खनिज तथा ऊर्जा संसाधन
खनिज तथा ऊर्जा संसाधन अध्याय से 2026-27 के सैंपल पेपर और मई 2026 में 2 अंक आए, और फ़रवरी 2026 में 7 अंक, जब भूगोल का 5 अंक वाला प्रश्न (पेट्रोलियम या कोयला: महत्त्व और वितरण) इसी से था। खनिजों के मिलने के तरीकों, लौह अयस्क की पेटियों और प्रकारों, बॉक्साइट और खदानों पर बहुविकल्पीय प्रश्न, अक्सर कथनों या किसी स्थिति के रूप में, और मानचित्र पर एक ऊर्जा संयंत्र (2025 और फ़रवरी 2026 में परमाणु संयंत्र) की अपेक्षा रखें।
सबसे ज़्यादा अंक इन गलतियों से कटते हैं: कोयले या लौह अयस्क के प्रकार मिला देना, किसी खदान या तेल क्षेत्र को गलत राज्य में रखना, परंपरागत और गैर-परंपरागत स्रोतों में भ्रम, और मानचित्र पर मिलते-जुलते नाम (नरोरा और नामरूप, काकरापार और कलपक्कम, दुर्ग और दुर्गापुर)।
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खनिज कैसे मिलते हैं: आग्नेय और कायांतरित चट्टानों में शिराएँ और बृहत् जमाव (टिन, ताँबा, जस्ता, सीसा); अवसादी चट्टानों में परतें (कोयला, कुछ लौह अयस्क) और वाष्पीकरण से (जिप्सम, पोटाश, सोडियम लवण); अवशिष्ट अपक्षय (बॉक्साइट); घाटी की रेत में प्लेसर निक्षेप (सोना, चाँदी, टिन, प्लेटिनम); महासागरीय जल (नमक, मैग्नीशियम, ब्रोमीन; तल पर मैंगनीज़ पिंड)। रैट होल खनन: जोवाई और चेरापूंजी, मेघालय।
| खनिज | याद रखें |
|---|---|
| लौह अयस्क | मैग्नेटाइट में 70% तक लोहा (सबसे उत्तम); हेमेटाइट 50-60% (सबसे अधिक प्रयुक्त)। पेटियाँ: ओडिशा-झारखंड (बादामपहाड़, गुआ, नोआमुंडी); दुर्ग-बस्तर-चंद्रपुर (बैलाडीला, विशाखापत्तनम से निर्यात); बल्लारी-चित्रदुर्ग-चिक्कमगलुरु-तुमकुरु (कुद्रेमुख, 100% निर्यात इकाई थी); महाराष्ट्र-गोवा (मार्मागाओ) |
| मैंगनीज़ | एक टन इस्पात में लगभग 10 किग्रा; ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक, पेंट |
| ताँबा | बालाघाट (म.प्र.), खेतड़ी (राजस्थान), सिंहभूम (झारखंड) |
| बॉक्साइट | अमरकंटक, मैकाल पहाड़ियाँ, बिलासपुर-कटनी; ओडिशा अग्रणी (पंचपतमाली, कोरापुट) |
| अभ्रक | कोडरमा-गया-हज़ारीबाग (झारखंड), अजमेर, नेल्लोर |
| चूना पत्थर | सीमेंट; धमन भट्टी |
कोयला: पीट → लिग्नाइट (नेवेली, बिजली) → बिटुमिनस (धातुशोधन कोयला) → एंथ्रेसाइट। गोंडवाना (20 करोड़ वर्ष से अधिक; दामोदर घाटी: झरिया, रानीगंज, बोकारो) और टर्शियरी (लगभग 5.5 करोड़ वर्ष; पूर्वोत्तर)।
तेल और गैस: टर्शियरी चट्टानों की अपनतियाँ और भ्रंश ट्रैप; मुंबई हाई, गुजरात (अंकलेश्वर), असम सबसे पुराना (डिगबोई, नहरकटिया, मोरन-हुगरीजन)। गैस: कृष्णा-गोदावरी बेसिन, मुंबई हाई, खंभात की खाड़ी, अंडमान-निकोबार।
गैर-परंपरागत: परमाणु (यूरेनियम, थोरियम: झारखंड, अरावली; केरल की मोनाज़ाइट रेत); सौर (फोटोवोल्टाइक); पवन (नागरकोइल से मदुरै; जैसलमेर); बायोगैस (गोबर गैस: ईंधन + खाद); ज्वारीय (खंभात और कच्छ की खाड़ी, सुंदरबन); भूतापीय (मणिकरण के पास पार्वती घाटी, पूगा घाटी)।
