कवि परिचय: बिहारी लाल
'गागर में सागर' भरने वाले रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारी लाल का जन्म ग्वालियर के पास 'बसुआ गोविंदपुर' नामक गाँव में हुआ। बिहारी अपने समय के असाधारण कवि थे। 'बिहारी सतसई' इनकी सबसे अधिक लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध रचना है, जिस पर अनेक भाषाओं में टीकाएँ लिखी गई हैं। इनके दोहों का मुख्य विषय शृंगार-वर्णन है, परन्तु इन्होंने भक्ति और नीति-विषयक दोहों की भी अत्यंत सफलतापूर्वक रचना की है।
'बिहारी सतसई' शृंगार का सागर तो है ही, साथ ही मानव-जीवन और समाज के विभिन्न पहलुओं की मार्मिक एवं निर्माणपरक झाँकी भी प्रस्तुत करती है। इनके नीति-विषयक दोहे सांसारिक ज्ञान को सामने लाते हैं। सतसई में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र की सामग्री उपस्थित है — यह विषय-व्यापकता रीतिकाल के अन्य कवियों में नहीं मिलती। बिहारी का भाषा-भंडार अत्यंत विस्तृत है — इन्होंने भाव और परिस्थिति के अनुकूल ब्रज और संस्कृत भाषा के शब्दों का सुंदर प्रयोग किया है।
पाठ का परिचय एवं उद्देश्य
प्रस्तुत दोहों में कवि बिहारीलाल ने श्रीकृष्ण-गोपिका के प्रेम, मन की शुद्धता, दान की महत्ता और मन की दुर्बलता आदि का चित्ताकर्षक वर्णन किया है। इन दोहों में जीवन के व्यावहारिक सत्य को अत्यंत संक्षिप्त परन्तु प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
सारांश भाग 1: मन की शुद्धता एवं कृष्ण-सौंदर्य (दोहे 1-3)
पहले दोहे में बिहारी शब्द-क्रीड़ा करते हुए कहते हैं कि 'कनक' (धतूरा) 'कनक' (सोना) से सौ गुना अधिक मादक है — धतूरा खाने से मनुष्य पागल हो जाता है, जबकि सोना पाते ही मनुष्य पागल (लालची) हो जाता है। यह दोहा धन के प्रति मोह की तीव्रता पर करारा व्यंग्य है।
दूसरे दोहे में बिहारी बताते हैं कि जपमाला, धार्मिक चिह्न और तिलक जैसे बाहरी आडंबरों से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता — यदि मन अशुद्ध (काँचा) है, तो यह सब व्यर्थ का नाच है; भगवान राम केवल सच्चे मन से ही प्रसन्न होते हैं।
तीसरे दोहे में बिहारी श्रीकृष्ण की बाँसुरी का अद्भुत वर्णन करते हैं — जब कृष्ण अपने अधरों पर बाँसुरी रखते हैं, तो उनके होठों, आँखों और वस्त्रों की चमक बाँसुरी पर पड़ती है, जिससे हरे बाँस की बाँसुरी इंद्रधनुषी रंगों से युक्त हो जाती है।
सारांश भाग 2: सापेक्ष महानता एवं प्रेम का विरोधाभास (दोहे 4-5)
चौथे दोहे में बिहारी कहते हैं कि नदी, कुआँ, तालाब, बावली — चाहे वे कितने भी गहरे या उथले हों — वही किसी के लिए सागर के समान हैं, जहाँ उसकी प्यास बुझ जाए। यह दोहा महानता की सापेक्षता को दर्शाता है — जो हमारी आवश्यकता पूरी करे, वही हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ है, चाहे वह बाहर से कितना भी छोटा क्यों न दिखे।
पाँचवें दोहे में बिहारी प्रेमी हृदय की अनोखी गति का वर्णन करते हैं — कोई भी इस अनुरागी चित्त की चाल को नहीं समझ पाता, क्योंकि जितना-जितना यह श्याम रंग (कृष्ण-प्रेम) में डूबता है, उतना-उतना ही यह उज्ज्वल (शुद्ध) होता जाता है। यह विरोधाभासी भाव भक्ति की अद्भुत प्रकृति को उजागर करता है — साधारणतः रंगने से वस्तु और गहरी होती है, परन्तु प्रेम में डूबने से हृदय और निर्मल होता जाता है।
सारांश भाग 3: धन का अहंकार, सापेक्ष सौंदर्य एवं जीवन-सत्य (दोहे 6-8)
छठे दोहे में बिहारी चेतावनी देते हैं कि जैसे-जैसे संपत्ति रूपी जल बढ़ता है, वैसे-वैसे मन रूपी कमल (अहंकार) भी बढ़ता जाता है। परन्तु जब संपत्ति घटने लगती है, तो मन का अहंकार धीरे-धीरे नहीं घटता, बल्कि जड़ सहित पूरी तरह मुरझा जाता है — यह धन और अहंकार के खतरनाक संबंध की चेतावनी है।
सातवें दोहे में बिहारी कहते हैं कि हर वस्तु अपने समय पर सुंदर लगती है — कोई भी वस्तु स्वाभाविक रूप से न तो सुंदर है और न कुरूप; मन की जितनी रुचि जिस वस्तु में होती है, उसी अनुपात में वह वस्तु सुंदर प्रतीत होती है — सौंदर्य पूर्णतः सापेक्ष है।
आठवें दोहे में बिहारी वेद, स्मृतियों तथा बुद्धिमान लोगों की सम्मिलित शिक्षा का उल्लेख करते हैं — पाप, राजा (सत्ता) और रोग — ये तीनों निर्बल/असहाय व्यक्ति को दबाते हैं। यह दोहा सामाजिक यथार्थ और शक्ति-संतुलन की गहरी समझ प्रदर्शित करता है।