लेखक परिचय: डॉ. श्यामसुंदर दास

मूर्धन्य साहित्यकार तथा भाषाविद् श्यामसुंदर दास जी का जन्म 1875 ई. में काशी में हुआ। इन्होंने 1897 ई. में बी.ए. की उपाधि प्राप्त की और हिन्दू स्कूल में अध्यापन कार्य किया, तत्पश्चात लखनऊ के कालीचरन स्कूल में हैड मास्टर रहे। 1921 में आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यक्ष पद पर नियुक्त हुए।

डॉ. दास में हिन्दी के प्रति अनन्य निष्ठा थी। विद्यार्थी काल में ही अपने दो सहयोगियों की सहायता से 16 जुलाई 1893 में इन्होंने 'नागरी प्रचारिणी सभा' की स्थापना की। इन्होंने कोश, इतिहास, काव्यशास्त्र, भाषाविज्ञान, अनुसंधान, पाठ्य-पुस्तक और संपादित ग्रंथों के माध्यम से हिन्दी को समृद्ध किया। इनकी साहित्य-साधना को सम्मानित करते हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने 'साहित्य वाचस्पति' तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने डी.लिट् की उपाधि प्रदान की। 1945 ई. में इनका स्वर्गवास हुआ।

प्रमुख कृतियाँ

  • मौलिक कृतियाँ: नागरी वर्णमाला, साहित्य लोचन, भाषा विज्ञान, हिन्दी भाषा का विकास, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, हिन्दी भाषा और साहित्य, गोस्वामी तुलसीदास, भाषा रहस्य, मेरी आत्म-कहानी आदि।
  • संपादन: चंद्रावली, रामचरितमानस, पृथ्वीराज रासो, हिन्दी वैज्ञानिक कोश, कबीर ग्रंथावली, सरस्वती आदि।

पाठ का परिचय एवं उद्देश्य

प्रस्तुत निबंध डॉ. श्यामसुंदर दास द्वारा लिखित 'नीति-शिक्षा' नामक ग्रंथ से लिया गया है। इस निबंध में लेखक ने हमें अपने कर्त्तव्यों के प्रति निष्ठावान बनने के लिए प्रेरित किया है। वे सत्यता को खुले रूप में अपनाने का आग्रह करते हैं — झूठ बोलना, पाप कार्य करना, कायरता जैसे दुर्गुणों को त्यागकर सत्य मार्ग पर चलने की सीख देते हैं।

विद्यार्थियों के मन में 'कर्त्तव्य और सत्यता' के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से इस पाठ का चयन पाठ्यक्रम में किया गया है।

केंद्रीय संदेश: कर्त्तव्य-पालन और सत्यता में घनिष्ठ संबंध है — जो मनुष्य अपना कर्त्तव्य ईमानदारी से निभाता है, वह अपने कामों और वचनों में सत्यता का भी बर्ताव रखता है।

निबंध का सार — भाग 1: कर्त्तव्य का स्वरूप

लेखक के अनुसार कर्त्तव्य वह वस्तु है जिसे करना हम सबका परम धर्म है, और जिसके न करने से हम दूसरों की दृष्टि में गिर जाते हैं। कर्त्तव्य-पालन का आरंभ घर से होता है — बच्चों का माता-पिता के प्रति, माता-पिता का बच्चों के प्रति, पति-पत्नी, स्वामी-सेवक के परस्पर कर्त्तव्य होते हैं। घर के बाहर मित्रों, पड़ोसियों और समाज के प्रति भी अनेक कर्त्तव्य होते हैं। लेखक बताते हैं कि मनुष्य के मन में एक ऐसी शक्ति होती है जो उसे बुरे कामों से रोकती और अच्छे कामों की ओर प्रवृत्त करती है — जैसे चोरी करने वाला बच्चा मन-ही-मन पछताता है, जबकि ईमानदार बच्चा सदा प्रसन्न रहता है। यही आत्मा की आवाज़ मनुष्य को धर्म-पालन के लिए प्रेरित करती है।

लेखक चेतावनी देते हैं कि धर्म-पालन के मार्ग में चित्त की चंचलता, उद्देश्य की अस्थिरता और मन की निर्बलता सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। इसी संदर्भ में लेखक एक मार्मिक दृष्टांत देते हैं — बीच समुद्र में डूबते एक अंग्रेज़ी जहाज़ पर सवार पुरुषों ने सभी स्त्रियों और बच्चों को नावों में बचाकर स्वयं जहाज़ पर खड़े रहकर प्राण त्याग दिए, क्योंकि यही उन्होंने अपना कर्त्तव्य समझा। इसके विपरीत फ्रांस के एक जहाज़ पर लोगों ने स्वार्थवश स्त्री-बच्चों को छोड़कर स्वयं अपने प्राण बचाए, जिसकी सारे संसार में निंदा हुई — यह विरोधाभास कर्त्तव्य-पालन के महत्व को स्पष्ट करता है।

निबंध का सार — भाग 2: सत्यता का महत्व

लेखक कर्त्तव्य-पालन और सत्यता के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित करते हुए कहते हैं कि जो मनुष्य कर्त्तव्यनिष्ठ है, वह अपने कामों और वचनों में सत्यता का बर्ताव भी रखता है। संसार में कोई भी कार्य झूठ बोलने से सफल नहीं हो सकता — यदि किसी घर के सभी सदस्य झूठ बोलने लगें, तो उस घर का कोई काम ठीक से नहीं चल सकता। लेखक झूठ को सबसे बड़ा पाप मानते हैं, जिसकी उत्पत्ति पाप, कुटिलता और कायरता से होती है।

लेखक झूठ के विविध रूपों की चर्चा करते हैं — चुप रहना, बात बढ़ा-चढ़ाकर कहना, किसी बात को छिपाना, भेद बदलना, बिना सोचे-समझे हाँ में हाँ मिलाना, प्रतिज्ञा करके न निभाना — ये सभी झूठ बोलने के ही रूप हैं। जो व्यक्ति बनावटी गुण दिखाकर दूसरों को धोखा देता है (जैसे कवि न होते हुए भी कवि होने का दिखावा करना), वह अंततः पोल खुलने पर समाज में झूठा और नीच गिना जाता है। इसके विपरीत, सत्यवादी व्यक्ति आडंबर और दिखावे से सदैव दूर रहता है।

निष्कर्ष: लेखक का संदेश है कि हमें सदा सत्य बोलना अपना परम धर्म मानना चाहिए, चाहे इससे कितनी ही हानि क्यों न हो — क्योंकि सत्य बोलने से ही समाज में सम्मान और आंतरिक संतोष प्राप्त होता है, जबकि झूठे व्यक्ति से सभी घृणा करते हैं।