मूल दोहे
- कनक कनक तैं सौगुनौ, मादकता अधिकाइ। उहिं खाऐं बौराइ, इहिं पाऐं ही बौंराइ।।
- जपमाला छापा तिलक, सरै न एकौ कामु। मन-काँचै नाचै वृथा, साँचे राँचे रामु।।
- अधर-धरत हरि कैं परत, ओठ-डीठि-पट-जोति। हरित बाँस की बाँसुरी, इंद्र धनुष-रंग होति।।
- अति अगाधु, अति औथरौ, नदी, कूप, सरु, बाइ। सो ताकौ सागरू जहाँ, जाकी प्यास बुझाइ।।
- या अनुरागी चित्तकी, गति समुझै नहिं कोइ। ज्यौं-ज्यौं बूड़ै स्याम रंग, त्यौं त्यौं उजलु होइ।।
- बढ़त-बढ़त सम्पति-सलिलु, मन-सरोजु बढ़ि जाइ। घटत-घटत फिरि न घटै, बरु समूल कुम्हिलाइ।।
- समै-समै सुन्दर सबै, रूप कुरूप न कोइ। मन की रुचि जेती जितै, तित तेती रुचि होइ।।
- कहै यहै श्रुति सुगृत्यौ, यहै सयाने लोग। तीन दबावत निसकहीं, पातक, राजा, रोग।।
कठिन शब्दार्थ
- कनक = स्वर्ण, धतूरा; मादकता = नशा; बौराइ = बावला/पागल।
- जपमाला = जप करने की माला; सरै = पूरा होना; काँचै = कच्चा; राँचै = प्रसन्न होना।
- अधर = होंठ; डीठि = दृष्टि; पट = वस्त्र; जोति = चमक।
- अगाधु = गहरे; औथरौ = उथले; सरु = सरोवर; बाइ = कुँआ।
- अनुरागी = प्रेमी; गति = चाल; बूड़ै = डूबे; स्याम रंग = साँवला रंग या कृष्ण का प्रेम।
- सलिलु = पानी; सरोजु = कमल; बरु = बल्कि; समूल = जड़ सहित; कुम्हिलाइ = मुरझा जाना।
- समै = समय; रुचि = पसंद; जेती = जितनी।
- श्रुति = वेद; सुम्रत्यौ = स्मृति भी; सयाने लोग = ज्ञानी लोग; निसकहीं = दुर्बल/अशक्त; पातक = पाप।
भावार्थ भाग 1: दोहे 1-3
दोहा 1: "कनक कनक तैं सौगुनौ, मादकता अधिकाइ। उहिं खाऐं बौराइ, इहिं पाऐं ही बौंराइ।" — बिहारी शब्द-क्रीड़ा से कहते हैं कि 'कनक' (धतूरा) 'कनक' (सोना) से सौ गुना अधिक मादक होता है — धतूरा खाने पर मनुष्य पागल होता है, परन्तु सोना तो पाते ही मनुष्य को पागल (लालची व अहंकारी) बना देता है।
दोहा 2: "जपमाला छापा तिलक, सरै न एकौ कामु। मन-काँचै नाचै वृथा, साँचे राँचे रामु।" — जपमाला, धार्मिक छापे और तिलक जैसे बाहरी दिखावे से कोई काम सिद्ध नहीं होता। यदि मन कच्चा (अशुद्ध, पाखंडी) है, तो यह सब व्यर्थ नाच-तमाशा है — भगवान राम तो केवल सच्चे, निर्मल मन से ही प्रसन्न होते हैं।
दोहा 3: "अधर-धरत हरि कैं परत, ओठ-डीठि-पट-जोति। हरित बाँस की बाँसुरी, इंद्र धनुष-रंग होति।" — जब श्रीकृष्ण अपने अधरों पर बाँसुरी रखते हैं, तो उनके होठों, आँखों और वस्त्रों की चमक बाँसुरी पर पड़ती है, जिससे साधारण हरे बाँस की बाँसुरी इंद्रधनुष के समान रंगीन प्रतीत होने लगती है — यह कृष्ण के दिव्य सौंदर्य का अद्भुत चित्रण है।
भावार्थ भाग 2: दोहे 4-6
