कविता: 'कायर मत बन' (मूल पाठ)
कुछ भी बन बस कायर मत बन | ठोकर मार पटक मत माथा, तेरी राह रोकते पाहन | कुछ भी बन बस कायर मत बन |
ले-देकर जीना क्या जीना ? कब तक गम के आँसू पीना ? मानवता ने सींचा तुझको बहा युगों तक खून-पसीना | कुछ न करेगा? किया करेगा… रे मनुष्य-बस कातर क्रंदन? कुछ भी बन बस कायर मत बन |
युद्धं देहि कहे जब पामर दे न दुहाई पीठ फेर कर; या तो जीत प्रीति के बल पर या तेरा पद चूमे तस्कर | प्रतिहिंसा भी दुर्बलता है, पर कायरता अधिक अपावन कुछ भी बन बस कायर मत बन |
तेरी रक्षा का न मोल है, पर तेरा मानव अमोल है, यह मिटता है, वह बनता है, यही सत्य की सही तोल है, अर्पण कर सर्वस्व मनुज को, कर न दुष्ट को आत्मसमर्पण, कुछ भी बन बस कायर मत बन |
कठिन शब्दार्थ एवं मुहावरे
| शब्द/मुहावरा | अर्थ |
|---|---|
| पाहन | पत्थर |
| पामर | दुष्ट, नीच |
| तस्कर | चोर, लुटेरा |
| क्रंदन | रुदन, विलाप |
| अपावन | अपवित्र |
| मनुज | मनुष्य |
| गम के आँसू पीना (मुहावरा) | दुख-दर्द सहना |
भावार्थ (पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या)
प्रथम अंतरा (टेक/ध्रुव पंक्ति सहित): कवि कहते हैं कि मनुष्य चाहे कुछ भी बने, परन्तु कायर न बने। जीवन-पथ में आने वाली कठिनाइयों (पत्थरों) से घबराकर सिर न पटके, बल्कि उन्हें ठोकर मारकर आगे बढ़े। यह 'कुछ भी बन बस कायर मत बन' पंक्ति पूरी कविता में बार-बार दोहराई गई है, जो कविता की मूल भावना को रेखांकित करती है।
द्वितीय अंतरा: कवि पूछते हैं कि समझौता करके, दबकर जीना कोई सच्चा जीवन नहीं है — कब तक दुख के आँसू पीते रहोगे (गम के आँसू पीना मुहावरा)? मानवता ने युगों तक खून-पसीना बहाकर मनुष्य को सींचा और पोषित किया है, इसलिए उसे कातर होकर रोने के बजाय कुछ कर दिखाना चाहिए।
तृतीय अंतरा: जब कोई दुष्ट (पामर) युद्ध की चुनौती दे (युद्धं देहि), तो मनुष्य को पीठ फेरकर भागना नहीं चाहिए। उसे या तो प्रेम (प्रीति) के बल पर विजय प्राप्त करनी चाहिए, या फिर लुटेरे को उसके चरण चूमने पड़ें (अर्थात् प्रेम-शक्ति ऐसी हो कि शत्रु भी झुक जाए)। कवि स्पष्ट करते हैं कि बदले की भावना (प्रतिहिंसा) भी एक प्रकार की दुर्बलता है, परन्तु कायरता उससे भी अधिक अपवित्र है।
चतुर्थ अंतरा (अंतिम): कवि कहते हैं कि मनुष्य के शरीर की सुरक्षा का कोई विशेष मोल नहीं, परन्तु उसकी मानवता (मानवीय मूल्य) अमूल्य है। शरीर नश्वर है, मिट जाता है, परन्तु मानवीय आदर्श सदा बने रहते हैं — यही सत्य की सही कसौटी (तोल) है। इसलिए मनुष्य को अपना सर्वस्व मानवता की सेवा में अर्पित करना चाहिए, परन्तु दुष्ट के समक्ष कभी आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए।
अलंकार एवं काव्य-सौंदर्य
पुनरुक्ति/टेक (ध्रुव पंक्ति): 'कुछ भी बन बस कायर मत बन' पंक्ति प्रत्येक अंतरे के अंत में दोहराई गई है — यह कविता को एक ओजपूर्ण, गीत जैसा प्रभाव देती है और मूल संदेश को बार-बार दृढ़ करती है।
अनुप्रास अलंकार: 'कुछ भी बन बस कायर' में 'क' और 'ब' ध्वनियों की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार बनता है।
रूपक/प्रतीकात्मकता: 'खून-पसीना बहाना' मानवता के त्याग व परिश्रम का प्रतीक है; 'पाहन' (पत्थर) जीवन की बाधाओं का प्रतीक है।
प्रश्नालंकार शैली: 'ले-देकर जीना क्या जीना?', 'कब तक गम के आँसू पीना?' जैसे आलंकारिक प्रश्नों से कवि पाठक को झकझोरते हैं।
रस एवं गुण: इस कविता में वीर रस तथा ओज गुण प्रधान है — भाषा में दृढ़ता, ललकार और प्रेरणा का स्वर मुखर है, जो पाठक में साहस व संघर्ष की भावना जगाता है।