कविता: 'एक वृक्ष की हत्या' (मूल पाठ)

अबकी घर लौटा तो देखा वह नहीं था-- वही बूढ़ा चौकीदार वृक्ष जो हमेशा मिलता था घर के दरवाजे पर तैनात | पुराने चमड़े का बना उसका शरीर वही सख्त जान झुर्रियोंदार खुरदुरा तना मैलाकुचैला, राइफिल-सी एक सूखी डाल, एक पगड़ी फूल पत्तीदार, पाँवों में फटापुराना जूता चरमराता लेकिन अक्खड़ बल बूता |

धूप में, बारिश में, गर्मी में, सर्दी में, हमेशा चौकन्ना अपनी ख़ाकी वर्दी में दूर से ही ललकारता, 'कौन ?' मैं जवाब देता, 'दोस्त !' और पल भर को बैठ जाता उसकी ठंडी छाँव में |

दरअसल शुरू से ही था हमारे अंदेशों में कहीं एक जानी दुश्मन कि घर को बचाना है लुटेरों से शहर को बचाना है नादिरों से देश को बचाना है, देश के दुश्मनों से | बचाना है- नदियों को नाला हो जाने से हवा को धुँआ हो जाने से खाने को जहर हो जाने से; बचाना है - जंगल को, मरुथल हो जाने से, बचाना है - मनुष्य को, जंगल हो जाने से |

कठिन शब्दार्थ

शब्द अर्थ
तैनात नियुक्त
सख्त कठोर
खुरदुरा जो चिकनी सतह का न हो
अंदेशा संदेह, चिंता
नादिर आतंकी और लुटेरा, तबाही मचाने वाला
मरुथल मरुभूमि
अक्खड़ बल बूता दृढ़ और मज़बूत शक्ति
चौकन्ना सतर्क

भावार्थ (पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या)

प्रथम अंश: कवि जब इस बार घर लौटे तो पाया कि वह बूढ़ा वृक्ष वहाँ नहीं था, जो हमेशा घर के दरवाजे पर एक चौकीदार की तरह तैनात रहता था। कवि वृक्ष के प्रत्येक अंग की तुलना चौकीदार के शरीर से करते हैं — उसका तना पुराने चमड़े जैसा सख्त और झुर्रियोंदार, खुरदुरा और मैला-कुचैला था; सूखी डाल राइफिल जैसी लगती थी; पत्तियाँ फूल-पत्तीदार पगड़ी जैसी थीं; और जड़ें फटे-पुराने जूतों जैसी थीं, जो चरमराती तो थीं पर उनमें एक अक्खड़, मज़बूत शक्ति थी।

द्वितीय अंश: यह वृक्ष रूपी चौकीदार धूप-बारिश, गर्मी-सर्दी — हर मौसम में हमेशा चौकन्ना रहकर अपनी खाकी (हरी) वर्दी में तैनात रहता था। वह दूर से ही ललकारता, 'कौन?' और कवि उत्तर देते, 'दोस्त!' — फिर वे उसकी ठंडी छाँव में पल भर बैठ जाते थे। यह वृक्ष और कवि के बीच के आत्मीय, मित्रतापूर्ण संबंध को दर्शाता है।

तृतीय अंश (अंतिम): कवि बताते हैं कि शुरू से ही उनके मन में यह अंदेशा (चिंता) था कि कहीं कोई जाना-पहचाना दुश्मन छुपा है — इसलिए घर को लुटेरों से, शहर को नादिरों (आतंकियों/तबाही मचाने वालों) से, और देश को दुश्मनों से बचाना आवश्यक है। यही चिंता आगे बढ़कर पर्यावरण-संरक्षण तक फैल जाती है — नदियों को नाला बनने से, हवा को धुआँ बनने से, भोजन को विष बनने से, जंगल को मरुभूमि बनने से बचाना है। और सबसे महत्वपूर्ण बात — मनुष्य को स्वयं 'जंगल' (क्रूर, असंवेदनशील) बनने से बचाना है। यहाँ कवि व्यक्तिगत क्षति (वृक्ष की हानि) से एक व्यापक पर्यावरणीय और मानवीय चेतावनी तक पहुँचते हैं।

अलंकार एवं काव्य-सौंदर्य

मानवीकरण अलंकार (प्रधान): पूरी कविता में वृक्ष का मानवीकरण किया गया है — उसे एक 'बूढ़ा चौकीदार' कहा गया है, जिसका शरीर, वर्दी, पगड़ी, जूते सब वर्णित हैं। यह विस्तृत मानवीकरण कविता की सबसे बड़ी काव्यगत विशेषता है।

उपमा अलंकार: 'राइफिल-सी एक सूखी डाल' में सूखी डाल की तुलना राइफिल से की गई है; 'पुराने चमड़े का बना उसका शरीर' में तने की तुलना चमड़े से की गई है।

बिम्ब-योजना (Imagery): वृक्ष के प्रत्येक भौतिक अंग (तना, डाल, पत्ती, जड़) का चौकीदार के शरीर, हथियार, पगड़ी, जूतों से सजीव तुलनात्मक चित्रण एक अद्भुत बिम्ब-योजना प्रस्तुत करता है।

संवाद-शैली: 'कौन?' और 'दोस्त!' का संक्षिप्त संवाद कविता को अत्यंत जीवंत और आत्मीय बनाता है।

प्रतीकात्मकता: वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि सुरक्षा, मित्रता और पर्यावरणीय संतुलन का प्रतीक बन जाता है।

रस: इस कविता में करुण रस (वृक्ष की क्षति पर शोक) के साथ-साथ चिंतनपरक/शांत रस भी विद्यमान है, जो पर्यावरण-संरक्षण की गंभीर चेतावनी में परिलक्षित होता है।