सूती वस्त्रों का इतिहास
प्राचीन भारत में सूती वस्त्र हाथ से कताई और हथकरघा बुनाई द्वारा बनाए जाते थे। 18वीं शताब्दी के बाद पावरलूम (शक्ति-करघे) का उपयोग होने लगा।
औपनिवेशिक काल के दौरान, भारत के पारंपरिक सूती वस्त्र उद्योग को बड़ा आघात लगा क्योंकि यह इंग्लैंड के सस्ते मिल-निर्मित कपड़े का मुक़ाबला नहीं कर सका। पहली सफल सूती वस्त्र मिल 1854 में मुंबई में स्थापित हुई।

आरेख के अंग्रेज़ी लेबलों के हिन्दी अर्थ:
| English (in image) | हिन्दी |
|---|---|
| Cotton textile industry | सूती वस्त्र उद्योग |
| Raw cotton (from farms) | कच्ची कपास (खेतों से) |
| Ginning | ओटाई |
| Spinning (centralised) | कताई (केंद्रीकृत) |
| Weaving (decentralised) | बुनाई (विकेंद्रीकृत) |
| Dyeing & finishing | रंगाई व परिसज्जा |
| Cloth | कपड़ा |
| First mill: Mumbai, 1854; concentrated in Maharashtra & Gujarat | पहली मिल: मुंबई, 1854; महाराष्ट्र व गुजरात में केंद्रित |
स्थानीयकरण और कृषि से संबंध
अपने आरंभिक वर्षों में सूती वस्त्र उद्योग महाराष्ट्र और गुजरात के कपास-उत्पादक क्षेत्र में केंद्रित था। इसका कारण कच्ची कपास, बाज़ार, परिवहन (सुलभ बंदरगाहों सहित), श्रम और आर्द्र जलवायु की उपलब्धता थी।
इस उद्योग का कृषि से घनिष्ठ संबंध है और यह किसानों, कपास की फली तोड़ने वालों, तथा ओटाई, कताई, बुनाई, रंगाई, डिज़ाइनिंग, पैकेजिंग, दर्ज़ीगिरी और सिलाई में लगे श्रमिकों को जीविका प्रदान करता है। माँग उत्पन्न करके यह रसायन एवं रंग, पैकेजिंग सामग्री और इंजीनियरिंग कार्य जैसे कई अन्य उद्योगों को भी सहारा देता है।
कताई, बुनाई और खादी
- कताई आज भी महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु में केंद्रीकृत है।
- पारंपरिक कौशल और डिज़ाइनों (कपास, रेशम, ज़री, कढ़ाई में) को स्थान देने के लिए बुनाई अत्यधिक विकेंद्रीकृत है। भारत में विश्व-स्तरीय कताई है, परंतु बुनाई निम्न गुणवत्ता का कपड़ा देती है क्योंकि यह देश में उत्पादित उच्च-गुणवत्ता वाले धागे का अधिकांश उपयोग नहीं कर पाती।
- हाथ से काती गई खादी बुनकरों को उनके घरों में कुटीर उद्योग के रूप में बड़े पैमाने पर रोज़गार प्रदान करती है।
भारत बड़ी मात्रा में धागे का निर्यात करता है।
परीक्षा युक्ति: याद रखें — पहली मिल = मुंबई, 1854; आरंभिक संकेंद्रण = महाराष्ट्र और गुजरात; कताई = केंद्रीकृत, बुनाई = विकेंद्रीकृत।
प्रश्न और उत्तर
Q1. सूती वस्त्र उद्योग आरंभ में महाराष्ट्र और गुजरात में क्यों केंद्रित था?
Ans. यह उद्योग महाराष्ट्र और गुजरात के कपास-उत्पादक क्षेत्र में इसलिए केंद्रित था क्योंकि वहाँ कच्ची कपास, एक अच्छा बाज़ार, परिवहन और सुलभ बंदरगाह सुविधाएँ, सस्ता श्रम, तथा कताई के लिए उपयुक्त आर्द्र जलवायु सहज उपलब्ध थे। इन अनुकूल कारकों के कारण इसका वहाँ स्थानीयकरण हुआ।
Q2. सूती वस्त्र उद्योग का कृषि से घनिष्ठ संबंध कैसे है?
Ans. यह उद्योग कच्ची कपास, एक कृषि उत्पाद, पर निर्भर करता है और किसानों तथा कपास की फली तोड़ने वालों को जीविका प्रदान करता है। यह ओटाई, कताई, बुनाई, रंगाई, पैकेजिंग और दर्ज़ीगिरी में श्रमिकों को भी रोज़गार देता है, और माँग उत्पन्न करके रसायन, रंग, पैकेजिंग एवं इंजीनियरिंग उद्योगों को सहारा देता है — इस प्रकार खेती को उद्योग से जोड़ता है।
Q3. भारत के सूती वस्त्र उद्योग में कताई और बुनाई में अंतर बताइए।
Ans. कताई (कपास से धागा बनाना) महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु में केंद्रीकृत है और विश्व-स्तरीय गुणवत्ता की है। बुनाई (धागे से कपड़ा बनाना) पारंपरिक कौशलों को समाहित करने के लिए अत्यधिक विकेंद्रीकृत है, परंतु यह निम्न-गुणवत्ता का कपड़ा देती है क्योंकि यह देश में उत्पादित उच्च-गुणवत्ता वाले धागे का अधिकांश उपयोग नहीं कर पाती।
Q4. सूती वस्त्र उद्योग में खादी की क्या भूमिका है?
Ans. हाथ से काती गई खादी बुनकरों के घरों में कुटीर उद्योग के रूप में बनाई जाती है, और यह ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोज़गार प्रदान करती है। यह पारंपरिक कौशलों को संरक्षित करती है और अनेक लोगों को जीविका देती है, इसीलिए महात्मा गांधी ने धागा कातने और खादी बुनने पर बहुत बल दिया।