मानचित्र: लौह अयस्क मयूरभंज, दुर्ग, बैलाडीला, बेल्लारी, कुद्रेमुख; कोयला रानीगंज, बोकारो, तालचेर, नेवेली; तेल डिगबोई, नहरकटिया, मुंबई हाई, बसीन, कलोल, अंकलेश्वर; ताप विद्युत नामरूप, सिंगरौली, रामागुंडम; परमाणु नरोरा, काकरापार, तारापुर, कलपक्कम।
ध्यान दें
- लिग्नाइट और एंथ्रेसाइट कोयले हैं, लौह अयस्क नहीं।
- जल और ताप विद्युत परंपरागत हैं; परमाणु ऊर्जा गैर-परंपरागत है।
- नेवेली लिग्नाइट (कोयला) है, तेल क्षेत्र नहीं।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: हर प्रश्न पहले कॉपी पर हल कीजिए, फिर उत्तर पढ़िए। हर चरण के सामने लिखे अंक बताते हैं कि परीक्षक क्या देखता है। 1 अंक वाले बहुविकल्पीय और अभिकथन-कारण प्रश्न अंत की क्विज़ में हैं, साथ में ऐसे प्रश्न भी जो जाँचते हैं कि आपने अध्याय कितनी गहराई से समझा है; क्विज़ के हर उत्तर के साथ उसकी व्याख्या दी गई है।
लघु उत्तरीय प्रश्न (2 और 3 अंक)
प्रश्न 1 (3 अंक)
नीचे दिए गए भारत के रेखा-मानचित्र पर निम्नलिखित को उपयुक्त चिह्नों से दर्शाइए और उनके नाम लिखिए।
(a) असम का वह ताप विद्युत संयंत्र जो आपकी मानचित्र सूची में है।
(b) आपकी मानचित्र सूची का, महाराष्ट्र के तट पर मुंबई के उत्तर में स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्र।
(c) आपकी मानचित्र सूची का, तमिलनाडु के तट पर चेन्नई के दक्षिण में स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्र।

उत्तर।
आदर्श उत्तर:
(a) नामरूप, असम के सुदूर पूर्व में, ब्रह्मपुत्र के दक्षिण में।
(b) तारापुर, महाराष्ट्र के तट पर, मुंबई के उत्तर में।
(c) कलपक्कम, तमिलनाडु के तट पर, चेन्नई के दक्षिण में।
उत्तर-मानचित्र में तीनों संयंत्र तारों से a, b और c के रूप में दिखाए गए हैं।
अंक योजना:
- (a) नामरूप, पूर्वी असम में, सही जगह अंकित और नाम लिखा — 1 अंक
- (b) तारापुर, महाराष्ट्र के तट पर मुंबई के उत्तर में, सही जगह अंकित और नाम लिखा — 1 अंक
- (c) कलपक्कम, चेन्नई के दक्षिण में तट पर, सही जगह अंकित और नाम लिखा — 1 अंक

प्रश्न 2 (2 अंक)
निम्नलिखित खनिजों को लौह और अलौह खनिजों में बाँटिए: लौह अयस्क, मैंगनीज़, ताँबा, बॉक्साइट, सीसा। मैंगनीज़ लोहा नहीं है, फिर भी इसे लौह खनिजों में क्यों रखा जाता है?
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- लौह: लौह अयस्क और मैंगनीज़। अलौह: ताँबा, बॉक्साइट और सीसा।
- मैंगनीज़ मुख्यतः लोहे के साथ इस्पात और फ़ेरो-मैंगनीज़ मिश्रधातु बनाने में लगता है, इसलिए लोहे के वर्ग में रखा जाता है।
अंक योजना:
- लौह: लौह अयस्क, मैंगनीज़। अलौह: ताँबा, बॉक्साइट, सीसा। (पाँचों सही: 1 अंक; तीन या चार सही: 0.5।) — 1 अंक
- मैंगनीज़ मुख्यतः लोहे के साथ, इस्पात और फ़ेरो-मैंगनीज़ मिश्रधातु बनाने में काम आता है (एक टन इस्पात में लगभग 10 किग्रा), इसलिए यह लोहे और उसके साथ उपयोग होने वाले खनिजों के लौह वर्ग में आता है। — 1 अंक
प्रश्न 3 (3 अंक)
एल्युमिनियम इतनी उपयोगी धातु क्यों है? बॉक्साइट कैसे बनता है, और भारत में इसके निक्षेप कहाँ मिलते हैं?
