जाति, धर्म और लैंगिक मसले
जाति, धर्म और लैंगिक मसले अध्याय से 2026-27 के प्रतिदर्श प्रश्न-पत्र में 3 अंक और फ़रवरी 2026 तथा 2025 के प्रश्न-पत्रों में 2 अंक आए, और हर बार लिखित उत्तर वाला प्रश्न था: चुनाव केवल जाति पर क्यों नहीं टिके होते, इस पर 3 अंक का प्रश्न (प्रतिदर्श प्रश्न-पत्र), और महिला उद्यमिता बढ़ाने (फ़रवरी 2026) तथा लैंगिक असमानता दूर करने (2025) पर 2 अंक के प्रश्न। एक बहुविकल्पीय या अभिकथन-कारण प्रश्न भी आ सकता है, और 5 अंक के प्रश्न के लिए भी तैयार रहिए।
सबसे ज़्यादा अंक इन गलतियों से कटते हैं: राजनीति में धर्म की हर भूमिका को सांप्रदायिकता मान लेना, 'धर्मनिरपेक्ष' का अर्थ 'धर्म-विरोधी' लिखना, 'जाति के अंदर राजनीति' पूछे जाने पर 'राजनीति में जाति' लिख देना, और अध्याय के बिंदुओं के बजाय महिलाओं पर सामान्य निबंध लिख देना।
5 मिनट में दोहराएँ
लैंगिक मसले
- श्रम का लैंगिक विभाजन: घर का काम और देखभाल महिलाओं का काम माना जाता है, जबकि यही काम बाहर करने पर पुरुषों को वेतन मिलता है।
- पितृसत्ता: वह व्यवस्था जो पुरुषों को ज़्यादा महत्व और महिलाओं पर अधिकार देती है। नारीवादी: जो महिलाओं और पुरुषों के बराबर अधिकारों में विश्वास करे।
- नारीवादी आंदोलन: वोट, कानूनी अधिकार, शिक्षा, करियर और परिवार में बराबरी की माँग। स्वीडन, नॉर्वे और फ़िनलैंड में महिलाएँ सार्वजनिक जीवन में बड़ा हिस्सा लेती हैं।
- भारत में: कम साक्षरता; कॉलेज में कम लड़कियाँ; ऊँची नौकरियों में कम महिलाएँ; समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 के बावजूद कम वेतन; बेटे की चाह; असुरक्षित सड़कें।
- सीटें: लोकसभा में लगभग 15% से कम; पंचायतों और नगरपालिकाओं में एक-तिहाई आरक्षित (1992)। 106वाँ संशोधन (2023) लोकसभा और विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें अगली जनगणना और परिसीमन के बाद आरक्षित करता है।
धर्म
- उचित: राजनीति में नैतिक मूल्य (गांधीजी), अल्पसंख्यकों की रक्षा, न्यायपूर्ण पारिवारिक कानून, शांतिपूर्ण सामुदायिक माँगें।
- सांप्रदायिकता: एक धर्म को श्रेष्ठ बताकर प्रभुत्व चाहना। रूप: रोज़मर्रा की धारणाएँ, प्रभुत्व की चाह, प्रतीकों और डर से गोलबंदी, हिंसा।
- धर्मनिरपेक्ष शासन: कोई राजकीय धर्म नहीं; धार्मिक आज़ादी; भेदभाव नहीं; बराबरी के लिए शासन दखल दे सकता है (छुआछूत पर रोक)।
जाति
| राजनीति में जाति | जाति के अंदर राजनीति |
|---|---|
| जातिगत बनावट देखकर प्रत्याशी; कई जातियों से मंत्री | उपजातियों को जोड़कर बड़े होते समूह |
| जातिगत भावनाओं को अपील | जातियों के बीच गठबंधन |
| वयस्क मताधिकार: हर समूह का वोट ज़रूरी | नए समूह: 'पिछड़ी' और 'अगड़ी' जातियाँ |
- बदलाव के कारण: शहरीकरण, शिक्षा, व्यावसायिक गतिशीलता, संविधान। अब भी: जाति में विवाह, छुआछूत, जाति से जुड़ी आय।
- असर: दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों को आवाज़ मिली; केवल जाति पर ज़ोर गरीबी और भ्रष्टाचार को पीछे धकेलता है।
- केवल जाति नहीं: किसी सीट पर एक जाति का साफ़ बहुमत नहीं; दल के प्रति निष्ठा, आर्थिक हित और सरकार का काम भी मायने रखते हैं।
ध्यान दें
- धर्मनिरपेक्ष का अर्थ धर्म-विरोधी नहीं है।
- राजनीति में धर्म और सांप्रदायिकता एक बात नहीं हैं।
- जातिगत विभाजन भारत की खास बात है; लैंगिक और धार्मिक विभाजन हर जगह हैं।
- 2023 का संशोधन कानून है, पर अभी लागू नहीं हुआ।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: हर प्रश्न पहले कॉपी पर हल कीजिए, फिर उत्तर पढ़िए। हर चरण के सामने लिखे अंक बताते हैं कि परीक्षक क्या देखता है। 1 अंक वाले बहुविकल्पीय और अभिकथन-कारण प्रश्न अंत की क्विज़ में हैं, साथ में ऐसे प्रश्न भी जो जाँचते हैं कि आपने अध्याय कितनी गहराई से समझा है; क्विज़ के हर उत्तर के साथ उसकी व्याख्या दी गई है।
लघु उत्तरीय प्रश्न (2 और 3 अंक)
प्रश्न 1 (2 अंक)
बाल लिंग अनुपात से क्या अभिप्राय है? भारत के कुछ हिस्सों में इसका गिरना चिंता की बात क्यों है?
