कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| निर्भर | अवलंबित (किसी पर टिका हुआ) |
| हिचकिचाना | आगे-पीछे देखना, संकोच करना |
| चाटुकार | चापलूसी करने वाला, खुशामद करने वाला |
| ठग-विद्या | धोखा देने की कला |
| पोत | जहाज़ |
| कुत्सित | नीच, अधम |
| भेष | वेष, रूप-रंग |
मुहावरा
| मुहावरा | अर्थ |
|---|---|
| पोल खुलना | रहस्य प्रकट होना, भेद उजागर होना |
[Exam Tip] निबंध शैली के पाठों में शब्दार्थ प्रायः अमूर्त भावों (जैसे 'निर्भर', 'हिचकिचाना') से जुड़े होते हैं — इन्हें वाक्य में प्रयोग करके याद करना अधिक प्रभावी है।
व्याख्या
गद्यांश 1
"जिधर देखो उधर कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य देख पड़ते हैं। बस, इसी कर्त्तव्य का पूरा-पूरा पालन करना हम लोगों का धर्म है और इसी से हम लोगों के चरित्र की शोभा बढ़ती है।"
प्रसंग: यह पंक्ति निबंध के आरंभिक भाग से ली गई है, जहाँ लेखक डॉ. श्यामसुंदर दास मनुष्य-जीवन में कर्त्तव्यों की व्यापकता को स्पष्ट कर रहे हैं।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि मनुष्य का समस्त जीवन कर्त्तव्यों से घिरा हुआ है — चाहे वह घर हो या बाहर की दुनिया, हर दिशा में कोई न कोई कर्त्तव्य दिखाई देता है। इन कर्त्तव्यों का पूर्ण निष्ठा से पालन करना ही हमारा परम धर्म है, और यही कर्त्तव्य-पालन हमारे चरित्र को श्रेष्ठ और शोभायमान बनाता है। लेखक का आशय है कि चरित्र-निर्माण कोई अलग प्रक्रिया नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के कर्त्तव्यों के निर्वहन से ही होता है।
गद्यांश 2
"कर्त्तव्य-पालन से और सत्यता से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। जो मनुष्य अपना कर्त्तव्य पालन करता है वह अपने कामों और वचनों में सत्यता का बर्ताव भी रखता है।"
प्रसंग: यह पंक्ति निबंध के मध्य भाग में आती है, जहाँ लेखक कर्त्तव्य और सत्यता के बीच के संबंध को केंद्रीय विषय के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
व्याख्या: लेखक स्पष्ट करते हैं कि कर्त्तव्य-पालन और सत्यता अलग-अलग गुण नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जो व्यक्ति अपने कर्त्तव्यों के प्रति निष्ठावान है, वह स्वाभाविक रूप से अपने वचनों और कार्यों में भी सच्चाई बरतता है — क्योंकि झूठ बोलकर कोई भी व्यक्ति अपने कर्त्तव्य का सच्चा निर्वहन नहीं कर सकता। यह पंक्ति निबंध के शीर्षक 'कर्त्तव्य और सत्यता' के मूल भाव को साकार करती है।
गद्यांश 3
"संसार में जितने पाप हैं झूठ उन सबों में बुरा है। झूठ की उत्पत्ति पाप, कुटिलता और कायरता के कारण होती है।"
प्रसंग: यह अंश उस भाग में आता है जहाँ लेखक झूठ के दुष्परिणामों और उसके स्रोतों की विस्तृत चर्चा करते हैं।
व्याख्या: लेखक झूठ को समस्त पापों में सबसे गंभीर मानते हैं, क्योंकि यह अन्य कई दुर्गुणों (पाप, कुटिलता अर्थात् छल-कपट, और कायरता) की उपज है। जो व्यक्ति सत्य बोलने का साहस नहीं रखता या अपने स्वार्थ के लिए छल करता है, वही झूठ का सहारा लेता है। यह पंक्ति निबंध में सत्यता को सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्थापित करने के लेखक के तर्क की नींव है।
गद्यांश 4
"यदि हम सदा सत्य बोलना अपना धर्म मानेंगे तो हमें अपने कर्त्तव्य के पालन करने में कुछ भी कष्ट न होगा और बिना किसी परिश्रम और कष्ट के हम अपने मन में सदा संतुष्ट और सुखी बने रहेंगे।"
प्रसंग: यह निबंध की अंतिम पंक्तियों में से एक है, जो लेखक के उपसंहार (निष्कर्ष) का भाग है।
व्याख्या: निबंध के अंत में लेखक अपने संपूर्ण तर्क का सार प्रस्तुत करते हैं — यदि मनुष्य सत्य बोलने को अपना स्थायी सिद्धांत बना ले, तो कर्त्तव्य-पालन में आने वाली सभी बाधाएँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी। सत्यनिष्ठ जीवन ही सच्चे सुख और आत्म-संतोष का मार्ग है — यह पंक्ति निबंध के व्यावहारिक जीवन-दर्शन को सरल शब्दों में समेटती है।