प्रश्न: 'प्रतिशोध' शीर्षक कितना सार्थक है, स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: 'प्रतिशोध' शीर्षक इस एकांकी के केंद्रीय द्वंद्व को सटीकता से दर्शाता है। पिता श्रीधर द्वारा पंडितों के समक्ष सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने पर भारवि के मन में क्रोध और अपमान की तीव्र भावना जन्म लेती है, जो प्रतिशोध (बदले) की इच्छा में परिवर्तित हो जाती है — वह तलवार से पिता की हत्या करने तक का विचार कर बैठता है। परंतु एकांकी का वास्तविक कौशल यह है कि यह शीर्षक विडंबनापूर्ण (ironic) रूप से प्रयुक्त हुआ है — अंततः 'प्रतिशोध' हिंसा से नहीं, बल्कि आत्म-सुधार, प्रायश्चित और पितृ-आज्ञा-पालन से पूर्ण होता है। भारवि अपने अहंकार पर विजय प्राप्त करके ही वास्तविक 'प्रतिशोध' लेता है — स्वयं को महाकवि के रूप में सिद्ध करके। इस प्रकार शीर्षक क्रोध से ज्ञान और विनाश से सृजन की यात्रा को उजागर करता है।

प्रश्न: श्रीधर के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: श्रीधर एक महापण्डित हैं, जो शास्त्र-ज्ञान और अनुशासन में दृढ़ विश्वास रखते हैं। वे अपने पुत्र भारवि से गहरा प्रेम करते हैं, परंतु यह प्रेम अंधा नहीं है — वे स्पष्ट रूप से समझते हैं कि यदि भारवि का अहंकार समय रहते न रोका गया, तो वह अपनी महानता की ओर अग्रसर नहीं हो पाएगा। इसीलिए वे कठोर निर्णय लेकर सार्वजनिक रूप से पुत्र को फटकारते हैं, भले ही इससे पत्नी सुशीला और स्वयं उन्हें भी पीड़ा हो। श्रीधर का यह कथन कि 'प्रेम पर ही अनुशासन निर्धारित है और अनुशासन पर ही प्रेम' उनके चरित्र की गहराई और परिपक्वता को दर्शाता है — वे प्रेम और अनुशासन को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक मानते हैं। अंत में जब भारवि प्रायश्चित माँगता है, तब भी वे दंड देकर पुत्र के दीर्घकालिक कल्याण को प्राथमिकता देते हैं।

प्रश्न: सुशीला के चरित्र की मानसिक दशा का वर्णन कीजिए।

उत्तर: सुशीला एक विशिष्ट माता के रूप में चित्रित हैं, जिनका संपूर्ण अस्तित्व अपने पुत्र भारवि के प्रति वात्सल्य (ममता) से आबद्ध है। जब भारवि दो दिनों तक घर नहीं लौटता, तो वह अत्यंत व्याकुल और चिंतित हो जाती है — वह भोजन तक करना छोड़ देती है, नींद नहीं आती, और हर आहट पर उसे लगता है कि शायद भारवि लौट आया है। वह अपने पति श्रीधर पर आरोप लगाती है कि उनकी कठोरता के कारण ही भारवि घर नहीं आया, और तर्क करती है कि शास्त्रार्थ के नियमों में माता का हृदय नहीं बाँधा जा सकता। सुशीला का यह पात्र मातृ-वात्सल्य की गहनतम, सबसे मार्मिक अभिव्यक्ति है — वह तर्क और शास्त्र-ज्ञान से परे, केवल हृदय से सोचती और महसूस करती है।

प्रश्न: 'प्रतिशोध' एकांकी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तर: यह एकांकी अनेक गहन जीवन-शिक्षाएँ देती है। सर्वप्रथम, यह दर्शाती है कि अहंकार व्यक्ति की सबसे बड़ी शत्रु है — चाहे वह कितना भी विद्वान या प्रतिभाशाली क्यों न हो, अहंकार उसकी वास्तविक उन्नति में बाधक बनता है। दूसरे, यह सिखाती है कि सच्चा अनुशासन और प्रेम परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं — पिता की कठोरता वास्तव में पुत्र के कल्याण की कामना से प्रेरित थी। तीसरे, यह दर्शाती है कि क्रोध और प्रतिशोध की भावना में की गई किसी भी हिंसक कार्रवाई से पहले आत्म-चिंतन आवश्यक है — भारवि का हृदय-परिवर्तन इस बात का प्रमाण है। अंततः, यह सिखाती है कि प्रायश्चित और विनम्रता से ही सच्ची महानता प्राप्त होती है — भारवि दंड स्वीकार करके ही 'महाकवि भारवि' बनता है।

संदर्भ सहित भाव स्पष्ट कीजिए:

"अनुशासन के स्थान पर अनुशासन और प्रेम के स्थान पर प्रेम है। प्रेम पर ही अनुशासन निर्धारित है और अनुशासन पर ही प्रेम | यदि प्रेम न हो तो अनुशासन का कोई मूल्य नहीं।"

संदर्भ: यह कथन डॉ. रामकुमार वर्मा रचित एकांकी 'प्रतिशोध' में श्रीधर द्वारा अपनी पत्नी सुशीला से कहा गया है, जब वह उनकी कठोरता पर प्रश्न उठाती है।

भाव स्पष्टीकरण: इन शब्दों में श्रीधर स्पष्ट करते हैं कि प्रेम और अनुशासन परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के अभिन्न अंग हैं। सच्चा अनुशासन प्रेम से ही जन्म लेता है, और सच्चा प्रेम अनुशासन के बिना अधूरा है — यदि माता-पिता केवल स्नेह दिखाएँ परंतु अनुशासन न सिखाएँ, तो संतान का चरित्र-निर्माण अधूरा रह जाता है। श्रीधर का यह दर्शन दर्शाता है कि उनकी कठोरता वास्तव में गहरे प्रेम से ही प्रेरित थी, न कि निष्ठुरता से — यह कथन एकांकी के केंद्रीय दार्शनिक संदेश को व्यक्त करता है।