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियों की संख्या बाल लिंग अनुपात है।
- इसका गिरना दिखाता है कि कई माता-पिता बेटा चाहते हैं और कुछ जन्म से पहले बेटी का गर्भपात करा देते हैं; लड़कियों को कम महत्व मिलता है।
अंक योजना:
- बाल लिंग अनुपात का अर्थ है प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियों की संख्या (0-6 वर्ष आयु वर्ग में)। — 1 अंक
- इसका गिरना दिखाता है कि बहुत-से माता-पिता बेटा चाहते हैं और कुछ लोग जन्म से पहले ही बेटी का गर्भपात करा देते हैं; लड़कियों को अब भी लड़कों से कम महत्व मिलता है। (यह भी स्वीकार्य: इससे लड़कियों और महिलाओं की कमी और दूसरी सामाजिक समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।) — 1 अंक
प्रश्न 2 (3 अंक)
सांप्रदायिक राजनीति धर्म और समुदाय के बारे में एक खास धारणा पर टिकी है। यह धारणा बताइए और दो कारण दीजिए कि यह गलत क्यों है।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- धारणा: धर्म ही समुदाय का आधार है, और एक धर्म के सब लोगों के हित एक हैं।
- गलत क्योंकि एक धर्म के लोग वर्ग, काम, क्षेत्र और लिंग में अलग हैं, तो हित भी अलग हैं।
- हर व्यक्ति की कई पहचानें हैं; केवल धर्म पर जोड़ने से बाकी आवाज़ें दब जाती हैं।
अंक योजना:
- धारणा: धर्म ही सामाजिक समुदाय का मुख्य आधार है; एक धर्म के अनुयायियों के बुनियादी हित एक जैसे हैं, और अलग-अलग धर्मों के लोग एक समुदाय नहीं बन सकते (अपने चरम रूप में, एक राष्ट्र में बराबर नागरिक बनकर नहीं रह सकते)। — 1 अंक
- एक धर्म के लोगों के हित हर संदर्भ में एक जैसे नहीं होते; वर्ग, पेशे, क्षेत्र, भाषा और लिंग के आधार पर उनमें अंतर होता है। — 1 अंक
- हर व्यक्ति की कई भूमिकाएँ और पहचानें होती हैं, और हर समुदाय में कई आवाज़ें होती हैं; केवल धर्म के नाम पर सबको एक करने से ये आवाज़ें दब जाती हैं। — 1 अंक
प्रश्न 3 (2 अंक)
धर्मनिरपेक्ष शासन और सांप्रदायिक राजनीति में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- धर्मनिरपेक्ष शासन का कोई धर्म नहीं होता; वह सब धर्मों को बराबर मानता है और धार्मिक भेदभाव नहीं करता।
- सांप्रदायिक राजनीति एक धर्म को श्रेष्ठ मानती है और शासन की ताकत से एक समूह का प्रभुत्व चाहती है।
अंक योजना:
- धर्मनिरपेक्ष शासन का कोई राजकीय धर्म नहीं होता, वह सभी धर्मों से बराबर व्यवहार करता है और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता (यह भी स्वीकार्य: सबको कोई भी धर्म मानने या न मानने की आज़ादी देता है)। — 1 अंक
- सांप्रदायिक राजनीति एक धर्म को श्रेष्ठ बताती है, एक समूह की माँगों को दूसरे के खिलाफ़ खड़ा करती है और एक धार्मिक समूह का प्रभुत्व बनाने के लिए शासन की ताकत का उपयोग करना चाहती है। — 1 अंक
प्रश्न 4 (3 अंक)
राजनीति केवल जाति का उपयोग नहीं करती, वह जाति को बदलती भी है। तीन तरीके बताइए जिनसे राजनीति के कारण जाति समूहों में बदलाव आया है।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- जाति समूह उन पड़ोसी जातियों या उपजातियों को शामिल करके बड़ा होना चाहता है जिन्हें वह पहले बाहर रखता था।
- जाति समूह दूसरी जातियों और समुदायों से गठबंधन बनाते हैं, इसलिए उन्हें बातचीत और मोलभाव करना पड़ता है।
- राजनीति में 'पिछड़ी' और 'अगड़ी' जातियों जैसे नए समूह सामने आए हैं।
अंक योजना:
- हर जाति समूह उन पड़ोसी जातियों या उपजातियों को अपने में शामिल करके बड़ा होने की कोशिश करता है जिन्हें वह पहले बाहर रखता था। — 1 अंक
- जाति समूहों को दूसरी जातियों या समुदायों के साथ गठबंधन बनाना पड़ता है, जिसके लिए उनसे बातचीत और मोलभाव करना पड़ता है। — 1 अंक
- राजनीति में 'पिछड़ी' और 'अगड़ी' जातियों जैसे नए तरह के जाति समूह सामने आए हैं। — 1 अंक
प्रश्न 5 (2 अंक)