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- एल्युमिनियम लोहे जैसा मज़बूत पर बहुत हल्का है, अच्छा चालक है और आसानी से ढाला जा सकता है।
- बॉक्साइट मिट्टी जैसा पदार्थ है, जो एल्युमिनियम सिलिकेट वाली चट्टानों के अपघटन से बनता है।
- इसके निक्षेप अमरकंटक पठार, मैकाल पहाड़ियों और बिलासपुर-कटनी पठार में हैं; ओडिशा सबसे बड़ा उत्पादक है।
अंक योजना:
- एल्युमिनियम में लोहे जैसी धातुओं की मज़बूती के साथ बहुत हल्कापन, अच्छी चालकता और अधिक आघातवर्धनीयता होती है। — 1 अंक
- एल्युमिनियम का अयस्क बॉक्साइट मिट्टी जैसा पदार्थ है, जो एल्युमिनियम सिलिकेट से भरपूर चट्टानों के अपघटन से बनता है। — 1 अंक
- निक्षेप: अमरकंटक पठार, मैकाल पहाड़ियाँ और बिलासपुर-कटनी का पठारी क्षेत्र; ओडिशा सबसे बड़ा उत्पादक है (कोरापुट के पंचपतमाली निक्षेप)। — 1 अंक
प्रश्न 4 (3 अंक)
अभ्रक का वर्णन कीजिए: यह कैसा दिखता है, यह विद्युत उद्योग के लिए क्यों उपयुक्त है, और भारत में यह कहाँ मिलता है।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- अभ्रक पतली प्लेटों से बना है और आसानी से पतली परतों में अलग हो जाता है। यह पारदर्शी, काला, हरा, लाल, पीला या भूरा होता है।
- यह अच्छा विसंवाहक है और उच्च वोल्टेज सहता है, इसलिए बिजली के सामान के लिए उपयुक्त है।
- झारखंड की कोडरमा-गया-हज़ारीबाग पेटी अग्रणी है; अजमेर और नेल्लोर में भी मिलता है।
अंक योजना:
- यह प्लेटों या पत्रों की शृंखला से बना होता है और आसानी से पतली परतों में अलग हो जाता है; यह पारदर्शी, काला, हरा, लाल, पीला या भूरा हो सकता है। — 1 अंक
- इसकी उत्कृष्ट परावैद्युत शक्ति, कम ऊर्जा ह्रास, विसंवाहक गुण और उच्च वोल्टेज सहने की क्षमता इसे विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों का बहुत उपयोगी खनिज बनाते हैं। — 1 अंक
- यह छोटा नागपुर पठार के उत्तरी किनारे पर मिलता है; झारखंड की कोडरमा-गया-हज़ारीबाग पेटी अग्रणी है; राजस्थान में अजमेर के आसपास और आंध्र प्रदेश की नेल्लोर अभ्रक पेटी में भी। — 1 अंक
प्रश्न 5 (2 अंक)
चूना पत्थर किस तरह की चट्टानों में मिलता है? इसके दो औद्योगिक उपयोग बताइए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- चूना पत्थर कैल्शियम कार्बोनेट, या कैल्शियम और मैग्नीशियम कार्बोनेट से बनी अवसादी चट्टानों में मिलता है।
- यह सीमेंट का मुख्य कच्चा माल है और धमन भट्टी में लौह अयस्क प्रगलित करने में लगता है।
अंक योजना:
- यह कैल्शियम कार्बोनेट या कैल्शियम और मैग्नीशियम कार्बोनेट से बनी चट्टानों के साथ, अधिकांश भूगर्भिक संरचनाओं की अवसादी चट्टानों में मिलता है। — 1 अंक
- यह सीमेंट उद्योग का मूल कच्चा माल है (0.5) और धमन भट्टी में लौह अयस्क को प्रगलित करने के लिए आवश्यक है (0.5)। — 1 अंक
प्रश्न 6 (3 अंक)
