सामाजिक समस्याओं से विद्यार्थियों को अवगत कराने के उद्देश्य से इस पाठ का चयन पाठ्यक्रम में किया गया है।

शैली विशेषता: यह पाठ प्रश्नोत्तर (साक्षात्कार/इंटरव्यू) शैली में लिखा गया है — पत्रकार गंगा मैया से मानवीकृत रूप में बातचीत करता है, जिससे व्यंग्य अधिक प्रभावी और सजीव बन जाता है।

साक्षात्कार का सार — भाग 1: प्रदूषण और चरित्र का संकट

मकर संक्रांति के दिन लेखक इलाहाबाद में गंगा मैया के निजी सचिव से पहले ही समय ले चुका था। मंदिर में विराजमान माँ के चेहरे पर उदासी थी। लेखक ने माँ के चरण छूकर मृगछाला पर बैठकर पूर्व-लिखित प्रश्न पूछने आरंभ किए।

पहला प्रश्न प्रदूषण को लेकर था — गंगा मैया स्वीकार करती हैं कि जब देश का संपूर्ण वातावरण ही प्रदूषित हो गया है, तो वे स्वयं भी इससे अछूती नहीं रह सकतीं। इसके बाद बातचीत 'चरित्र के संकट' की ओर मुड़ती है। गंगा मैया व्यंग्यपूर्वक बताती हैं कि 'चरित्र' अब केवल शब्दकोशों और उपदेशकों के भाषणों में ही जीवित है, वास्तविक जीवन से लुप्त हो चुका है। सेवा-भावना समाप्त होकर 'मेवा' (स्वार्थ-लाभ) बटोरने की प्रवृत्ति ने ले ली है — प्राचीन सूक्ति 'सेवाहि परमो धर्मः' के स्थान पर मानो अब 'मेवाहि परमो धर्मः' प्रचलित हो गया हो, ऐसा तीखा व्यंग्य लेखक करते हैं।

साक्षात्कार का सार — भाग 2: 'कुर्सी' का यथार्थ और भविष्य की आशा

बातचीत आगे बढ़ने पर गंगा मैया बताती हैं कि व्यापारी लोग उनमें स्नान करके, जय-जयकार करके भी बाद में उन्हीं के जल को मलिन करते हैं — यह पाखंड और धर्म का व्यापारीकरण दोनों को उजागर करता है। राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई पर गंगा मैया व्यंग्य करती हैं कि असली झगड़ा किसी सिद्धांत का नहीं, बल्कि 'कुर्सी' का है — और कुर्सी का अर्थ है शक्ति, वैभव, धन, सम्मान और कीर्ति। एक बार इसका स्वाद चख लेने पर व्यक्ति मजनूं की तरह उसके पीछे भटकता रहता है।

आगे गंगा मैया समाज में बढ़ती पाशविकता के उदाहरण देती हैं — एक सर्प का मनुष्य के संपर्क से आत्महत्या कर लेना (मनुष्य की क्रूरता को दर्शाने वाला व्यंग्यात्मक अतिशयोक्ति-अलंकार), भूमि के लिए एक पुत्र द्वारा अपनी माँ की हत्या, तथा स्त्रियों पर होते अत्याचार — ये सभी घटनाएँ गंगा मैया के दुःख और उनमें बढ़ते 'प्रदूषण' का वास्तविक कारण हैं। साक्षात्कार के अंत में, भविष्य के विषय में पूछे जाने पर गंगा मैया आशा भरा उत्तर देती हैं — प्रकृति सर्वशक्तिमान है, और जब पतन अपनी पराकाष्ठा (चरम सीमा) पर पहुँच जाता है, तभी पुनः उत्थान की किरणें फूटती हैं।