कठिन शब्दार्थ

परीक्षा में प्रायः इनमें से किसी एक शब्द का अर्थ पूछा जाता है (1 अंक)। इन्हें ध्यान से याद करें।

शब्द अर्थ
धूनी अग्निकुंड (साधुओं द्वारा जलाई जाने वाली पवित्र आग)
चारों पदार्थ पुरुषार्थ के चार लक्ष्य — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
डाँड़ खेत की मेड़ पर की मिट्टी/लकड़ी (जोताई के बाद डाँड़ फेंकना — मेड़ बनाना)
मड़ैया छोटा छप्पर (खेत में बना अस्थायी झोपड़ा)
फब्तियाँ व्यंग्य-भरी बातें
खुचड़ दोष, नुक्स
घोंघा निरुपयोगी, बेकार व्यक्ति (लाक्षणिक अर्थ)
छबड़ी छोटी टोकरी
करवीर / करवी पशुओं का चारा
गँड़ासा चारा काटने का औज़ार
कटिया कटा हुआ चारा
बखारी धान्य-भंडार (अनाज रखने का बड़ा कोठार)
भाट प्रशंसक, स्तुतिगायक
बेंग फसल की अमानत में दिया जाने वाला उधार
लाग लगन, लगाव, उत्साह
गैरत लज्जा, हया, शर्म

[Exam Tip] ब्लूप्रिंट के अनुसार 'रिक्त स्थान की पूर्ति' और 'शब्दार्थ' दोनों में इन्हीं कठिन शब्दों से प्रश्न बनते हैं — इसलिए वर्तनी (spelling) सहित याद रखें।

मुहावरे और उनके अर्थ

मुहावरे परीक्षा में एक स्वतंत्र इकाई (3 अंक) के रूप में भी पूछे जाते हैं और इस पाठ के अंतर्गत भी। नीचे दिए गए मुहावरे इसी पाठ से लिए गए हैं:

मुहावरा अर्थ
कंचन बरसना आमदनी बहुत बढ़ना
फूले न समाना अत्यधिक प्रसन्न होना
मुँह की खाना हार जाना, पराजित होना
पत-पानी बनाना सम्मान/प्रतिष्ठा बढ़ाना
दम न लेना बिना रुके कठिन परिश्रम करना
कमर सीधी करना थोड़ी देर आराम करना
तिनक जाना क्रोधित हो जाना, नाराज़ होना
नाम जगाना कीर्ति/यश प्राप्त करना

याद रखने की युक्ति: प्रत्येक मुहावरे को कहानी के उस दृश्य से जोड़कर याद करें जहाँ वह प्रयुक्त हुआ है — जैसे सुजान के धन कमाने पर 'कंचन बरसना', और अनादर से आहत सुजान का रातभर परिश्रम करना 'दम न लेना' दिखाता है।

व्याख्या — भाग 1

गद्यांश 1

"सीधे-सादे किसान धन हाथ आते ही धर्म और कीर्ति की ओर झुकते हैं। दिव्य समाज की भाँति वे पहले अपने भोग-विलास की ओर नहीं दौड़ते।"

प्रसंग: यह पंक्ति मुंशी प्रेमचंद रचित कहानी 'सुजान भगत' से ली गई है। यह कहानी के आरंभ में आती है, जब सुजान महतो की खेती से खूब धन प्राप्त होने लगता है।

व्याख्या: लेखक यहाँ ग्रामीण किसानों के स्वभाव की एक विशेषता बताते हैं — जब किसी सीधे-सादे किसान के पास अचानक धन आ जाता है, तो वह सबसे पहले उस धन को भोग-विलास (ऐशो-आराम) में नहीं, बल्कि धर्म-कर्म और सामाजिक प्रतिष्ठा (कीर्ति) बढ़ाने में लगाता है। यह शहरी धनवानों के स्वभाव से बिल्कुल अलग है, जो धन पाते ही सुख-सुविधाओं की ओर दौड़ते हैं। सुजान भी इसी ग्रामीण प्रवृत्ति का उदाहरण है — धन आते ही वह साधु-संतों की सेवा और धार्मिक कार्यों में जुट जाता है।

गद्यांश 2

"सुजान महतो सुजान भगत हो गये। भगतों के आचार-विचार कुछ और होते हैं। वह बिना स्नान किये कुछ नहीं खाता… सबसे बड़ी बात यह है कि झूठ का त्याग करना पड़ता है।"

