आधारभूत और भारी उद्योग

लौह और इस्पात उद्योग आधारभूत उद्योग है क्योंकि अन्य सभी उद्योग — भारी, मध्यम और हल्के — अपनी मशीनरी के लिए इसी पर निर्भर हैं। इस्पात की आवश्यकता अभियांत्रिकी वस्तुएँ, निर्माण सामग्री, रक्षा, चिकित्सा, वैज्ञानिक और दूरभाष उपकरण तथा अनेक प्रकार की उपभोक्ता वस्तुएँ बनाने में होती है।

इस्पात के उत्पादन और उपभोग को प्रायः किसी देश के विकास का सूचकांक माना जाता है। यह एक भारी उद्योग है क्योंकि इसके कच्चे माल और तैयार माल दोनों भारी और स्थूल होते हैं, जिनमें भारी परिवहन लागत लगती है।

Iron ore, coking coal and limestone feeding a steel plant

आरेख के अंग्रेज़ी लेबलों के हिन्दी अर्थ:

English (in image) हिन्दी
Iron and steel industry लोहा और इस्पात उद्योग
Iron ore (4 parts) लौह अयस्क (4 भाग)
Coking coal (2 parts) कोककारी कोयला (2 भाग)
Limestone (1 part) चूना-पत्थर (1 भाग)
Ratio 4 : 2 : 1 अनुपात 4 : 2 : 1
Steel इस्पात
Concentrated in the Chhota Nagpur plateau: TISCO Jamshedpur, Bhilai, Bokaro, Durgapur, Rourkela छोटा नागपुर पठार में केंद्रित: TISCO जमशेदपुर, भिलाई, बोकारो, दुर्गापुर, राउरकेला

कच्चा माल और आदर्श स्थान

लौह और इस्पात निर्माण के लिए तीन मुख्य कच्चे मालों की एक निश्चित अनुपात में आवश्यकता होती है:

  • लौह अयस्क : कोककारी कोयला : चूना पत्थर ≈ 4 : 2 : 1 (साथ ही इस्पात को कठोर बनाने के लिए थोड़ी मात्रा में मैंगनीज)।

चूँकि ये सभी स्थूल होते हैं, इस्पात संयंत्र आदर्श रूप से वहाँ स्थित होते हैं जहाँ कच्चा माल, सस्ता श्रम और बाज़ार एक साथ मिलते हैं। छोटा नागपुर पठार क्षेत्र (झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में फैला हुआ) में लौह और इस्पात उद्योगों का सर्वाधिक संकेंद्रण है, इसके कारण हैं:

  • कम लागत वाला लौह अयस्क और अन्य उच्च कोटि का कच्चा माल निकटता में,
  • सस्ता श्रम, और
  • घरेलू बाज़ार में विशाल विकास की संभावना

महत्वपूर्ण इस्पात संयंत्रों में TISCO (जमशेदपुर), भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला, बोकारो, विशाखापत्तनम और सेलम शामिल हैं।

भारत की स्थिति और चुनौतियाँ

भारत विश्व के शीर्ष इस्पात उत्पादकों में से एक है — यह कच्चे इस्पात के उत्पादन में दूसरे स्थान पर रहा और स्पंज आयरन का सबसे बड़ा उत्पादक है। फिर भी इस उद्योग को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:

  • कोककारी कोयले की ऊँची लागत और सीमित उपलब्धता,
  • श्रम की कम उत्पादकता,
  • ऊर्जा की अनियमित आपूर्ति, और
  • कमज़ोर अवसंरचना

उद्योग को उदार बनाने और नई प्रौद्योगिकी लाने के प्रयास इसे इन समस्याओं से उबरने में सहायता कर रहे हैं।

परीक्षा सुझाव: याद रखें — लौह अयस्क : कोककारी कोयला : चूना पत्थर = 4:2:1; मुख्य क्षेत्र = छोटा नागपुर पठार; इस्पात = विकास का सूचकांक।

प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1. लौह और इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग क्यों कहा जाता है?

उत्तर: लौह और इस्पात उद्योग को आधारभूत (या कुंजी) उद्योग कहा जाता है क्योंकि अन्य सभी उद्योग — भारी, मध्यम और हल्के — अपनी मशीनरी और उपकरणों के लिए इसी पर निर्भर हैं। इस्पात का उपयोग अभियांत्रिकी वस्तुएँ, निर्माण सामग्री तथा रक्षा और वैज्ञानिक उपकरण बनाने में होता है, इसलिए इसके उत्पादन को किसी देश के विकास का सूचकांक माना जाता है।

प्रश्न 2. लौह और इस्पात उद्योग के कच्चे माल किस अनुपात में आवश्यक होते हैं?

उत्तर: लौह और इस्पात निर्माण के लिए लौह अयस्क, कोककारी कोयला और चूना पत्थर लगभग 4 : 2 : 1 के अनुपात में आवश्यक होते हैं, साथ ही इस्पात को कठोर बनाने के लिए थोड़ी मात्रा में मैंगनीज। चूँकि ये सभी स्थूल होते हैं, संयंत्र वहाँ स्थित होते हैं जहाँ इन्हें सस्ते में एकत्र किया जा सके।

प्रश्न 3. छोटा नागपुर पठार लौह और इस्पात के लिए अग्रणी क्षेत्र क्यों है?

उत्तर: छोटा नागपुर पठार में लौह और इस्पात उद्योगों का सर्वाधिक संकेंद्रण है क्योंकि यहाँ कम लागत वाला लौह अयस्क, निकटता में उच्च कोटि का कच्चा माल, सस्ता श्रम और एक विशाल घरेलू बाज़ार है — इस भारी उद्योग के लिए आवश्यक सभी लाभ यहाँ उपलब्ध हैं।

प्रश्न 4. भारत में लौह और इस्पात उद्योग के समक्ष आने वाली कोई दो चुनौतियाँ बताइए।

उत्तर: दो चुनौतियाँ हैं (1) कोककारी कोयले की ऊँची लागत और सीमित उपलब्धता, और (2) श्रम की कम उत्पादकता। अन्य में ऊर्जा की अनियमित आपूर्ति और कमज़ोर अवसंरचना शामिल हैं।