भारत में कोयला मुख्य रूप से दो भूगर्भिक युगों की चट्टानों में मिलता है। गोंडवाना कोयले और टर्शियरी कोयले में तीन बिंदुओं पर अंतर बताइए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- गोंडवाना कोयला 20 करोड़ वर्ष से कुछ अधिक पुराना है; टर्शियरी केवल लगभग 5.5 करोड़ वर्ष।
- गोंडवाना कोयला अधिकतर धातुशोधन कोयला है और भारत का ज़्यादातर कोयला यहीं से आता है; टर्शियरी छोटा भाग है।
- गोंडवाना कोयला दामोदर घाटी (झरिया, रानीगंज, बोकारो) में है; टर्शियरी कोयला पूर्वोत्तर, जैसे मेघालय और असम, में है।
अंक योजना:
- आयु: गोंडवाना कोयला 20 करोड़ वर्ष से कुछ अधिक पुराना है; टर्शियरी कोयला लगभग 5.5 करोड़ वर्ष पुराना है। — 1 अंक
- गुणवत्ता/उपयोग: गोंडवाना के मुख्य भंडार लोहा प्रगलित करने में काम आने वाला धातुशोधन (मेटलर्जिकल) कोयला हैं; भारत का अधिकांश कोयला गोंडवाना से आता है, जबकि टर्शियरी कोयला उसका छोटा-सा भाग है। — 1 अंक
- कहाँ: गोंडवाना कोयला दामोदर घाटी (झरिया, रानीगंज, बोकारो) और गोदावरी, महानदी, सोन व वर्धा घाटियों में; टर्शियरी कोयला मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में। — 1 अंक
प्रश्न 7 (2 अंक)
जल विद्युत और ताप विद्युत में दो बिंदुओं पर अंतर बताइए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- जल विद्युत में तेज़ बहता पानी टरबाइन घुमाता है; ताप विद्युत में कोयला, पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस जलाई जाती है।
- पानी नवीकरणीय है, पर ताप संयंत्र अनवीकरणीय जीवाश्म ईंधन उपयोग करते हैं।
अंक योजना:
- स्रोत: जल विद्युत तेज़ बहते पानी से टरबाइन घुमाकर बनती है; ताप विद्युत कोयला, पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस जलाकर टरबाइन चलाने से बनती है। — 1 अंक
- नवीकरणीयता: पानी नवीकरणीय संसाधन है, जबकि ताप संयंत्र अनवीकरणीय जीवाश्म ईंधन उपयोग करते हैं। (यह भी स्वीकार्य: हर एक का उदाहरण, जैसे भाखड़ा नांगल या कोपिली; नामरूप, सिंगरौली या रामागुंडम।) — 1 अंक
प्रश्न 8 (3 अंक)
भारत के ग्रामीण और दूर-दराज़ के भागों में अब सौर ऊर्जा संयंत्र लगाए जा रहे हैं। स्पष्ट कीजिए कि ये गाँव के घरों, वनों और खेती की तीन तरह से कैसे मदद करते हैं।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- पैनल गाँव में ही धूप को बिजली में बदलते हैं, इसलिए बिजली की लाइनों से दूर के घरों को भी रोशनी मिलती है।
- परिवार कम लकड़ी जलाते हैं, इसलिए कम पेड़ कटते हैं।
- सौर पंप बिना डीज़ल के खेतों की सिंचाई कर सकते हैं।
अंक योजना:
- घर: फोटोवोल्टाइक पैनल धूप को वहीं सीधे बिजली में बदल देते हैं, इसलिए दूर-दराज़ के गाँवों को वहाँ भी बिजली मिलती है जहाँ ग्रिड की लाइनें नहीं पहुँचीं। — 1 अंक
- वन: रोशनी और खाना पकाने के लिए घरों को कम लकड़ी चाहिए, इसलिए कम पेड़ कटते हैं। — 1 अंक
- खेती: सौर पंप बिना डीज़ल या ग्रिड बिजली के सिंचाई के लिए पानी खींच सकते हैं। (यह भी स्वीकार्य: कम गोबर जलता है, इसलिए खेतों को अधिक खाद मिलती है।) — 1 अंक
प्रश्न 9 (3 अंक)
