कठिन शब्दार्थ
पाठ्यपुस्तक में दिए गए शब्दार्थ (परीक्षा में सीधे पूछे जाते हैं):
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| उत्थान | उन्नति |
| छात्रवृत्ति | स्कॉलरशिप (Scholarship) |
| दक्षता | निपुणता |
| तबाही | विनाश |
| मेधा | बुद्धि शक्ति |
| सिंचाई | खेतों को पानी देना (Irrigation) |
| औद्योगिक विकास | उद्योगों की उन्नति (Industrial Development) |
| प्रशासक | शासन चलाने वाला (Administrator) |
| इस्पात | स्टील (Steel) |
अतिरिक्त शब्दार्थ (पाठ में प्रयुक्त):
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सूझ-बूझ | समझदारी, विवेक |
| इस्तीफ़ा | पद-त्याग |
| अभूतपूर्व | जो पहले कभी न हुआ हो |
| आलसीपन | काम न करने की प्रवृत्ति |
| स्वावलम्बन | अपने बल पर खड़ा होना |
| कर्मयोगी | कर्म में लीन रहने वाला व्यक्ति |
| विनयशील | नम्र स्वभाव का |
व्याख्या भाग 1: बाल्य जीवन एवं शिक्षा
मूल पाठ: "ऐसे महान् विश्वेश्वरय्या का जन्म मैसूर राज्य (अब कर्नाटक राज्य) के कोलार जिले के अन्तर्गत मुद्देनहल्ली नामक एक छोटे से गाँव में १५ सितंबर सन् १८६१ को हुआ था… विश्वेश्वरय्या के माता-पिता बहुत ही गरीब थे… फिर भी विश्वेश्वरय्या के मन में पढ़ने की लगन थी।"
व्याख्या: इस अंश में लेखक बताते हैं कि मोक्षगुंडम् विश्वेश्वरय्या का जन्म एक निर्धन परिवार में हुआ था, जहाँ माता-पिता के पास उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाने के साधन नहीं थे। परन्तु गरीबी बालक विश्वेश्वरय्या की पढ़ने की लगन को रोक न सकी। गाँव में प्रारम्भिक शिक्षा पूरी कर वे उच्च शिक्षा के लिए बेंगलूर गए, जहाँ खर्च चलाने के लिए उन्होंने ट्यूशन पढ़ाया। यह अंश यह सिद्ध करता है कि दृढ़ संकल्प और परिश्रम से गरीबी की बाधा भी पार की जा सकती है।
महत्वपूर्ण तथ्य: मैट्रिक के बाद सेंट्रल कॉलेज, बेंगलूर से बी.ए. उत्तीर्ण किया — उस समय उनकी आयु केवल उन्नीस वर्ष थी।
व्याख्या भाग 2: इंजीनियरिंग शिक्षा एवं प्रारम्भिक कैरियर
मूल पाठ: "विश्वेश्वरय्या समय के बड़े पाबन्द थे | वे अपना एक भी मिनट व्यर्थ होने न देते थे… परिणामस्वरूप विश्वविद्यालय में समय से पहले ही अपनी इंजीनियरिंग शिक्षा समाप्त कर पाये | साथ ही बम्बई विश्वविद्यालय भर में वे प्रथम श्रेणी में प्रथम निकले।"
व्याख्या: सेंट्रल कॉलेज के अंग्रेज प्रिंसिपल की सिफारिश पर पूना के साइंस कॉलेज में प्रवेश पाकर विश्वेश्वरय्या ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की और छात्रवृत्ति भी प्राप्त की। समय की पाबंदी और अथक परिश्रम के कारण उन्होंने न केवल तय समय से पहले पढ़ाई पूरी की, बल्कि पूरे बम्बई विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान भी प्राप्त किया। सरकारी नियम के अनुसार विश्वविद्यालय-प्रथम छात्र को नौकरी मिलती थी, इसलिए वे मात्र तेईस वर्ष की आयु में असिस्टेंट इंजीनियर नियुक्त हुए। यह अंश समय-पाबंदी और अनुशासन को सफलता की कुंजी के रूप में प्रस्तुत करता है।
व्याख्या भाग 3: शक्कर बैरेज एवं खडकवासला के आटोमैटिक गेट
