एक-वाक्य/वाक्यांश में उत्तर (1 अंक)
लेखक ने किनसे साक्षात्कार लिया है? उत्तर: गंगा मैया से।
लेखक मकर-संक्रांति के दिन कहाँ थे? उत्तर: इलाहाबाद में।
माँ कहाँ विराज रही थी? उत्तर: मंदिर में।
माँ के चेहरे पर क्या थी? उत्तर: उदासी।
किसका संकट चर्चा का विषय बना हुआ है? उत्तर: चरित्र का संकट।
गंगा मैया ने सत्य को क्या कहा है? उत्तर: निर्भय — सत्य को किसी का डर नहीं होता।
किसका व्यापारीकरण हो रहा है? उत्तर: धर्म का।
असली झगड़ा किसके बारे में है? उत्तर: कुर्सी (सत्ता) के बारे में।
मनुष्य के कुकर्मों पर कौन हँसने लगे हैं? उत्तर: पशु-पक्षी।
गंगा मैया ने किसे सर्वशक्तिमान कहा है? उत्तर: प्रकृति को।
पुनः उत्थान की किरणें कब फूटती हैं? उत्तर: जब पतन की पराकाष्ठा हो जाती है।
लघु-उत्तरीय प्रश्न (2/3 अंक)
प्रश्न 1: प्रदूषण के संबंध में गंगा मैया ने क्या कहा है?
उत्तर: गंगा मैया कहती हैं कि देश का संपूर्ण वातावरण ही प्रदूषित हो गया है, इसलिए वे स्वयं भी इससे अछूती नहीं रह सकतीं। व्यापारी लोग उनमें स्नान करके, जय-जयकार करके, तिलक-छापे लगाकर भी बाद में उन्हीं के निर्मल जल को मलिन करते हैं — यही उनके प्रदूषित होने का असली कारण है।
प्रश्न 2: समाज में कौन-कौन सी समस्याएँ बढ़ रही हैं?
उत्तर: पाठ के अनुसार समाज में महँगाई, रिश्वतखोरी और पाशविकता निरंतर बढ़ रही है। धर्म का भी व्यापारीकरण हो रहा है, राजनीतिक दल आपस में तथा दलों के भीतर भी लड़ते हैं, चरित्र का पतन हो चुका है, और कुछ प्रतिष्ठित लोग डाकुओं से भी मधुर संबंध बनाने लगे हैं।
प्रश्न 3: गंगा मैया का कुर्सी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: गंगा मैया के अनुसार 'कुर्सी' से तात्पर्य शक्ति, वैभव, धन, सम्मान और कीर्ति से है। उनके अनुसार एक बार इस सत्ता के 'स्वाद' का अनुभव हो जाने पर व्यक्ति उसका आदी हो जाता है और उसके पीछे मजनूं की तरह भटकता रहता है।
दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न (4/5 अंक)
प्रश्न 1: 'गंगा मैया से साक्षात्कार' पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: मकर संक्रांति के दिन लेखक इलाहाबाद में गंगा मैया से साक्षात्कार लेता है। उदास मुद्रा में विराजमान माँ बताती हैं कि देश का संपूर्ण वातावरण प्रदूषित होने के कारण वे भी प्रदूषण से अछूती नहीं रहीं। बातचीत आगे बढ़ने पर वे 'चरित्र के संकट' पर बोलती हैं — चरित्र अब केवल शब्दकोशों और उपदेशों में सीमित रह गया है, सेवा-भाव का स्थान स्वार्थ-लाभ ने ले लिया है। व्यापारी उनमें स्नान करके जय-जयकार करते हैं पर बाद में उन्हीं को मलिन करते हैं — यह धर्म के व्यापारीकरण को दर्शाता है। राजनीतिक दलों के आपसी झगड़े का असली कारण 'कुर्सी' यानी सत्ता-लोलुपता है। गंगा मैया समाज में बढ़ती पाशविकता के कई उदाहरण देती हैं — भूमि के लिए पुत्र द्वारा माँ की हत्या, स्त्रियों पर अत्याचार आदि। अंत में, भविष्य के प्रश्न पर गंगा मैया आशा जताती हैं कि प्रकृति सर्वशक्तिमान है और पतन की पराकाष्ठा के बाद पुनः उत्थान अवश्य होता है।