राजनीति में जाति की भूमिका ने भारतीय लोकतंत्र की किस एक तरह से मदद की है और यह किस एक तरह से नुकसान पहुँचा सकती है? बताइए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- इससे दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों को निर्णयों में बेहतर हिस्सा मिला और वे सम्मान तथा बराबर अवसर की माँग उठा पाए।
- केवल जाति पर टिकी राजनीति गरीबी, विकास और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को पीछे धकेल सकती है।
अंक योजना:
- मदद: इससे दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों को निर्णय लेने की प्रक्रिया तक बेहतर पहुँच मिली है; संगठनों ने भेदभाव खत्म करने और सम्मान, ज़मीन तथा अवसरों की माँग उठाई है। — 1 अंक
- नुकसान: केवल जाति पर टिकी राजनीति गरीबी, विकास और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को पीछे धकेल सकती है (यह भी स्वीकार्य: इससे तनाव, टकराव और हिंसा तक हो सकती है)। — 1 अंक
प्रश्न 6 (3 अंक)
लगभग हर समाज में किसी न किसी तरह का श्रम-विभाजन रहा है। भारत की जाति व्यवस्था सामाजिक असमानता का चरम रूप क्यों थी? तीन विशेषताएँ बताइए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- काम जन्म से तय था। एक जाति से पीढ़ी-दर-पीढ़ी वही पेशा अपनाने की उम्मीद थी।
- लोग केवल अपनी जाति में विवाह करते थे और दूसरी जातियों के साथ खाना नहीं खाते थे।
- कुछ समूहों को 'जाति-बाहर' मानकर छुआछूत झेलनी पड़ती थी, और सभी जातियाँ 'ऊँच' से 'नीच' के क्रम में रखी गई थीं।
अंक योजना:
- काम जन्म से तय था: एक जाति के सदस्यों से एक ही या मिलता-जुलता पेशा अपनाने की उम्मीद की जाती थी, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता था। — 1 अंक
- लोग केवल अपनी जाति में विवाह करते थे और दूसरी जातियों के लोगों के साथ खाना नहीं खाते थे। — 1 अंक
- यह 'जाति-बाहर' माने गए समूहों को अलग रखने और उनसे भेदभाव पर टिकी थी, जिन्हें छुआछूत झेलनी पड़ती थी; जातियों को 'सबसे ऊँची' से 'सबसे नीची' तक क्रम में रखा गया था। — 1 अंक
प्रश्न 7 (3 अंक)
अरुण के दादा एक गाँव में भूमिहीन खेतिहर मज़दूर थे, जहाँ जाति तय करती थी कि कौन कहाँ बैठेगा या कहाँ से पानी भरेगा। अरुण अब एक शहर में इंजीनियर है, जहाँ उसके साथी उसकी जाति शायद ही जानते या पूछते हैं। आधुनिक भारत के ऐसे तीन बदलाव बताइए जो इस अंतर को समझाते हैं।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- शिक्षा और व्यावसायिक गतिशीलता से अरुण अपने दादा से बिल्कुल अलग काम कर पाया।
- शहरीकरण: शहर की बसों, दफ़्तरों और रेस्तराँ में लोग एक-दूसरे की जाति शायद ही जानते या पूछते हैं।
- संविधान जातिगत भेदभाव को मना करता है, और पुराने अन्याय को मिटाने के लिए नीतियाँ बनीं।
अंक योजना:
- साक्षरता और शिक्षा का प्रसार तथा व्यावसायिक गतिशीलता: नई पीढ़ियाँ अपने पुरखों से अलग काम अपनाती हैं। — 1 अंक
- शहरीकरण और आर्थिक विकास: शहर की भीड़ भरी बसों, दफ़्तरों और खाने की जगहों पर लोग आसपास वालों की जाति शायद ही जानते या पूछते हैं। — 1 अंक
- संविधान जाति के आधार पर भेदभाव को मना करता है और उसने पुराने अन्याय को मिटाने वाली नीतियों की नींव रखी। (यह भी स्वीकार्य: गाँवों में ज़मींदारों की कमज़ोर हुई स्थिति; जोतिबा फुले, गांधीजी, डॉ. बी.आर. अंबेडकर और पेरियार जैसे सुधारकों का काम।) — 1 अंक
प्रश्न 8 (2 अंक)
महिला संगठन लंबे समय से माँग करते रहे कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हों। इस माँग के पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- विधायिका में महिलाओं की सीटें कम हैं, लोकसभा में लगभग 15 प्रतिशत से भी कम; इसलिए उनकी ज़रूरतें अनदेखी रहती हैं।
- अपने आप यह हिस्सा धीरे बढ़ता है; कानूनी नियम से तुरंत ज़्यादा महिलाएँ विधायिका में पहुँचती हैं।
अंक योजना:
