कवि परिचय: सूरदास

सूरदास हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल की कृष्ण-भक्ति शाखा के मूर्धन्य कवि हैं। इनका जन्म 1483 ई. में दिल्ली के पास सीही नामक गाँव में एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सूरदास ने महाप्रभु वल्लभाचार्य से पुष्टिमार्ग की दीक्षा ली थी।

सूरदास के काव्य का मूलाधार 'भागवत पुराण' है। 'सूरसागर', 'सूरसारावली', 'साहित्य लहरी' इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। सूरदास की समस्त कीर्ति का आधार 'सूरसागर' है — जनश्रुति तथा वार्ता-साहित्य के अनुसार इसमें सवा लाख पद थे, किन्तु अब तक आठ-दस हज़ार पद ही प्रकाश में आ सके हैं।

सूरदास ने भक्ति के सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य भाव को स्वीकार किया है। इन्हें अष्टछाप के कवियों में श्रेष्ठ माना जाता है।

पाठ का परिचय एवं उद्देश्य

प्रस्तुत पदों में सूरदास ने श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य, माखन-चोरी प्रसंग और गोपिकाओं के समर्पण-भाव का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। इसमें विविध भावमयी ब्रजभाषा का प्रयोग करते हुए सरस काव्य की सृष्टि की गई है।

सारांश भाग 1: पद 1 — गोपिकाओं का सौभाग्य

"ऊधौ हम आजु भईं बड़-भागी" — इस पद में गोपिकाएँ उद्धव को संबोधित करते हुए कहती हैं कि आज वे अत्यंत भाग्यशाली हुई हैं, क्योंकि जिन आँखों ने श्याम (श्रीकृष्ण) को देख लिया, वे आँखें अब उन्हीं में लग गई हैं। वे अपनी इस अनुभूति की तुलना उस भ्रमर से करती हैं जो फूल की सुगंध पाकर आनंदित हो उठता है, और दर्पण में प्रतिबिंब देखने जैसी गहरी रुचि से करती हैं। सूरदास कहते हैं कि हरि (कृष्ण) से मिलन होते ही गोपिकाओं की विरह-व्यथा शरीर से दूर हो गई — यह पद गोपी-कृष्ण के अनन्य प्रेम की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

सारांश भाग 2: पद 2 — यमुना तट पर श्रीकृष्ण का रूप-सौंदर्य

"जमुना तट देखे नँद नंदन" — इस पद में यमुना नदी के किनारे नंद के पुत्र (श्रीकृष्ण) के अद्भुत रूप-सौंदर्य का वर्णन है — मोर-पंखों का मुकुट, मकर के आकार के कुंडल, पीत वस्त्र और शरीर पर चंदन का लेप। कृष्ण के दर्शन से गोपिकाओं के नेत्र तृप्त हो जाते हैं और हृदय की तपन शांत हो जाती है। वे प्रेम में मग्न होकर, हृदय गद्गद होकर, मुख से वाणी तक नहीं निकाल पातीं। कमल-नयन कृष्ण यमुना तट पर खड़े हैं, और ब्रज की नारियाँ संकोचवश उनसे मिलने में सकुचाती हैं। सूरदास कहते हैं कि प्रभु स्वयं अंतर्यामी (अंतर की बात जानने वाले) हैं और व्रत-पूर्ण होकर वहाँ पधारे हैं।

सारांश भाग 3: पद 3 — बाल-कृष्ण की माखन-चोरी लीला

"चोरी करत कान्ह धरि पाए" — यह पद बाल-कृष्ण की प्रसिद्ध माखन-चोरी लीला का वर्णन करता है। एक गोपी कृष्ण को रंगे हाथों माखन चुराते पकड़ लेती है और शिकायत करती है कि उसने रात-दिन उसे बहुत सताया है, अब वह पकड़ में आया है। वह कहती है कि कृष्ण ने उसका सारा माखन-दही खा लिया और बहुत उत्पात मचाया। कृष्ण दोनों भुजाएँ पकड़े जाने पर सफाई देते हैं कि उन्होंने कभी माखन नहीं खाया, उनके सखाओं (मित्रों) ने सब खा लिया। कृष्ण का मुख देखकर, उनकी मुस्कान से पिघलकर गोपी का क्रोध शांत हो जाता है, और वह श्याम को हृदय से लगा लेती है। सूरदास इस मनोहर बाल-लीला पर स्वयं को बलिहारी (न्योछावर) मानते हैं।