प्रमुख पात्र-परिचय

पुरुष पात्र:

  • दादा — परिवार के मुखिया, 72 वर्षीय, वट वृक्ष के समान अटल एवं सम्मानित।
  • कर्मचन्द — परिवार के सदस्य।
  • परेश — दादा का सबसे छोटा पौत्र, नायब तहसीलदार, बेला का पति।
  • भाषी, मल्लू — परिवार के अन्य सदस्य।

स्त्री पात्र:

  • बेला (छोटी बहू) — परेश की पत्नी, लाहौर के प्रतिष्ठित परिवार से आई सुशिक्षित (ग्रेजुएट) युवती।
  • छोटी भाभी — बेला की सास, इन्दु की माँ।
  • मँझली भाभी, बड़ी भाभी — घर की अन्य बहुएँ।
  • मँझली बहू, बड़ी बहू — परिवार की अन्य स्त्रियाँ।
  • इन्दु — दादा की पौत्री, प्राइमरी शिक्षा प्राप्त, घर में सबसे अधिक पढ़ी-लिखी मानी जाने वाली तथा दादा की प्रिय पात्र।
  • रजवा — घर की पुरानी नौकरानी (मिश्रानी), जिसे बेला काम से हटा देती है।
  • पारो — परिवार की अन्य सदस्या।

कठिन शब्दार्थ

शब्द अर्थ
संपृक्त जुड़ा हुआ, संबद्ध
मुरब्बा भूमि की एक बड़ी इकाई (भूमि-नाप)
दूँठ (ठूँठ) पेड़ का वह भाग जो शाखाएँ कट जाने के बाद बचता है
संक्रान्ति काल परिवर्तन का समय/दौर
व्यक्ति-वैचित्र्य व्यक्तित्वों की विविधता/भिन्नता
असहयोगिनी सहयोग न देने वाली स्त्री
नायब तहसीलदार राजस्व विभाग का एक अधिकारी पद
उद्विग्नता व्याकुलता, बेचैनी
अन्यमनस्कता उदासीन/बिखरा हुआ ध्यान
तिलमिलाहट बेचैनी, व्याकुलता
सलीका ढंग, तरीका
फूहड़ अनगढ़, बेढंगा
गँवार असभ्य, अशिक्षित

प्रथम दृश्य का सार एवं विश्लेषण

रंगमंचीय परिवेश: पर्दा इमारत के बरामदे में खुलता है, जो घर की स्त्रियों का मिलन-स्थल (रांदेवू) है। यहाँ दिन भर स्त्रियाँ धूप लेती हैं, चरखे कातती हैं, गप्पें उड़ाती हैं, और कपड़े धोती हैं। दादा जी की विशेषताएँ — 72 वर्ष की आयु में भी अझुका शरीर और लंबी सफेद दाढ़ी — उन्हें वट वृक्ष जैसा महान दर्शाती हैं।

इन्दु और बड़ी बहू का संवाद: एकांकी का पहला प्रमुख संवाद इन्दु और बड़ी बहू के बीच होता है। इन्दु अत्यंत क्रोधित होकर गैलरी से निकलती है — उसने पाया है कि बेला (छोटी बहू) ने पुरानी नौकरानी रजवा (मिश्रानी) को यह कहकर काम से हटा दिया कि उसे सफाई करने का सलीका नहीं आता। इन्दु बताती है कि बेला बार-बार अपने मायके (लाहौर) की तुलना इस घर से करती है और यहाँ के सभी लोगों — नौकर, पड़ोसी, यहाँ तक कि परिवार — को 'गँवार' और 'फूहड़' कहती है। यह व्यवहार पूरे परिवार में गहरा असंतोष उत्पन्न करता है।

रजवा की शिकायत: छोटी भाभी (इन्दु की माँ, बेला की सास) रजवा को रोते हुए देखकर पूछताछ करती हैं। रजवा बताती है कि वर्षों की सेवा के बाद भी उसे इस प्रकार बिना कारण अनादरपूर्वक निकाल दिया गया।

परेश और दादा का संवाद: एकांकी के एक महत्वपूर्ण दृश्य में परेश अपने दादा के पास जाकर बताता है कि बेला का घर में मन नहीं लगता — वह स्वयं को परायों के बीच अनुभव करती है, सब उसकी आलोचना करते हैं, और वह अपनी अलग गृहस्थी (बाग वाला मकान) बसाना चाहती है ताकि वह स्वतंत्रतापूर्वक जीवन बिता सके। दादा जी शांत होकर सुनते हैं, हुक्का गुड़गुड़ाते हुए गहन चिंतन करते हैं। उनके सामने वट वृक्ष का प्रतीक उभरता है — शाखाओं, पत्तों, फलों-फूलों से भरा-पूरा वृक्ष, जिसकी डालियाँ टूटने लगती हैं और वह केवल दूँठ रह जाता है। यह कल्पना उन्हें सिहरा देती है।

दादा जी का निर्णय: दादा जी दृढ़ निश्चय करते हैं कि अपने जीते-जी वे परिवार को टूटने नहीं देंगे। वे परेश को आश्वासन देते हैं कि वे पूरे परिवार को समझाएँगे ताकि कोई बेला का तिरस्कार न करे और उसका समय नष्ट न करे। वे परेश को बेला के साथ बाज़ार जाकर उसकी पसंद की चीज़ें खरीदने के लिए भी कहते हैं। अंत में दादा जी रजवा के माध्यम से पूरे परिवार को (छोटी बहू को छोड़कर) अपने पास बुलाते हैं — यह आगामी पारिवारिक बैठक का संकेत है, जहाँ दादा जी सबको समझाकर बेला के प्रति व्यवहार बदलने का प्रयास करेंगे।