हर विवरण में बताई गई लौह अयस्क पेटी का नाम लिखिए, और वह पत्तन या रास्ता बताइए जिससे उसका अयस्क देश से बाहर जाता है।
(a) बस्तर ज़िले की एक पहाड़ी श्रृंखला में अति उच्च कोटि के हेमेटाइट के निक्षेप हैं, जो जापान और दक्षिण कोरिया को बेचे जाते हैं।
(b) कर्नाटक के पश्चिमी घाट में ऊँचाई पर स्थित एक खदान अपना सारा उत्पादन विदेश बेचती थी; उसके अयस्क को पानी में मिलाकर पाइप से तट तक भेजा जाता था।
(c) गोवा और रत्नागिरी ज़िले के अयस्क बहुत उच्च कोटि के नहीं हैं, पर उनका अच्छी तरह खनन करके निर्यात होता है।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
(a) दुर्ग-बस्तर-चंद्रपुर पेटी; बैलाडीला का अयस्क विशाखापत्तनम से जाता है।
(b) बल्लारी-चित्रदुर्ग-चिक्कमगलुरु-तुमकुरु पेटी; कुद्रेमुख का अयस्क घोल बनाकर पाइप से मंगलुरु के पास के पत्तन तक जाता था।
(c) महाराष्ट्र-गोवा पेटी; इसका अयस्क मार्मागाओ से भेजा जाता है।
अंक योजना:
- (a) दुर्ग-बस्तर-चंद्रपुर पेटी (बैलाडीला पहाड़ियाँ); विशाखापत्तनम पत्तन से निर्यात। — 1 अंक
- (b) बल्लारी-चित्रदुर्ग-चिक्कमगलुरु-तुमकुरु पेटी (कुद्रेमुख, जो 100 प्रतिशत निर्यात इकाई थी); इसका अयस्क घोल (स्लरी) के रूप में पाइपलाइन से मंगलुरु के पास के पत्तन तक जाता था। — 1 अंक
- (c) महाराष्ट्र-गोवा पेटी; मार्मागाओ पत्तन से निर्यात। — 1 अंक
दीर्घ उत्तरीय और स्रोत आधारित प्रश्न
प्रश्न 10 (5 अंक)
खनिज पृथ्वी की भूपर्पटी में कई अलग-अलग रूपों में मिलते हैं। खनिजों के मिलने के किन्हीं पाँच तरीकों का, हर एक के उदाहरण सहित, वर्णन कीजिए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- शिराएँ और बृहत् जमाव: आग्नेय और कायांतरित चट्टानों की दरारों और भ्रंशों में खनिज भर जाते हैं, जैसे टिन, ताँबा, जस्ता और सीसा।
- परतें: अवसादी चट्टानों में खनिज क्षैतिज परतों में जमते हैं, जैसे कोयला।
- वाष्पीकरण: शुष्क प्रदेशों में पानी उड़ जाने पर जिप्सम और पोटाश व सोडियम के लवण बच जाते हैं।
- अवशिष्ट अपक्षय: सतह की चट्टानें टूटने पर बॉक्साइट जैसा अवशिष्ट ढेर बच जाता है।
- प्लेसर निक्षेप: सोना, चाँदी, टिन और प्लेटिनम घाटी तलों की रेत में जमा होते हैं, क्योंकि पानी इन्हें नहीं घोलता।
अंक योजना:
- आग्नेय और कायांतरित चट्टानों में खनिज दरारों, छिद्रों, भ्रंशों या जोड़ों में भर जाते हैं: छोटे जमाव शिराएँ और बड़े जमाव बृहत् जमाव कहलाते हैं (टिन, ताँबा, जस्ता, सीसा)। — 1 अंक
- अवसादी चट्टानों में खनिज क्षैतिज स्तरों में निक्षेपण, संचयन और जमाव से बनी परतों में मिलते हैं (कोयला, कुछ प्रकार का लौह अयस्क)। — 1 अंक
- कुछ परतें वाष्पीकरण से बनती हैं, खासकर शुष्क प्रदेशों में (जिप्सम, पोटाश लवण, सोडियम लवण)। — 1 अंक
- सतह की चट्टानों के अपघटन और उनके घुलनशील भाग हट जाने से अयस्क वाला अवशिष्ट ढेर बचता है (बॉक्साइट)। — 1 अंक