प्रसंग: यह अंश उस समय का वर्णन है जब सुजान महतो धार्मिक कार्यों के कारण गाँव में 'भगत' की उपाधि पा चुका है और अब उसे इस नई पहचान के अनुसार जीवन जीना पड़ता है।

व्याख्या: लेखक बताते हैं कि 'भगत' बनने के बाद व्यक्ति के जीवन के नियम सामान्य मनुष्य से भिन्न हो जाते हैं — नियमित स्नान, शुद्ध खान-पान, और सबसे महत्वपूर्ण, सत्य का पालन अनिवार्य हो जाता है। लेखक व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि साधारण मनुष्य के झूठ बोलने पर उसे हल्का दंड मिलता है, परंतु भगत के लिए वही झूठ कहीं अधिक गंभीर अपराध बन जाता है, क्योंकि समाज उससे ऊँचे नैतिक आचरण की अपेक्षा रखता है। इसी बदलाव के कारण सुजान का पूरा जीवन-दृष्टिकोण बदल जाता है — वह स्वार्थ की जगह औचित्य से परिस्थितियों को तौलने लगता है।

व्याख्या — भाग 2

गद्यांश 3

"अपने ही घर में उसका यह अनादर! अभी यह अपाहिज नहीं है; हाथ-पाँव थके नहीं हैं; घर का कुछ न कुछ काम करता ही रहता है। उस पर यह अनादर! उसी ने घर बनाया, यह सारी विभूति उसी के श्रम का फल है, पर अब इस घर पर उसका कोई अधिकार नहीं रहा।"

प्रसंग: यह अंश उस समय का है जब बेटे भोला ने भिखारी को दिए जा रहे अनाज की छबड़ी सुजान के हाथ से छीन ली और उसे डाँट दिया। आहत सुजान पेड़ के नीचे बैठकर मन-ही-मन विचार कर रहा है।

व्याख्या: यह गद्यांश कहानी का भावनात्मक केंद्र-बिंदु है। सुजान अपने आप से प्रश्न कर रहा है कि जब वह न तो अपंग है और न ही निकम्मा — बल्कि अब भी घर के लिए जो कुछ कर सकता है, करता है — तो फिर उसका इतना अनादर क्यों? वह याद करता है कि यह पूरा घर, यह सारी संपत्ति (विभूति) उसी के वर्षों के परिश्रम का परिणाम है, फिर भी अब उस घर पर उसका कोई निर्णायक अधिकार नहीं बचा। यह अंश पीढ़ियों के बीच के उस सार्वभौमिक द्वंद्व को उजागर करता है, जहाँ वृद्ध माता-पिता घर बनाने के बाद भी अपने ही बनाए घर में निर्णय-शक्ति खो देते हैं।

गद्यांश 4

"वही तलवार, जो केले को भी नहीं काट सकती, सान पर चढ़कर लोहे को काट देती है। मानव-जीवन में लाग बड़े महत्व की वस्तु है। जिसमें लाग है, वह बूढ़ा भी हो तो जवान है।"

प्रसंग: यह पंक्ति कहानी के अंत में आती है, जब सुजान भगत अपने अथक परिश्रम से भरपूर फसल उगा लेता है और भिखारी को उदारतापूर्वक अनाज देकर अपना अधिकार पुनः स्थापित करता है।

व्याख्या: लेखक यहाँ एक सुंदर उपमा (तलवार की) के माध्यम से कहानी का केंद्रीय भाव प्रस्तुत करते हैं। जिस प्रकार एक कुंद तलवार भी सान पर चढ़ाए जाने पर (धार तेज़ होने पर) लोहे जैसी कठोर वस्तु को काट सकती है, उसी प्रकार मनुष्य के भीतर यदि 'लाग' (लगन, उत्साह, दृढ़ संकल्प) हो, तो वह असंभव को भी संभव कर सकता है। लेखक का संदेश है कि उम्र शरीर की नहीं, मन के उत्साह की चीज़ है — जिसमें लगन है वह वृद्ध होकर भी युवा है, और जिसमें लगन नहीं वह युवा होकर भी मृतक के समान है। सुजान भगत में यही 'लाग' थी, जिसने उसे असाधारण परिश्रम करने की शक्ति दी और अंततः उसका खोया सम्मान लौटाया।