पात्र-परिचय

  • भारवि — संस्कृत के महाकवि, श्रीधर और सुशीला के पुत्र।
  • श्रीधर — संस्कृत के महापण्डित, भारवि के पिता; अनुशासन और शास्त्र-चिंतन में दृढ़ विश्वास रखने वाले।
  • सुशीला — भारवि की माता; पुत्र के प्रति गहन वात्सल्य और चिंता से भरी हुई।
  • भारती — एक विदुषी, भारवि की प्रशंसिका, जो उसके शास्त्रार्थ से अत्यंत प्रभावित है।
  • आभा — सुशीला की सेविका।

कठिन शब्दार्थ

शब्द अर्थ
स्थावर अचल वस्तुएँ (जो चल नहीं सकतीं)
जंगम चलने वाले (जीव-जंतु)
आच्छादित ढका हुआ
परित्याग त्याग
ताड़ना डाँट-फटकार
दम्भी अहंकारी, घमंडी
निर्वासित देश-निकाला दिया हुआ
अनुशासन नियम-पालन
मर्यादा सीमा, गरिमा
उद्विग्नता बेचैनी, व्याकुलता
कौशेय रेशमी (वस्त्र)
अधोवस्त्र नीचे पहनने का वस्त्र (धोती)
उत्तरीय ऊपर से ओढ़ने का वस्त्र
कुंचित केश घुँघराले बाल
उषा-बेला प्रातःकाल का समय
प्रतिशोध प्रतिकार, बदला
धारणा विचार
व्याकुलता चिंता, बेचैनी
विद्वता पांडित्य
अतिक्रमण करना सीमा लांघना
उग्र तेज़, प्रचंड
परिहास मज़ाक
व्यथित दुखी
पतित गिरा हुआ
देशान्तर देश छोड़कर जाना
भर्त्सना निंदा
मीमांसा विचारपूर्वक तत्व-निर्णय
कृतार्थ सफल, संतुष्ट
प्रफुल्लित खिला हुआ
अंकुश नियंत्रण
झंझा तेज़ हवा
वांछित इच्छित
लांछित कलंकित
जघन्य बहुत बुरा
विद्वत्मंडली विद्वानों की सभा
शूल काँटा
ग्रीवा गर्दन

प्रथम दृश्य का सार एवं विश्लेषण

आरंभिक श्लोक: एकांकी का आरंभ श्रीधर द्वारा ईशोपनिषद् के प्रसिद्ध श्लोक के पाठ से होता है — "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित् जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥" अर्थात् जगत् में जो कुछ स्थावर और जंगम है, वह सब ईश्वर द्वारा आच्छादित है — मनुष्य को त्याग-भाव से जीवन का उपभोग करना चाहिए, किसी के धन का लोभ नहीं करना चाहिए। श्रीधर सुशीला को यह श्लोक समझाने का प्रयास करते हैं, परंतु सुशीला का ध्यान भारवि की चिंता में खोया हुआ है।

माता-पिता का द्वंद्व: सुशीला बार-बार भारवि की चिंता व्यक्त करती है, जबकि श्रीधर उसे शास्त्र-चिंतन में मन लगाने की सलाह देते हैं। यहाँ माता के वात्सल्य-भाव (ममता) और पिता के दार्शनिक/अनुशासनप्रिय स्वभाव के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से उभरता है। सुशीला श्रीधर पर आरोप लगाती है कि उन्हीं की कठोरता के कारण भारवि घर नहीं आया।

संघर्ष का खुलासा: संवाद के दौरान पता चलता है कि श्रीधर ने भारवि को पंडितों के समक्ष ही कड़ी भर्त्सना की थी — उसे 'महामूर्ख', 'दंभी' और 'अज्ञानी' कहा था — क्योंकि शास्त्रार्थों में विजय के बाद भारवि अहंकारी हो गया था। इस सार्वजनिक अपमान से आहत होकर पंडितों ने भी भारवि का उपहास किया, जिससे भारवि व्यथित दृष्टि से पिता की ओर देखकर, ग्लानि से मुख छिपाकर वहाँ से चला गया।

श्रीधर का पक्ष: श्रीधर स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने अनुशासन की मर्यादा के लिए यह कठोरता दिखाई, क्योंकि पिता होने के नाते वे नहीं चाहते कि उनका पुत्र दंभी (अहंकारी) बने। वे कहते हैं कि 'अनुशासन के स्थान पर अनुशासन और प्रेम के स्थान पर प्रेम है — प्रेम पर ही अनुशासन निर्धारित है और अनुशासन पर ही प्रेम' — अर्थात् सच्चा प्रेम और अनुशासन परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।

सेविका आभा एवं विदुषी भारती का आगमन: सेविका आभा सुशीला को भोजन करने का आग्रह करती है, परंतु चिंतित सुशीला भोजन करने से इंकार कर देती है। इसी बीच भारवि से परिचित एक विदुषी भारती आती है, जो बताती है कि उसने प्रातःकाल भारवि को मालिनी नदी के तट पर ध्यानमग्न अवस्था में देखा था, परंतु वह अत्यंत उद्विग्न (बेचैन) प्रतीत हो रहा था। भारती भारवि की विद्वता की भूरि-भूरि प्रशंसा करती है, कहती है कि उसके शास्त्रार्थ में मानो 'ब्रह्म-ज्ञान सरस्वती की वीणा पर नृत्य कर रहा हो'।