प्रश्न 2: लेखक ने गंगा मैया के माध्यम से समाज की किन विसंगतियों पर व्यंग्य किया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: लेखक ने इस व्यंग्यात्मक साक्षात्कार में अनेक सामाजिक विसंगतियों को उजागर किया है। सर्वप्रथम, पर्यावरण-प्रदूषण के माध्यम से मनुष्य की स्वार्थपरता को दिखाया गया है। दूसरा, चरित्र के पतन और सेवा-भावना के लोप को 'सेवाहि परमो धर्मः' के स्थान पर 'मेवाहि परमो धर्मः' कहकर व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। तीसरा, धर्म के व्यापारीकरण और भक्तों के पाखंड को व्यापारियों के आचरण के माध्यम से दिखाया गया है। चौथा, राजनीति में सत्ता-लोलुपता को 'कुर्सी' के प्रतीक द्वारा उजागर किया गया है। अंततः, पारिवारिक व सामाजिक मूल्यों के पतन को भूमि के लोभ में माँ की हत्या जैसी घटनाओं से दिखाया गया है। इस प्रकार लेखक हास्य-व्यंग्य की शैली में गंभीर सामाजिक यथार्थ को उजागर करते हैं, फिर भी अंत में आशा का संदेश देना नहीं भूलते।
संदर्भ स्पष्टीकरण कीजिए (2/3 अंक प्रत्येक)
1. 'वत्स, देश का वातावरण ही जब प्रदूषित हो गया तब मैं कैसे बच सकती थी।' संदर्भ एवं स्पष्टीकरण: यह गंगा मैया ने पत्रकार के प्रदूषण संबंधी प्रश्न के उत्तर में कहा। यह पंक्ति दर्शाती है कि पर्यावरण-प्रदूषण संपूर्ण समाज की स्वार्थपरता का परिणाम है, जिससे पवित्रतम वस्तुएँ भी अछूती नहीं रह सकतीं।
2. 'बेटा, शब्दकोशों में उसका नाम शेष है, उपदेशकों के प्रयोग में भी आ रहा है।' संदर्भ एवं स्पष्टीकरण: गंगा मैया ने यह 'चरित्र' के अस्तित्व के बारे में पूछे जाने पर कहा। यह पंक्ति व्यंग्यपूर्वक बताती है कि नैतिक मूल्य अब केवल शब्दों और उपदेशों तक सीमित रह गए हैं, वास्तविक आचरण में नहीं दिखते।
3. 'सेवाहि परमो धर्मः' के स्थान पर लोग 'मेवाहि परमो धर्मः' कहने लगे हैं। संदर्भ एवं स्पष्टीकरण: यह गंगा मैया की टिप्पणी है, जब वे बताती हैं कि सेवा-भावना समाप्त हो चुकी है। यह शब्द-क्रीड़ा निःस्वार्थ सेवा के स्थान पर स्वार्थ-लाभ की प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य करती है।
4. 'एक बार जबान पे चढ़ जाए तो फिर कुछ अच्छा नहीं लगता।' संदर्भ एवं स्पष्टीकरण: गंगा मैया ने यह 'कुर्सी' (सत्ता) के स्वभाव के बारे में कहा। यह पंक्ति सत्ता की लत और उसके पीछे की अंधी दौड़ को स्पष्ट करती है।
5. 'पतन की जब पराकाष्ठा हो जाती है तभी पुनः उत्थान की किरणें फूटती हैं।' संदर्भ एवं स्पष्टीकरण: यह साक्षात्कार की समापन पंक्ति है, जो गंगा मैया ने भविष्य के विषय में पूछे जाने पर कही। यह पंक्ति आशावाद व्यक्त करती है कि पतन के चरम के बाद पुनर्निर्माण अवश्यंभावी है।