- सीटों में महिलाओं का हिस्सा बहुत कम रहा है (लोकसभा में लगभग 15 प्रतिशत से कम और कई विधानसभाओं में उससे भी कम), इसलिए महिलाओं की भलाई से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं जाता। — 1 अंक
- कानूनी नियम के बिना यह हिस्सा बहुत धीरे बढ़ता है; इसे कानूनन ज़रूरी बनाने से कानून बनाने में ज़्यादा महिलाएँ आती हैं, जैसा स्थानीय संस्थाओं में आरक्षण से हुआ। (यह भी स्वीकार्य: संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 यह व्यवस्था करता है, जो अगली जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के बाद लागू होगी।) — 1 अंक
प्रश्न 9 (3 अंक)
सांप्रदायिकता को केवल कुछ लोगों के लिए नहीं, बल्कि भारत की मूल अवधारणा के लिए खतरा क्यों कहा जाता है? इसका मुकाबला करने के दो तरीके सुझाइए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- भारत एक धर्मनिरपेक्ष संविधान पर बना है जो सभी धर्मों के लोगों को बराबर नागरिक मानता है। सांप्रदायिकता इसे नकारती है, इसलिए यह देश की नींव पर चोट है।
- रोज़मर्रा के जीवन में पूर्वाग्रहों का विरोध करें, अफ़वाहें न फैलाएँ और समुदायों में भरोसा बढ़ाएँ।
- राजनीति में मतदाता धर्म के नाम पर की गई अपीलों को नकारें।
अंक योजना:
- भारत एक धर्मनिरपेक्ष संविधान पर टिका है जो सभी धर्मों के लोगों को बराबर नागरिक बनाता है; सांप्रदायिकता यह मानने से इनकार करती है कि वे एक राष्ट्र में बराबर होकर रह सकते हैं, इसलिए यह देश की एक नींव पर ही चोट करती है। — 1 अंक
- रोज़मर्रा के जीवन में: धार्मिक पूर्वाग्रहों और रूढ़ छवियों का विरोध करना, अफ़वाहें न फैलाना, और समुदायों के बीच मेलजोल तथा भरोसा बढ़ाना। — 1 अंक
- राजनीति में: धर्म के नाम पर वोट माँगने वाले दलों और प्रत्याशियों को नकारना, और शासन को सभी धर्मों से बराबर व्यवहार करते हुए सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ़ सख्ती से काम करना। — 1 अंक
प्रश्न 10 (2 अंक)
काल्पनिक रामपुर ब्लॉक का ब्लॉक कार्यालय तीन ऐसी रुकावटें गिनाता है जिनके कारण उसके गाँवों की महिलाएँ अपनी दुकान, डेयरी या कार्यशाला नहीं चला पातीं:
(a) बैंक गिरवी के लिए ज़मीन के कागज़ माँगते हैं, और बहुत कम महिलाओं के नाम ज़मीन है;
(b) कोई शिशु-देखभाल केंद्र नहीं है, इसलिए महिलाओं का दिन बच्चों की देखभाल में निकल जाता है;
(c) साप्ताहिक बाज़ार में महिला विक्रेताओं के लिए जगह नहीं है।
अगर कार्यालय इस साल इनमें से केवल दो रुकावटें दूर कर सके, तो आप कौन-सी दो चुनेंगे? हर चुनाव का एक कारण दीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- (a) कर्ज़: पूँजी के बिना कोई काम शुरू नहीं होता, और कम महिलाओं के नाम गिरवी रखने लायक ज़मीन है।
- (b) शिशु-देखभाल: बिना वेतन की देखभाल महिलाओं का दिन भर देती है; केंद्र से कमाने का समय मिलेगा।
अंक योजना:
- कोई दो रुकावटें, हर एक के ठोस कारण के साथ, 1-1 अंक। (a) पूँजी के बिना कोई काम शुरू नहीं हो सकता, और महिलाओं के नाम शायद ही कोई संपत्ति होती है जिसे वे गिरवी रख सकें (स्वयं सहायता समूहों से कर्ज़ या महिलाओं के नाम संपत्ति मदद करेगी)। — 1 अंक
- (b) बिना वेतन की देखभाल महिलाओं का समय भर देती है, इसलिए शिशु-देखभाल केंद्र वेतन वाले काम के लिए समय निकालता है; या (c) बेचने की जगह न हो तो महिलाएँ कमा नहीं सकतीं। (उचित कारण के साथ कोई भी दो स्वीकार्य।) — 1 अंक
दीर्घ उत्तरीय और स्रोत आधारित प्रश्न
प्रश्न 11 (5 अंक)
काल्पनिक देश वेलोरिया का एक राजकीय धर्म है। केवल उसी धर्म के त्योहारों पर सार्वजनिक छुट्टी होती है, लोगों को अपना धर्म बदलने की अनुमति नहीं है, और जब किसी धर्म के भीतर कुछ समूहों को उसके पूजा-स्थलों में जाने से रोका जाता है तो सरकार दखल देने से मना कर देती है। इन व्यवस्थाओं की तुलना भारत के संविधान के धर्मनिरपेक्ष मॉडल से कीजिए, और स्पष्ट कीजिए कि धर्मनिरपेक्षता को भारत की एक नींव क्यों कहा जाता है।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- राजकीय धर्म: वेलोरिया का है, भारत का नहीं। श्रीलंका या पाकिस्तान के विपरीत, यहाँ किसी धर्म को खास दर्जा नहीं है।
