मूल पद
पद 1:
ऊधौ हम आजु भईं बड़-भागी। जिन अँखियन तुम स्याम बिलोके, ते अँखियाँ हम लागीं। जैसे सुमन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी। अति आनंद होत है तैसें, अंग-अंग सुख रागी। ज्यों दरपन मैं दरस देखियत, दृष्टि परम रुचि लागी। तैसें सूर मिले हरि हमकौं, बिरह-बिथा तन त्यागी।।
पद 2:
जमुना तट देखे नँद नंदन। मोर-मुकुट मकराकृत-कुंडल, पीत-बसन तन चंदन। लोचन तृप्त भए दरसन तैं उर की तपनि बुझानी। प्रेम-मगन तब भईं सुंदरी, उर गदगद, मुख-बानी। कमल-नयन तट पर हैं ठाढ़े, सकुचहिं मिलि ब्रज नारी। सूरदास-प्रभु अंतरजामी, ब्रत-पूरन पगधारी।।
पद 3:
चोरी करत कान्ह धरि पाए। निसि-बासर मोहिँ बहुत सतायौ अब हरि अरि हाथहि आए। माखन-दधि मेरों सब खायौ, बहुत अचगरी कीन्ही। अब तो घात परे हौ लालन, तुम्हँ भलै मैं चीन्ही। दोउ भुज पकरि, कहयौ कहूँ जैहाँ माखन लेउँ मँगाइ। तेरी सौं मैं नेकु न खायौ, सखा गये सब खाइ। मुख तन चितै, बिहँसि हरि दीन्हौ, रिस तब गई बुझाइ। लियौ स्याम उर लाइ ग्वालिनी, सूरदास बलि जाइ।।
कठिन शब्दार्थ
पद 1: बड़-भागी = भाग्यशाली; बिलोके = देखना; सुमन = फूल; मधुप = भ्रमर; दरपन = आईना; हरि = कृष्ण; बिथा = व्यथा।
पद 2: जमुना = यमुना; तट = किनारा; तन = शरीर; लोचन = आँखें; दरसन = दर्शन; उर = हृदय; बानी = वाणी; सकुचहिं = संकोच करना; अंतरजामी = अंतर्यामी।
पद 3: निसि-बासर = रात-दिन; सखा = मित्र; अचगरी = आश्चर्य/उत्पात।
भावार्थ भाग 1: पद 1 — गोपिकाओं का सौभाग्य-भाव
"ऊधौ हम आजु भईं बड़-भागी" — गोपिकाएँ उद्धव से कहती हैं कि आज हम बहुत भाग्यशाली हुई हैं।
"जिन अँखियन तुम स्याम बिलोके, ते अँखियाँ हम लागीं" — जिन आँखों ने श्याम (कृष्ण) को देख लिया है, वे आँखें अब हमें अत्यंत प्रिय लगती हैं।
"जैसे सुमन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी" — जैसे पवन फूल की सुगंध लेकर आता है और भ्रमर उस सुगंध पर आसक्त हो जाता है।
"अति आनंद होत है तैसें, अंग-अंग सुख रागी" — वैसे ही श्रीकृष्ण के दर्शन से हमारे अंग-अंग में अत्यंत आनंद और सुख की अनुभूति होती है।
"ज्यों दरपन मैं दरस देखियत, दृष्टि परम रुचि लागी" — जैसे दर्पण में प्रतिबिंब देखने में गहरी रुचि लगती है, वैसे ही कृष्ण-दर्शन में हमारी दृष्टि लगी रहती है।
"तैसें सूर मिले हरि हमकौं, बिरह-बिथा तन त्यागी" — सूरदास कहते हैं कि हरि से मिलन होते ही हमारे शरीर से विरह की व्यथा दूर हो गई है।
भावार्थ भाग 2: पद 2 — श्रीकृष्ण का रूप-सौंदर्य
"जमुना तट देखे नँद नंदन" — यमुना नदी के किनारे नंद के पुत्र (श्रीकृष्ण) को देखा।
"मोर-मुकुट मकराकृत-कुंडल, पीत-बसन तन चंदन" — उनके सिर पर मोर-पंखों का मुकुट है, कानों में मकर के आकार के कुंडल हैं, शरीर पर पीले वस्त्र और चंदन का लेप है।
"लोचन तृप्त भए दरसन तैं उर की तपनि बुझानी" — कृष्ण के दर्शन से आँखें तृप्त हो गईं और हृदय की तपन (विरह की जलन) शांत हो गई।
"प्रेम-मगन तब भईं सुंदरी, उर गदगद, मुख-बानी" — तब सुंदरियाँ (गोपिकाएँ) प्रेम में मग्न हो गईं, हृदय गद्गद हो गया, और मुख से वाणी नहीं निकल पाई।
"कमल-नयन तट पर हैं ठाढ़े, सकुचहिं मिलि ब्रज नारी" — कमल जैसे नेत्रों वाले कृष्ण तट पर खड़े हैं, और ब्रज की स्त्रियाँ उनसे मिलने में संकोच करती हैं।
"सूरदास-प्रभु अंतरजामी, ब्रत-पूरन पगधारी" — सूरदास कहते हैं कि प्रभु अंतर्यामी (सबकी अंतरात्मा की बात जानने वाले) हैं और अपने व्रत को पूर्ण करते हुए वहाँ पधारे हैं।
भावार्थ भाग 3: पद 3 — माखन-चोरी की मनोहर लीला
एक गोपी बाल-कृष्ण को माखन चुराते हुए रंगे हाथों पकड़ लेती है और कहती है कि उसने रात-दिन उसे बहुत सताया है, अब वह पकड़ में आ गया है। उसने कहा कि कृष्ण ने सारा माखन-दही खा लिया और बहुत उत्पात मचाया — अब पकड़े जाने पर, हे लालन (प्रिय), मैंने तुम्हें अच्छी तरह पहचान लिया है। गोपी उसकी दोनों भुजाएँ पकड़ लेती है। कृष्ण सफाई देते हैं कि वे कहीं से माखन मँगवा देंगे, उन्होंने स्वयं कभी माखन नहीं खाया — उनके सखा (मित्र) ही सब खा गए। कृष्ण का मुख देखकर, उनकी मुस्कुराहट से गोपी का क्रोध शांत हो जाता है, और वह श्याम को अपने हृदय से लगा लेती है। सूरदास इस मनमोहक बाल-लीला पर स्वयं को बलिहारी (न्योछावर) मानते हैं।
अलंकार, रस एवं काव्य-सौंदर्य
पद 1 में उपमा अलंकार है — 'जैसे सुमन बास लै आवत' तथा 'ज्यों दरपन मैं दरस देखियत' में उपमाओं द्वारा प्रेम-भाव को सजीव किया गया है। पद 2 में कृष्ण के रूप-वर्णन में अंग-प्रत्यंग का चित्रात्मक चित्रण (मोर-मुकुट, मकराकृत-कुंडल, पीत-बसन) है, जिसमें स्वभावोक्ति अलंकार दिखता है। पद 3 में संवाद-शैली द्वारा वात्सल्य एवं माधुर्य रस का सुंदर मिश्रण है — गोपी का क्रोध और कृष्ण की चतुराई भरी सफाई इसे जीवंत बनाती है। तीनों पदों में समग्र रूप से श्रृंगार रस (विशेषतः संयोग शृंगार) प्रधान है, और सूरदास की ब्रजभाषा में चित्रात्मकता तथा संगीतात्मकता दोनों की झलक मिलती है।