लेखक परिचय: डॉ. बालशौरि रेड्डी
उपन्यासकार, बाल-साहित्यकार एवं अनुवादक डॉ. बालशौरि रेड्डी का जन्म 1928 ई. में आंध्र प्रदेश के गोल्ल गूडूरु (कडपा जिले) में हुआ। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में तथा उच्च शिक्षा इलाहाबाद और वाराणसी में हुई। इन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय तथा श्री वेंकटेश्वरा विश्वविद्यालय द्वारा मानद डी.लिट् की उपाधि से सम्मानित किया गया है।
डॉ. बालशौरि रेड्डी बहु-भाषी विद्वान हैं। अहिन्दी भाषा-क्षेत्रों में हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर इन्होंने हिन्दी साहित्य का मान बढ़ाया है। ये भारत सरकार और विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत हैं तथा महात्मा गांधी के जीवनादर्शों का पालन करते हुए निरंतर हिन्दी-सेवा में निरत हैं।
प्रमुख कृतियाँ
- उपन्यास: शबरी, ज़िन्दगी की राह, यह बस्ती/ये लोग, भग्न सीमाएँ, लकुमा, प्रोफेसर, दावानल, बैरिस्टर आदि।
- विविध साहित्य: पंचामृत, तेलुगु वाइमय विविध विधाएँ, तेलुगु साहित्य का इतिहास, आंध्र के महापुरुष, आदर्श जीवनियाँ, दक्षिण की लोक कथाएँ आदि।
पाठ का परिचय एवं उद्देश्य
प्रस्तुत जीवनी में भारतरत्न सर एम. विश्वेश्वरैया के जीवन, व्यक्तित्व तथा कार्यकुशलता का परिचय मिलता है। अनेक कष्टों को झेलते हुए प्रतिभा, कठोर परिश्रम और दूरदर्शिता जैसे गुणों से उन्होंने देश के नव-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारतरत्न से विभूषित विश्वेश्वरैया का जन्मदिन आज 'इंजीनियर्स डे' के रूप में सारे देश में मनाया जाता है।
ईमानदार, कर्मठयोगी विश्वेश्वरैया जी से प्रेरणा लेने के उद्देश्य से इस जीवनी का चयन पाठ्यक्रम में किया गया है।
केंद्रीय संदेश: अपने श्रम और स्वावलंबन के द्वारा कोई भी व्यक्ति समाज में ऊपर उठ सकता है — इसका सबसे बड़ा प्रमाण डॉ. विश्वेश्वरैया की जीवनी है।
जीवनी का सार — भाग 1: प्रारंभिक जीवन और इंजीनियरिंग की सफलता
विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1861 को मैसूर राज्य (अब कर्नाटक) के कोलार जिले के मुद्देनहल्ली नामक गाँव में हुआ। इनका पूरा नाम मोक्षगुंडम् विश्वेश्वरैया था। अत्यंत गरीब माता-पिता के होते हुए भी उनके मन में पढ़ने की गहरी लगन थी। गाँव में प्रारंभिक शिक्षा पूरी कर वे हाईस्कूली शिक्षा के लिए बेंगलूरु गए, जहाँ एक रिश्तेदार के घर रहकर ट्यूशन से अपना खर्च चलाया। मैट्रिक के बाद सेंट्रल कॉलेज से 19 वर्ष की आयु में बी.ए. उत्तीर्ण किया।
सेंट्रल कॉलेज के अंग्रेज़ प्रिंसिपल उनकी योग्यता से प्रभावित होकर पूना के साइंस कॉलेज को सिफारिशी पत्र लिखा, जहाँ उन्हें इंजीनियरिंग में प्रवेश और छात्रवृत्ति मिली। समय के अत्यंत पाबंद विश्वेश्वरैया ने समय से पहले ही इंजीनियरिंग पूरी की और बंबई विश्वविद्यालय में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया, जिसके फलस्वरूप नियमानुसार 23 वर्ष की आयु में असिस्टेंट इंजीनियर नियुक्त हुए। उन्होंने नहरों, शहरी जल-प्रबंधन और नालियों के निर्माण में असाधारण दक्षता दिखाई। 31 वर्ष की आयु में सिंध प्रांत के शक्कर शहर के लिए बैरेज व वाटरवर्क्स का सफल निर्माण किया, जिससे सारे देश में उनका नाम फैल गया। पूना के निकट खडकवासला बाँध के लिए बनाए गए उनके आटोमैटिक गेट डिज़ाइन की इतनी प्रशंसा हुई कि अमेरिका की प्रसिद्ध पनामा नहर में इसी डिज़ाइन की नकल की गई — इस प्रकार उनका नाम विदेशों में भी फैल गया।
जीवनी का सार — भाग 2: हैदराबाद, मैसूर और अंतिम वर्ष
1906 में अदन में सफल कार्य के बाद विश्वेश्वरैया की ख्याति और पदोन्नति देखकर कुछ इंजीनियर उनसे ईर्ष्या करने लगे, क्योंकि वे केवल 47 वर्ष की आयु में ही कई सीनियर इंजीनियरों से आगे निकल गए थे। इस असंतोष को देख उन्होंने स्वयं नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया, फिर भी उनकी विशिष्ट सेवाओं के कारण उन्हें पेंशन दी गई। इसके बाद वे हैदराबाद राज्य के इंजीनियरिंग सलाहकार नियुक्त हुए, जहाँ मूसी नदी की विनाशकारी बाढ़ पर नियंत्रण हेतु बाँध बनवाया और नगर के लिए जल-व्यवस्था के साथ-साथ प्रसिद्ध 'बाग-ए-आम' उद्यान की भी योजना बनाई।
मैसूर के महाराजा कृष्णराज ओडेयर के आमंत्रण पर अपनी मातृभूमि लौटकर विश्वेश्वरैया चीफ इंजीनियर बने और तीन वर्ष बाद दीवान नियुक्त हुए — कुल नौ वर्षों में उन्होंने मैसूर राज्य का नक्शा ही बदल डाला। उनके तीन प्रमुख कार्य थे: कावेरी नदी पर 'कृष्णराज सागर' बाँध (भारत का अपने ढंग का पहला बाँध, जिसने बिजली और सिंचाई दोनों दी), सुंदर वृंदावन उद्यान का निर्माण, तथा पंचायत-व्यवस्था जैसे प्रशासनिक सुधार। उन्होंने शिवसमुद्र में जलविद्युत कारखाना, भद्रावती में इस्पात कारखाना, तथा मैसूर के लिए अपना विश्वविद्यालय भी स्थापित किया। परंतु मैसूर की उन्नति से असहज अंग्रेज़ों द्वारा महाराजा के कान भरे जाने पर विश्वेश्वरैया ने 1918 में स्वाभिमानवश दीवान पद से इस्तीफ़ा दे दिया।
बाद में वे नई दिल्ली राजधानी समिति के सदस्य तथा टाटा स्टील कारखाने के डायरेक्टर भी रहे। 1955 में स्वतंत्र भारत सरकार ने 94 वर्ष की आयु में उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान 'भारतरत्न' से विभूषित किया। 15 सितंबर 1961 को उनकी जन्मशती मनाई गई, और इसके 7-8 महीने बाद 14 अप्रैल 1962 को बेंगलूरु में उनका निधन हुआ। आजीवन कर्मयोगी विश्वेश्वरैया ने अपनी दीर्घायु का रहस्य समय-पालन, नियमित व्यायाम और निरंतर परिश्रम बताया था — उनका मानना था कि आलस्य त्यागकर ही भारत विकसित हो सकता है।