- धार्मिक आज़ादी: वेलोरिया धर्म बदलने से रोकता है; भारत में हर व्यक्ति कोई भी धर्म मान, पालन और प्रचार कर सकता है, या कोई धर्म न माने।
- भेदभाव नहीं: वेलोरिया एक धर्म के त्योहारों को तरजीह देता है, पर भारत का संविधान धार्मिक भेदभाव को मना करता है।
- धर्मों के भीतर बराबरी: वेलोरिया दखल नहीं देता; भारत में शासन बराबरी के लिए दखल दे सकता है, जैसे छुआछूत पर रोक।
- एक नींव: धर्मनिरपेक्षता कुछ दलों की सोच भर नहीं; भारत इसी पर टिका है, इसलिए सांप्रदायिकता भारत की मूल अवधारणा के लिए खतरा है।
अंक योजना:
- राजकीय धर्म: वेलोरिया का है, पर भारत का कोई राजकीय धर्म नहीं; श्रीलंका में बौद्ध धर्म, पाकिस्तान में इस्लाम या इंग्लैंड में ईसाई धर्म के विपरीत, भारत में किसी धर्म को खास दर्जा नहीं है। — 1 अंक
- धार्मिक आज़ादी: वेलोरिया धर्म बदलने पर रोक लगाता है, पर भारत का संविधान हर किसी को कोई भी धर्म मानने, उसका पालन और प्रचार करने की, या कोई धर्म न मानने की आज़ादी देता है। — 1 अंक
- बराबर व्यवहार: वेलोरिया एक धर्म के त्योहारों को तरजीह देता है, पर भारत धर्म के आधार पर भेदभाव की मनाही करता है। — 1 अंक
- धर्मों के भीतर बराबरी: वेलोरिया दखल नहीं देता, पर भारत में शासन समुदायों के भीतर बराबरी लाने के लिए धार्मिक मामलों में दखल दे सकता है; जैसे छुआछूत पर रोक। — 1 अंक
- नींव क्यों: धर्मनिरपेक्षता कुछ दलों या व्यक्तियों की विचारधारा भर नहीं है; देश इसी पर टिका है, इसलिए सांप्रदायिकता भारत की मूल अवधारणा के लिए खतरा है और उससे रोज़मर्रा के जीवन तथा राजनीति, दोनों में लड़ना होगा। — 1 अंक
अथवा
'लोकतंत्र में धर्म और राजनीति का संबंध ऐसे रूपों में भी हो सकता है जो पूरी तरह उचित हों।' इस कथन को पाँच बिंदुओं में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- गांधीजी का विचार: धर्म राजनीति से अलग नहीं हो सकता। धर्म से उनका अर्थ सभी धर्मों के साझा नैतिक मूल्यों से था, जो राजनीति को राह दिखाएँ।
- अल्पसंख्यकों की सुरक्षा: दंगों में अक्सर अल्पसंख्यक सबसे ज़्यादा पिसते हैं, इसलिए अधिकार समूह उनकी रक्षा माँग सकते हैं।
- न्यायपूर्ण पारिवारिक कानून: महिला संगठन किसी भी धर्म के अन्यायपूर्ण पारिवारिक कानूनों में बदलाव माँग सकते हैं।
- समुदाय की माँगें: लोग धार्मिक समुदाय के सदस्य के रूप में राजनीति में माँगें रख सकते हैं।
- शासन की भूमिका: वह भेदभाव रोकने के लिए धार्मिक आचरण को नियंत्रित कर सकता है, बशर्ते हर धर्म से बराबर व्यवहार करे। इनमें कोई भी एक धर्म का प्रभुत्व नहीं चाहता।
अंक योजना:
- गांधीजी मानते थे कि धर्म को राजनीति से कभी अलग नहीं किया जा सकता; धर्म से उनका अर्थ सभी धर्मों में समान नैतिक मूल्यों से था, जो राजनीति को राह दिखाएँ। — 1 अंक
- अल्पसंख्यकों की सुरक्षा: दंगों में अक्सर अल्पसंख्यक धर्मों के लोग सबसे ज़्यादा पिसते हैं, इसलिए मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले समूह शासन से उनकी खास सुरक्षा माँग सकते हैं। — 1 अंक
- न्यायपूर्ण पारिवारिक कानून: महिला संगठन किसी भी धर्म के विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के उन कानूनों में बदलाव माँग सकते हैं जो महिलाओं के साथ अन्याय करते हैं। — 1 अंक
- लोग किसी धार्मिक समुदाय के सदस्य के रूप में अपनी ज़रूरतें, हित और माँगें राजनीति में रख सकते हैं। — 1 अंक
- भेदभाव और दमन रोकने के लिए शासन धर्म के पालन को नियंत्रित कर सकता है, बशर्ते वह हर धर्म से बराबर व्यवहार करे। (यह भी स्वीकार्य: ये सब उचित हैं क्योंकि इनमें से कोई भी एक धर्म का प्रभुत्व नहीं चाहता।) — 1 अंक