मूल पाठ: "विश्वेश्वरय्या जब ३१ वर्ष के थे, तभी उन्होंने एक बहुत बड़ा कार्य साध लिया | वह है शक्कर बैरेज तथा वाटर वर्क्स का निर्माण… पूना के निकट 'खडकवासला' नामक एक बाँध बनाया गया | इस बाँध के लिए आटोमेटिक गेटों का डिजाइन आपने ही किया… अमेरीका की मशहूर पनामा नहर के लिए इसी डिजाइन की नकल की गई थी।"
व्याख्या: मात्र इकतीस वर्ष की आयु में विश्वेश्वरय्या ने सिंध प्रांत (आज पाकिस्तान में) के रेगिस्तानी शहर शक्कर के लिए जल-प्रबंधन की जटिल योजना सफलतापूर्वक पूरी की, जिससे उनका नाम पूरे देश में फैल गया। इसके बाद पूना के निकट खडकवासला बाँध के लिए उन्होंने स्वचालित (आटोमैटिक) गेटों का डिज़ाइन तैयार किया — यह ऐसी तकनीकी उपलब्धि थी कि विश्वप्रसिद्ध पनामा नहर के निर्माण में भी इसी डिज़ाइन को अपनाया गया। इससे विश्वेश्वरय्या की प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
व्याख्या भाग 4: हैदराबाद एवं मैसूर में योगदान
मूल पाठ: "मूसी नदी में बाढ़… इस वजह से खूब तबाही होती थी… विश्वेश्वरय्या ने मूसी नदी पर काबू पाने की योजना बनाई, बाँध भी बनवाया… यह बाँध 'कृष्णराज सागर' नाम से मशहूर है | इस बाँध के निर्माण से जहाँ उद्योगों के लिए बिजली प्राप्त हुई, वहीं पर सिंचाई के लिए पानी भी मिला।"
व्याख्या: नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद विश्वेश्वरय्या हैदराबाद राज्य के इंजीनियरिंग सलाहकार बने, जहाँ उन्होंने मूसी नदी की विनाशकारी बाढ़ पर नियंत्रण के लिए बाँध बनवाया और नगर को सुंदर बनाने हेतु 'बाग-ए-आम' नामक उद्यान की योजना बनाई। इसके पश्चात् मैसूर के महाराजा कृष्णराज ओडेयर के निमंत्रण पर वे मैसूर के चीफ इंजीनियर और बाद में दीवान बने। नौ वर्षों के इस कार्यकाल में उन्होंने कावेरी नदी पर कृष्णराज सागर बाँध बनवाया, जो सिंचाई और बिजली दोनों की समस्या का समाधान बना। साथ ही भद्रावती में इस्पात कारखाना, मैसूर विश्वविद्यालय, पंचायत व्यवस्था और वृंदावन उद्यान जैसी अनेक स्थायी उपलब्धियाँ उन्होंने मैसूर राज्य को दीं — जिससे मैसूर का 'नक्शा ही बदल गया'।
व्याख्या भाग 5: चरित्र एवं अंतिम संदेश
मूल पाठ: "उनका विश्वास था कि भारत में आलसियों की संख्या अधिक है, इसीलिए हमारा देश अमेरिका, जापान जैसा तरक्की नहीं कर पा रहा है | उनका विश्वास था कि जिस दिन हम अपने आलसीपन को त्याग देंगे, उसी दिन हमारे देश का भी विकास होगा।"
व्याख्या: जीवन के अंतिम वर्षों में भी विश्वेश्वरय्या पूर्णतः कर्मशील रहे। उन्होंने अपनी दीर्घायु का रहस्य समय-पालन, नियमित व्यायाम और निरंतर परिश्रम को बताया। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत के पिछड़ेपन का मूल कारण आलस्य है, और आलस्य त्यागकर ही राष्ट्र प्रगति कर सकता है। १९५५ में ९४ वर्ष की आयु में उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान 'भारतरत्न' से विभूषित किया गया, और १४ अप्रैल १९६२ को बेंगलूर में उनका निधन हुआ। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि श्रम और स्वावलम्बन से समाज में कोई भी व्यक्ति ऊँचाई प्राप्त कर सकता है — यही कारण है कि उनका जन्मदिन आज 'इंजीनियर्स डे' के रूप में मनाया जाता है।