गज़ल: 'हो गई है पीर पर्वत-सी' (मूल पाठ)
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| पीर | पीड़ा |
| पर्वत-सी | पर्वत के समान |
| बुनियाद | नींव |
| लाश | निर्जीव शरीर |
| हंगामा | शोर |
| सीना | हृदय |
| मकसद | उद्देश्य |
| सूरत | स्थिति, रूप |
भावार्थ (शेर-दर-शेर व्याख्या)
प्रथम शेर (मतला): कवि कहते हैं कि जनता की पीड़ा अब पर्वत के समान विशाल और स्थिर हो गई है — अब समय आ गया है कि यह पीड़ा पिघले, अर्थात् दुख का यह विशाल पहाड़ अब समाप्त होना चाहिए। जिस प्रकार हिमालय से गंगा निकलती है, उसी प्रकार इस संचित पीड़ा से भी कोई क्रांतिकारी परिवर्तन (गंगा रूपी मुक्ति की धारा) निकलनी चाहिए।
द्वितीय शेर: कवि व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि आज केवल ऊपरी, दिखावटी ढाँचा (दीवार) पर्दों की तरह काँपने लगा है — अर्थात् सतही तौर पर कुछ बदलाव दिख रहे हैं। परंतु कवि की शर्त यह थी कि व्यवस्था की वास्तविक जड़ (बुनियाद) हिलनी चाहिए थी, न कि केवल ऊपरी आवरण। यह भ्रष्ट व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन की माँग है, न कि दिखावटी सुधार की।
तृतीय शेर: कवि चाहते हैं कि हर सड़क, हर गली, हर नगर और हर गाँव में शोषित और निष्क्रिय (लाश की तरह मृतप्राय) लोग भी जाग उठें और हाथ लहराते हुए विरोध में चलें। यह एक अत्यंत शक्तिशाली प्रतीक है — मृत (निराश, हताश, अन्याय सहते हुए जीवित) लोगों का भी जागृत होकर क्रांति में शामिल होना।
चतुर्थ शेर: कवि स्पष्ट करते हैं कि उनका उद्देश्य केवल शोर-हंगामा या अराजकता फैलाना नहीं है। उनकी वास्तविक कोशिश यह है कि समाज की वास्तविक स्थिति (सूरत) में सकारात्मक परिवर्तन आए — यह उनकी रचनात्मक और उद्देश्यपूर्ण विद्रोह-भावना को दर्शाता है।
पंचम शेर (मक्ता): कवि कहते हैं कि क्रांति की यह आग चाहे उनके अपने हृदय (सीने) में जले या किसी और के हृदय में, परंतु यह आग कहीं-न-कहीं अवश्य जलनी चाहिए। यह सामाजिक चेतना और परिवर्तन की अनिवार्यता तथा सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को उजागर करता है — व्यक्ति विशेष का श्रेय महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि परिवर्तन का घटित होना महत्वपूर्ण है।
अलंकार एवं काव्य-सौंदर्य
उपमा अलंकार: 'पीर पर्वत-सी' में पीड़ा की तुलना पर्वत से की गई है।
प्रतीकात्मकता: 'हिमालय' संचित पीड़ा/स्थिर व्यवस्था का प्रतीक है, और 'गंगा' मुक्ति/क्रांति/शुद्धिकरण का प्रतीक है। 'दीवार' सतही व्यवस्था का प्रतीक है और 'बुनियाद' मूल भ्रष्ट ढाँचे का प्रतीक है।
विरोधाभास/विडंबना अलंकार: 'हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए' में एक गहरा विरोधाभास है — लाश (मृत शरीर) का हाथ लहराते हुए चलना असंभव प्रतीत होता है, परंतु यहाँ यह प्रतीकात्मक रूप से निष्क्रिय, हताश जनता के क्रांतिकारी जागरण को दर्शाता है।
अनुप्रास अलंकार: 'हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में' में 'हर' शब्द की आवृत्ति से अनुप्रास तथा व्यापकता का भाव उत्पन्न होता है।
गज़ल की संरचना: प्रत्येक शेर स्वतंत्र होते हुए भी एक ही भाव (सामाजिक जागरण एवं परिवर्तन) के इर्द-गिर्द क्रमशः विकसित होता है — यह दुष्यन्त कुमार की गज़ल-शैली की विशिष्टता है।
रस: इस गज़ल में वीर रस एवं विद्रोह-भावना प्रधान है, साथ ही सामाजिक अन्याय के प्रति करुण रस की झलक भी विद्यमान है। समग्र रूप से यह ओजपूर्ण, क्रांतिकारी काव्य की श्रेणी में आती है।