दृश्य का अंत: श्रीधर सुशीला को आश्वासन देते हैं कि वे प्रातःकाल सभी जनपदों में जाकर भारवि को खोजकर लाएँगे, और यदि आवश्यक हुआ तो राजकीय सहायता भी लेंगे। श्रीधर सुशीला को तारों के उदाहरण से समझाते हैं कि जैसे आकाश के तारे एक-दूसरे से दूर होकर भी चिंतित नहीं होते, वैसे ही उसे भी ईश्वर की शक्ति पर विश्वास रखना चाहिए। दृश्य के अंत में द्वार पर हवा से हुई आवाज़ को सुनकर सुशीला को क्षणभर के लिए आशा जगती है कि शायद भारवि लौट आया है — परंतु यह मात्र हवा का झोंका निकलता है, जो नाटकीय तनाव को और गहरा करता है।

द्वितीय (चरम) दृश्य का सार एवं विश्लेषण

भारवि का आगमन: श्रीधर सुशीला को शांत करने का प्रयास ही कर रहे थे कि एकाएक द्वार खोलने की तीखी आवाज़ होती है — हाथ में तलवार लिए, लड़खड़ाते हुए भारवि प्रवेश करता है। माता-पिता दोनों एक साथ चौंककर पुकार उठते हैं — "भारवि!" सुशीला विह्वल होकर पूछती है कि वह इतना निष्ठुर कैसे हो गया और दो दिनों तक कहाँ था, जबकि वह स्वयं दो दिनों से बिना भोजन किए उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।

मस्तक काटने की याचना: ग्लानि से भरा भारवि स्वयं को पिता का पुत्र कहलाने योग्य नहीं मानता और तलवार सौंपकर अपना मस्तक काट देने का अनुरोध करता है। श्रीधर उसे 'मूर्ख' और 'विकल-बुद्धि' कहकर फटकारते हुए स्पष्ट करते हैं कि उनके वचनों को तलवार के प्रमाण की आवश्यकता नहीं — तलवार का प्रमाण तो निर्बलों (कमज़ोरों) का प्रमाण है। भारवि तर्क देता है कि यह तलवार उसकी ग्लानि को, जो झंझा (तेज़ आँधी) की भाँति उसके जीवन को झकझोर रही है, काट देगी।

प्रतिशोध का रहस्योद्घाटन: भारवि पिता के समक्ष अपनी निर्बलता स्वीकार करते हुए बताता है कि पिछले दो दिनों का उसका आचरण 'प्रतिशोध' की भावना से प्रेरित था — शास्त्रार्थ में विजयी होने पर जब पिता ने पंडितों के समक्ष सार्वजनिक रूप से उसे लांछित (कलंकित) किया, तो वही पराजित पंडित उसका उपहास करने लगे। क्रोध और ग्लानि में डूबा भारवि सोचता रहा कि जब तक पिता जीवित हैं, वह इसी प्रकार अपमानित होता रहेगा। आत्महत्या को जघन्य पाप मानते हुए उसने आठ पहर तक मंथन किया और अंततः पिता के जीवन को समाप्त करने का भयावह निश्चय कर लिया — संध्या से ही घर के कोने में छिपकर वह प्रतीक्षा करता रहा कि आधी रात में माता-पिता निद्रा में लीन हों तो वह दबे पाँव आकर पिता की ग्रीवा (गर्दन) पर तलवार रख दे।

हृदय-परिवर्तन एवं दंड की याचना: किन्तु यह भीषण कार्य वह कर नहीं सका। पिता की महानता के आगे नतमस्तक होकर वह स्वयं को 'नारकीय पुत्र' और 'पापी' कहते हुए प्रायश्चित-स्वरूप अपना मस्तक कटवाने की भीख माँगता है। श्रीधर शांत स्वर में कहते हैं कि वे न तो प्रतिशोध लेते हैं, न भिक्षा देते हैं, और चूँकि भारवि का पाप अब स्थिर नहीं रहा (उसने वास्तव में हत्या नहीं की), अतः दंड की आवश्यकता नहीं। किन्तु भारवि आत्मिक शांति के लिए शास्त्रोचित दंड पर अड़ा रहता है, यहाँ तक कि जीवन को दंड मानकर आत्महत्या तक की बात सोचने लगता है।

छह मास का प्रायश्चित: अंततः श्रीधर दंड की घोषणा करते हैं — छह मास तक श्वसुराल (ससुराल) में जाकर सेवा करना और जूठे भोजन पर अपना पोषण करना। भारवि तुरंत इसे स्वीकार करता है, तलवार फेंक देता है (मित्र विजयघोष के पास पहुँचाने का अनुरोध करते हुए) और तत्काल प्रायश्चित आरंभ करने की आज्ञा माँगता है। भावुक सुशीला उसे अपने हाथों से भोजन कराना चाहती है, पर भारवि विनम्रतापूर्वक मना करते हुए कहता है कि छह महीने बाद ही वह उन हाथों से भोजन करेगा। माता-पिता दोनों के चरणों की धूलि सिर पर रखकर वह विदा लेता है — जाते-जाते नेपथ्य से उसका स्वर गूँजता है: "प्रतिशोध-प्रतिशोध" — जो अब हिंसा का नहीं, बल्कि अपने ही अहंकार से लिए गए आत्म-प्रतिशोध का प्रतीक बन जाता है, जिससे शीर्षक की विडंबनापूर्ण सार्थकता पूर्ण होती है।