दोहा 4: "अति अगाधु, अति औथरौ, नदी, कूप, सरु, बाइ। सो ताकौ सागरू जहाँ, जाकी प्यास बुझाइ।" — चाहे नदी, कुआँ, सरोवर या बावली कितनी भी गहरी या उथली हो, वह उस व्यक्ति के लिए सागर के समान है जिसकी प्यास वहाँ बुझ जाए — अर्थात् महानता और उपयोगिता व्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार सापेक्ष होती है।
दोहा 5: "या अनुरागी चित्तकी, गति समुझै नहिं कोइ। ज्यौं-ज्यौं बूड़ै स्याम रंग, त्यौं त्यौं उजलु होइ।" — इस प्रेमी हृदय की गति को कोई नहीं समझ सकता — यह जितना-जितना श्याम रंग (कृष्ण-प्रेम) में डूबता है, उतना-उतना ही उज्ज्वल (शुद्ध) होता जाता है। यह भक्ति के विरोधाभासी, रहस्यमय स्वभाव को दर्शाता है।
दोहा 6: "बढ़त-बढ़त सम्पति-सलिलु, मन-सरोजु बढ़ि जाइ। घटत-घटत फिरि न घटै, बरु समूल कुम्हिलाइ।" — जैसे-जैसे संपत्ति रूपी जल बढ़ता है, वैसे-वैसे मन रूपी कमल (अहंकार) भी बढ़ता जाता है। परन्तु जब संपत्ति घटने लगती है, तो अहंकार धीरे-धीरे नहीं घटता, बल्कि सम्पूर्ण जड़ सहित मुरझा जाता है — यह धन-आधारित अहंकार की भंगुरता की चेतावनी है।
भावार्थ भाग 3: दोहे 7-8
दोहा 7: "समै-समै सुन्दर सबै, रूप कुरूप न कोइ। मन की रुचि जेती जितै, तित तेती रुचि होइ।" — प्रत्येक वस्तु अपने-अपने समय पर सुंदर लगती है — कोई वस्तु स्वाभाविक रूप से न सुंदर है, न कुरूप। मन की जितनी रुचि जिस वस्तु में होती है, उसी अनुपात में वह वस्तु आकर्षक प्रतीत होती है — सौंदर्य पूर्णतः सापेक्ष और मानसिक अवस्था पर निर्भर है।
दोहा 8: "कहै यहै श्रुति सुगृत्यौ, यहै सयाने लोग। तीन दबावत निसकहीं, पातक, राजा, रोग।" — वेद, स्मृतियाँ तथा बुद्धिमान लोग सभी यही कहते हैं कि तीन चीज़ें निर्बल/असहाय व्यक्ति को दबाती हैं — पाप, राजा (सत्ता) और रोग। यह दोहा सामाजिक और आध्यात्मिक यथार्थ की गहरी समझ को दर्शाता है — कमज़ोर व्यक्ति इन तीनों के सामने असहाय हो जाता है।
अलंकार एवं काव्य-सौंदर्य
दोहा 1 में 'कनक-कनक' में यमक अलंकार है (एक ही शब्द के दो अलग अर्थों में प्रयोग)। दोहा 3 में बाँसुरी के इंद्रधनुषी रंग का वर्णन उत्प्रेक्षा अलंकार का उदाहरण है। दोहा 5 और 6 में विरोधाभास अलंकार (Paradox) प्रमुख है — 'डूबकर उज्ज्वल होना' और 'बढ़ते-बढ़ते अचानक मुरझा जाना' जैसी असामान्य किन्तु गहन युक्तियाँ। बिहारी की भाषा अत्यंत संक्षिप्त, चित्रात्मक और गूढ़ार्थ-प्रधान है — यही 'गागर में सागर' की उनकी काव्य-प्रतिभा का प्रमाण है। दोहों में श्रृंगार रस (दोहा 3), शांत/नीति रस (दोहा 1,2,6,7,8) तथा भक्ति भाव (दोहा 2,5) का सुंदर सम्मिश्रण है।