प्रश्न 12 (5 अंक)
'भारत में समान वेतन का कानून है, लड़कियाँ स्कूल में लड़कों जितना अच्छा करती हैं, और महिलाएँ वोट दे सकती हैं तथा चुनाव लड़ सकती हैं। इसलिए भारत में महिलाओं को अब कोई नुकसान नहीं झेलना पड़ता।' क्या आप सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में पाँच बिंदु दीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
मैं सहमत नहीं हूँ। कागज़ के कानूनों से नुकसान खत्म नहीं हुआ।
- वेतन: समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 के बावजूद ज़्यादातर क्षेत्रों में महिलाओं को उसी काम का कम वेतन मिलता है।
- शिक्षा: लड़कियाँ स्कूल में अच्छा करती हैं, फिर भी महिलाओं की साक्षरता कम है और कम लड़कियाँ उच्च शिक्षा तक पहुँचती हैं।
- काम: ऊँचे वेतन वाली नौकरियों में महिलाएँ कम हैं, और महिला रोज़ पुरुष से लगभग एक घंटा ज़्यादा काम करती है, ज़्यादातर बिना वेतन के।
- बेटे की चाह: कुछ माता-पिता बेटी का गर्भपात करा देते हैं, इसलिए कई जगह बाल लिंग अनुपात गिरा है।
- सुरक्षा: महिलाओं को बाहर और कुछ को घर में भी उत्पीड़न और हिंसा झेलनी पड़ती है।
अंक योजना:
- वेतन: समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 समान काम के लिए समान मज़दूरी तय करता है, फिर भी लगभग हर क्षेत्र में महिलाओं को उसी काम के लिए पुरुषों से कम मिलता है। — 1 अंक
- शिक्षा: लड़कियाँ स्कूल में अच्छा करती हैं, फिर भी महिलाओं की साक्षरता दर पुरुषों से कम है, और कम लड़कियाँ उच्च शिक्षा तक पहुँचती हैं क्योंकि माता-पिता बेटों की पढ़ाई पर खर्च करना पसंद करते हैं। — 1 अंक
- काम: ऊँचे वेतन और सम्मान वाली नौकरियों में महिलाएँ बहुत कम हैं; औसत महिला रोज़ पुरुष से लगभग एक घंटा ज़्यादा काम करती है, पर उसका ज़्यादातर काम बिना वेतन का होता है और उसे महत्व नहीं मिलता। — 1 अंक
- बेटे की चाह: बहुत-से माता-पिता केवल बेटे चाहते हैं और बेटी का गर्भपात कराने के तरीके ढूँढ़ते हैं, इसलिए कुछ जगहों पर बाल लिंग अनुपात गिर गया है। — 1 अंक
- सुरक्षा: महिलाओं को उत्पीड़न, शोषण और हिंसा झेलनी पड़ती है; शहर उनके लिए असुरक्षित हैं, और कुछ को घर में भी हिंसा सहनी पड़ती है। (यह भी स्वीकार्य: महिलाएँ चुनाव लड़ सकती हैं, पर विधायिकाओं में उनकी सीटें बहुत कम हैं।) — 1 अंक
अथवा
लैंगिक मुद्दों को राजनीतिक रूप से उठाने से सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भूमिका कैसे सुधरी? भारत के उदाहरणों सहित पाँच बिंदुओं में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- पहले केवल पुरुष वोट दे सकते थे, चुनाव लड़ सकते थे और सार्वजनिक मामलों में भाग लेते थे; घर के काम ने महिलाओं को घर तक सीमित रखा।
- महिलाओं ने वोट और बेहतर कानूनी तथा राजनीतिक दर्जे जैसे बराबर अधिकारों के लिए संगठित आंदोलन किए।
- उन्होंने शिक्षा और करियर के अवसर भी माँगे, और कुछ समूहों ने परिवार में भी बराबरी चाही। इन्हें नारीवादी आंदोलन कहते हैं।
- आज महिलाएँ वैज्ञानिक, डॉक्टर, वकील, प्रबंधक और शिक्षक हैं। स्वीडन, नॉर्वे और फ़िनलैंड में सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी बहुत ज़्यादा है।
- भारत में पंचायतों और नगरपालिकाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, और स्थानीय संस्थाओं में अब 10 लाख से ज़्यादा महिलाएँ हैं।
अंक योजना:
- पहले केवल पुरुष सार्वजनिक मामलों में भाग ले सकते थे, वोट दे सकते थे या चुनाव लड़ सकते थे; श्रम के लैंगिक विभाजन ने सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भूमिका बहुत छोटी रखी। — 1 अंक
- महिलाओं ने संगठित होकर बराबर अधिकारों के लिए आंदोलन किए: वोट का अधिकार और बेहतर राजनीतिक तथा कानूनी दर्जा। — 1 अंक
