कवि परिचय: नरेन्द्र शर्मा
नरेन्द्र शर्मा का जन्म 1913 ई. में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के जहाँगीरपुर नामक गाँव में हुआ। उन्होंने 1936 ई. में प्रयाग विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल-यात्राएँ भी करनी पड़ीं। 1954 ई. में उन्हें मुंबई के आकाशवाणी केन्द्र में 'विविध भारती' कार्यक्रम का संचालक नियुक्त किया गया।
रचनाएँ (कविता-संग्रह): प्रभात फेरी, शूल-फूल, प्रवासी के गीत, पलाश वन, मिट्टी और फूल, कदली वन, हंसमाला, रक्तचंदन, बहुत रात रोये आदि। खंड काव्य: द्रौपदी, उत्तरजय तथा सुवर्णा।
काव्य-विशेषताएँ: नरेन्द्र शर्मा की रचनाओं में शृंगारिकता, दार्शनिकता तथा प्रतीकात्मकता दृष्टिगोचर होती है। सामाजिक विषमताओं को भी उन्होंने अत्यंत भावुक ढंग से अपने काव्य में स्थान दिया है। उनकी भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है, जिसमें भाषा की सरसता, मधुरता, प्रवाहमयता तथा सरलता विद्यमान है।
[Exam Tip] नरेन्द्र शर्मा आकाशवाणी के 'विविध भारती' कार्यक्रम के संस्थापक-संचालक के रूप में भी परीक्षा में पूछे जा सकते हैं।
कविता की पृष्ठभूमि एवं सारांश
प्रस्तुत कविता में कवि ने मनुष्य को कायर न बनने का संदेश दिया है। कवि मानवता को अत्यधिक महत्व देते हुए दुष्टों के सम्मुख आत्मसमर्पण न करने के लिए कहते हैं।
कवि कहते हैं कि मनुष्य चाहे कुछ भी बने, परन्तु कायर न बने — कठिनाइयों (पत्थरों) से घबराकर सिर न पटके, बल्कि उन्हें ठोकर मारकर आगे बढ़े। ले-देकर (समझौता करके) जीना कोई जीवन नहीं है; दुख के आँसू कब तक पिए जाएँ? मानवता ने युगों तक खून-पसीना बहाकर मनुष्य को सींचा है, इसलिए उसे कायरतापूर्ण रुदन (क्रंदन) के बजाय कुछ कर दिखाना चाहिए।
जब कोई दुष्ट (पामर) युद्ध की चुनौती दे, तो मनुष्य को पीठ फेरकर भागना नहीं चाहिए — या तो प्रेम (प्रीति) के बल पर विजय प्राप्त करे, या फिर लुटेरे (तस्कर) को उसके चरण चूमने पड़ें। कवि स्पष्ट करते हैं कि प्रतिहिंसा भी एक प्रकार की दुर्बलता है, परन्तु कायरता उससे भी अधिक अपावन (अपवित्र) है।
कवि कहते हैं कि मनुष्य की सुरक्षा का कोई विशेष मोल नहीं, परन्तु उसकी मानवता अमूल्य है — शरीर मिटता है, परन्तु मानवीय मूल्य सदा बने रहते हैं, यही सत्य की सही कसौटी है। इसलिए मनुष्य अपना सर्वस्व मानवता को अर्पित करे, परन्तु दुष्ट के सामने कभी आत्मसमर्पण न करे — 'कुछ भी बन, बस कायर मत बन' यही कविता का केंद्रीय संदेश है।