एकांकीकार परिचय: उपेन्द्रनाथ 'अश्क'
प्रसिद्ध साहित्यकार उपेन्द्रनाथ 'अश्क' जी का जन्म 1910 ई. में पंजाब के जालंधर शहर के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उनकी बहुमुखी प्रतिभा साहित्य की विविध विधाओं में प्रवृत्त हुई है। वे एकांकी-कला क्षेत्र में यथार्थवादी परम्परा का सूत्रपात करने वाले प्रमुख एकांकीकारों में से हैं। 'अश्क' जी के सभी एकांकी आज के जन-जीवन से संपृक्त (जुड़े) हैं, जिनमें यथार्थवाद की ठोस अनुभूति एवं मानसिक भावों का सूक्ष्म विश्लेषण रहता है।
भाषा-प्रयोग में 'अश्क' जी अत्यंत निपुण हैं — वातावरण एवं पात्रानुकूल भाषा उनके समस्त एकांकियों में परिलक्षित होती है। उन्होंने उर्दू एवं अंग्रेज़ी के शब्दों और वाक्यांशों का खुलकर प्रयोग किया है। 1965 ई. में श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उन्हें केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी की ओर से सर्वश्रेष्ठ नाटककार के सम्मान से अलंकृत किया गया।
गद्य की विभिन्न विधाओं — कहानी, नाटक, एकांकी, उपन्यास, संस्मरण, समालोचना आदि — में विशिष्ट योगदान के लिए 1972 ई. में उन्हें सोवियतलैंड नेहरू पुरस्कार से नवाजा गया। उनकी मृत्यु 1996 ई. में हुई।
प्रमुख रचनाएँ:
- एकांकी-संग्रह: देवताओं की छाया में, तूफान से पहले, चरवाहे, पक्का गाना, साहब को जुकाम है आदि।
- उपन्यास: सितारों के खेल, गिरती दीवारें, गर्म राख, निमिषा आदि।
[Exam Tip] उपेन्द्रनाथ 'अश्क' को हिन्दी एकांकी-साहित्य में यथार्थवादी परंपरा के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है — यह तथ्य परीक्षा में महत्वपूर्ण है।
एकांकी की पृष्ठभूमि एवं सम्पूर्ण कथासार
प्रस्तुत एकांकी 'सूखी डाली' में एक संयुक्त (सम्मिलित) परिवार का चित्रण है, जो शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था तथा जिसकी यह मान्यता थी कि संयुक्त परिवार एक विशाल वट वृक्ष की हरी-भरी डाली के समान है। इसमें व्यक्ति, परिवार और समाज में व्यापक रूप से व्याप्त आधुनिक संघर्ष और मनोवैज्ञानिक स्थितियों को बड़ी सूक्ष्मता से नियोजित किया गया है।
पारिवारिक पृष्ठभूमि: दादा जी (72 वर्ष) एक विशाल वट वृक्ष के समान अटल और सम्मानित व्यक्ति हैं। उनका बड़ा पुत्र 1914 के महायुद्ध में लड़ते हुए शहीद हुआ था, जिसके बदले सरकार ने दादा को एक मुरब्बा भूमि दी — परंतु दादा ने अपने साहस, परिश्रम, निष्ठा और दूरदर्शिता से उसे दस मुरब्बों में बदल दिया। उनके दो पुत्र और पौत्र भूमि, फार्म, डेयरी और चीनी के कारखाने की देखभाल करते हैं। उनका सबसे छोटा पौत्र परेश हाल ही में नायब तहसीलदार बना है और उसका विवाह लाहौर के एक प्रतिष्ठित, संपन्न व सुशिक्षित परिवार की पुत्री बेला से हुआ है।
संघर्ष का आरंभ: दादा जी के संयुक्त परिवार में छोटी बहू (बेला) के आ जाने से जो हलचल मच जाती है, वह सभी की चर्चा का विषय बन जाती है। बेला, जो एक शिक्षित (ग्रेजुएट) और संपन्न परिवार से आई है, घर के सीधे-साधे सदस्यों — बड़ी भाभी, मँझली भाभी, छोटी भाभी (उसकी सास), इन्दु (दादा की पौत्री) आदि — के साथ तालमेल नहीं बिठा पाती। वह घर की पुरानी नौकरानी रजवा (मिश्रानी) को काम से निकाल देती है क्योंकि उसे 'सही ढंग' से सफाई करना नहीं आता — यह घटना और बेला की अपने मायके की तुलना में यहाँ के सभी लोगों को 'गँवार' कहने की आदत से पूरे परिवार में असंतोष फैल जाता है।
दादा जी का हस्तक्षेप: परेश अपने पितामह (दादा) के पास जाकर बताता है कि बेला का इस घर में मन नहीं लगता — सब उसकी आलोचना करते हैं, वह स्वयं को परायों के बीच अनुभव करती है, और वह अलग गृहस्थी (बाग वाला मकान) बसाना चाहती है ताकि वह स्वतंत्रतापूर्वक जीवन बिता सके। दादा जी गहन चिंतन करते हैं — उनके सामने वट वृक्ष का प्रतीक उभरता है, और वे सोचते हैं कि यदि परिवार से एक डाली (शाखा) अलग हो जाए तो वह वृक्ष केवल दूँठ (ठूँठ) रह जाएगा। वे दृढ़ निश्चय करते हैं कि अपने जीते-जी वे परिवार को टूटने नहीं देंगे, परंतु साथ ही यह भी समझते हैं कि बेला के साथ सही व्यवहार आवश्यक है।
समाधान एवं परिणाम: दादा जी अपने पूरे परिवार को बुलाकर समझाते हैं। इसके बाद घर के सभी सदस्य बेला के प्रति एक भिन्न, स्नेहपूर्ण व्यवहार आरंभ कर देते हैं। किन्तु जब बेला को अत्यधिक स्नेह और अपेक्षा से असहज होकर दम घुटता-सा प्रतीत होता है, तो अंततः वह इन्दु के समक्ष आत्मसमर्पण कर देती है — अर्थात् वह स्वयं संयुक्त परिवार के मूल्यों को अपनाकर परिवार में सहर्ष घुल-मिल जाती है और गृह-कार्य में सहयोग देने लगती है।
केंद्रीय संदेश: श्री गंगा प्रसाद पाण्डेय का यह कथन कितना सार्थक है कि दादा-रूपी वट वृक्ष की छाया में परिवार के भीतर चलने वाले संघर्ष की चरम अभिव्यक्ति बेला (छोटी बहू) के इन शब्दों से स्पष्ट होती है — "दादा जी पेड़ से किसी डाली का टूटकर अलग होना पसंद नहीं करते, पर क्या आप चाहेंगे कि पेड़ से लगी-लगी वह डाल सूख कर मुरझा जाए…" संक्रांति-काल (परिवर्तन के दौर) की अस्त-व्यस्तता में व्यक्ति-वैचित्र्य (व्यक्तित्वों की भिन्नता) की यथार्थ झाँकी प्रस्तुत करने में यह नाटक पूर्ण सफल है।