- उन्होंने बेहतर शिक्षा और करियर के अवसरों की माँग भी की, और ज़्यादा उग्र समूहों ने निजी और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी चाही; इन्हें नारीवादी आंदोलन कहते हैं। — 1 अंक
- आज महिलाएँ वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, प्रबंधक और विश्वविद्यालय शिक्षक के रूप में काम करती हैं; स्वीडन, नॉर्वे और फ़िनलैंड जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों में सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी बहुत ज़्यादा है। — 1 अंक
- भारत में पंचायतों और नगरपालिकाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, और स्थानीय संस्थाओं में अब 10 लाख से ज़्यादा निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं। (यह भी स्वीकार्य: लोकसभा और विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने वाला संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023, जो अगली जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होगा।) — 1 अंक
प्रश्न 13 (4 अंक)
नीचे दिए गए स्रोत को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
सोनापुर का चौंकाने वाला नतीजा
काल्पनिक विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र सोनापुर में जब मतगणना पूरी हुई, तो वर्तमान विधायक लगभग नौ हज़ार वोटों से हार चुके थे। मतदान से पहले बहुत-से लोग नतीजे को तय मान रहे थे। विधायक इस क्षेत्र के सबसे बड़े जाति समूह से हैं, और कहा जाता था कि वह समूह उनके दल का 'वोट बैंक' है।
आँकड़े कुछ और कहानी कहते हैं। वह समूह सोनापुर के मतदाताओं का लगभग एक-चौथाई ही है। दोनों मुख्य दलों ने उसी समूह से प्रत्याशी खड़े किए थे, इसलिए उसके वोट बँट गए। मतदान के बाद हुए एक सर्वे में पता चला कि इस समूह के खेतिहर मज़दूरों और छोटे व्यापारियों ने इसके बड़े ज़मींदारों से काफ़ी अलग वोट दिया। कई मतदाताओं ने कहा कि वे उसी दल के साथ रहे जिसका वे हमेशा समर्थन करते आए हैं, जबकि कुछ ने सड़कों और पीने के पानी पर सरकार के काम से नाराज़गी जताई।
(a) रिपोर्ट में प्रयोग हुए शब्द 'वोट बैंक' का क्या अर्थ है? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
इसका अर्थ है कि किसी जाति के मतदाताओं का बड़ा हिस्सा, सभी नहीं, आम तौर पर एक दल को वोट देता है।
अंक योजना:
- किसी जाति या समुदाय के मतदाताओं का बड़ा हिस्सा (सभी नहीं) किसी एक दल को वोट देता है। — 1 अंक
(b) रिपोर्ट से एक ऐसा तथ्य दीजिए जो दिखाता है कि सोनापुर में अकेली जाति नतीजा तय नहीं कर सकती थी। (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
सबसे बड़ा जाति समूह मतदाताओं का लगभग एक-चौथाई ही है, इसलिए कोई प्रत्याशी केवल उसके वोटों से नहीं जीत सकता था।
अंक योजना:
- सबसे बड़ा समूह मतदाताओं का लगभग एक-चौथाई ही है (या: दोनों दलों ने उसी समूह से प्रत्याशी खड़े किए, जिससे वोट बँट गए; या: वर्तमान विधायक हार गए)। कोई एक। — 1 अंक
(c) जाति के अलावा उन दो बातों को स्पष्ट कीजिए जिन्होंने सोनापुर में लोगों के वोट देने के तरीके को प्रभावित किया। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- आर्थिक हित: समूह के खेतिहर मज़दूरों और छोटे व्यापारियों ने उसके अमीर ज़मींदारों से अलग वोट दिया।
- दल के प्रति निष्ठा और सड़कों तथा पानी पर सरकार के काम के बारे में राय ने भी वोट तय किए।
अंक योजना:
- आर्थिक हित: एक ही जाति के अमीर और गरीब सदस्य अक्सर अलग-अलग वोट देते हैं, जैसा खेतिहर मज़दूरों और ज़मींदारों ने किया। — 1 अंक
- मतदाताओं का किसी दल से लगाव, जो अक्सर जाति से लगाव से भी मज़बूत होता है (या: सरकार के काम और नेताओं की लोकप्रियता के बारे में उनकी राय)। — 1 अंक
प्रश्न 14 (4 अंक)
नीचे दिए गए स्रोत को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
ज़्यादा देर तक कौन काम करता है?
एक स्कूल परियोजना के लिए काल्पनिक कस्बे हीरापुर के कक्षा 10 के विद्यार्थियों ने बीस परिवारों से कहा कि वे लिखें कि हर वयस्क एक आम कामकाजी दिन कैसे बिताता है। जब सारे नोट जोड़े गए, तो तस्वीर साफ़ थी। औसतन महिलाएँ लगभग सात घंटे खाना बनाने, सफ़ाई, कपड़े धोने, पानी भरने और बच्चों तथा बुज़ुर्गों की देखभाल में लगाती थीं, और तीन घंटे सिलाई या परिवार की दुकान में हाथ बँटाने जैसे वेतन वाले काम में। पुरुष लगभग आठ घंटे वेतन वाले काम में और एक घंटे से कम घर के काम में लगाते थे।
विद्यार्थियों ने एक और बात देखी। उनके चार्ट के आय वाले कॉलम में महिलाओं के सात घंटों से कुछ नहीं जुड़ा, क्योंकि घर के काम के लिए किसी को पैसा नहीं मिलता। पर कस्बे का होटल अपने रसोइयों को वेतन देता है, और मुख्य सड़क वाला दर्ज़ी सिलाई से कमाता है। ये दोनों पुरुष हैं।
(ये आँकड़े एक कक्षा सर्वे के हैं और केवल उदाहरण के लिए हैं।)
(a) हीरापुर के परिवारों में काम के जिस ढंग का पता चलता है, उसका नाम लिखिए। (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
श्रम का लैंगिक विभाजन।
अंक योजना:
- श्रम का लैंगिक विभाजन। — 1 अंक
(b) सर्वे की सहायता से दो तरीके स्पष्ट कीजिए जिनसे महिलाओं के काम को कम आँका जाता है। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- घर का काम बिना वेतन का है, इसलिए आय में नहीं दिखता, जबकि महिलाओं ने लगभग दस और पुरुषों ने नौ घंटे काम किया।
- खाना बनाना और सिलाई पुरुष घर के बाहर करें तो वेतन मिलता है; यानी समस्या काम में नहीं, इसमें है कि उसे कौन करता है।
अंक योजना:
- घर का काम बिना वेतन का है, इसलिए आय के आँकड़ों में इसका कोई हिस्सा नहीं जुड़ता, जबकि महिलाओं ने कुल लगभग दस घंटे और पुरुषों ने नौ घंटे काम किया। — 1 अंक
- वही काम, जैसे खाना बनाना या सिलाई, जब पुरुष घर के बाहर करते हैं तो उसका वेतन मिलता है; यानी काम का महत्व इसलिए नहीं माना जाता कि उसे कौन और कहाँ करता है, इसलिए नहीं कि वह बेकार है। — 1 अंक
(c) सर्वे में दिखी असमानता को कम करने के लिए एक कदम सुझाइए। (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
परिवार के पुरुष खाना बनाने, सफ़ाई और देखभाल के काम में हाथ बँटाएँ, ताकि महिलाओं को वेतन वाले काम के लिए ज़्यादा समय मिले।
अंक योजना:
- कोई एक उचित कदम: पुरुषों का घर के काम में हाथ बँटाना; सस्ते शिशु-देखभाल केंद्र; समान वेतन का सख्ती से पालन; महिलाओं को अपना काम चलाने के लिए कौशल, कर्ज़ और सहायता; सर्वे और नीतियों में बिना वेतन के घरेलू काम की गिनती। — 1 अंक