- घाटी तलों की रेत और पहाड़ियों के आधार पर प्लेसर निक्षेपों में वे खनिज मिलते हैं जिन्हें पानी नहीं घोलता (सोना, चाँदी, टिन, प्लेटिनम); या महासागरीय जल और तल (साधारण नमक, मैग्नीशियम, ब्रोमीन; मैंगनीज़ पिंड)। (कोई पाँच।) — 1 अंक
अथवा
एक कंपनी नदी के पास वनों से ढके एक पहाड़ी ज़िले में लौह अयस्क की खदान खोलना चाहती है। खदान से उसके मज़दूरों और आसपास के क्षेत्र को होने वाले खतरों का वर्णन कीजिए, और इन्हें कम करने के उपाय सुझाइए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- धूल और धुआँ: मज़दूर इन्हें साँस में लेते हैं और उन्हें फेफड़ों के रोग हो सकते हैं।
- दुर्घटनाएँ: खदान की छत गिर सकती है, और उसमें पानी भर सकता है या आग लग सकती है।
- पानी: पास की नदी और कुएँ दूषित हो सकते हैं।
- भूमि: फेंका गया कचरा और स्लरी भूमि व मृदा बिगाड़ते हैं और नाले दूषित करते हैं, और वन भी कटते हैं।
- बचाव: सुरक्षा नियम और पर्यावरण कानून सख्ती से माने जाएँ, कचरा नदी से दूर रखा जाए और खनन वाली भूमि फिर ठीक की जाए।
अंक योजना:
- मज़दूर धूल और हानिकारक धुएँ में साँस लेते हैं, जिससे उन्हें फेफड़ों के रोग होने का खतरा रहता है। — 1 अंक
- खदान की छत गिरने, पानी भर जाने और आग लगने का खतरा रहता है। — 1 अंक
- नदी और क्षेत्र के दूसरे जल स्रोत दूषित हो सकते हैं। — 1 अंक
- कचरा और घोल (स्लरी) फेंकने से भूमि और मृदा खराब होती है और नालों व नदी का प्रदूषण बढ़ता है; खदान के लिए वन काटने से पहाड़ियों को नुकसान होता है। — 1 अंक
- उपाय: सख्त सुरक्षा नियम और पर्यावरण कानून लागू किए जाएँ; कचरा नदी से दूर रखा जाए, और खनन के बाद ज़मीन को फिर ठीक किया जाए। (कोई भी दूसरा उचित उपाय।) — 1 अंक
प्रश्न 11 (5 अंक)
स्पष्ट कीजिए कि भारत को ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोतों का अधिक उपयोग क्यों करना चाहिए। फिर बताइए कि ज्वारीय ऊर्जा और भूतापीय ऊर्जा कैसे पैदा की जाती है, और हर एक के लिए भारत का एक उपयुक्त स्थान बताइए।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- क्यों: बढ़ती ऊर्जा खपत से भारत कोयले, तेल और गैस पर अधिक निर्भर होता जा रहा है। इनके दाम बढ़ रहे हैं और आपूर्ति कम पड़ सकती है।
- अधिक जीवाश्म ईंधन जलाने से पर्यावरण भी बिगड़ता है, इसलिए नवीकरणीय स्रोत चाहिए।
- ज्वारीय ऊर्जा: बाढ़ द्वार वाला बाँध ज्वार के समय समुद्री पानी रोक लेता है; ज्वार उतरने पर पानी टरबाइन से होकर वापस जाता है।
- भूतापीय ऊर्जा: पृथ्वी भीतर से गर्म है; चट्टानों से गर्म हुआ भूजल भाप बनकर ऊपर आता है और टरबाइन घुमाता है।
- स्थान: ज्वारीय, कच्छ की खाड़ी; भूतापीय, लद्दाख की पूगा घाटी।
अंक योजना:
- ऊर्जा की बढ़ती खपत ने भारत को कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर अधिकाधिक निर्भर बना दिया है; तेल और गैस के बढ़ते दाम और संभावित कमी से अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा की आपूर्ति अनिश्चित हो जाती है। — 1 अंक
- अधिक जीवाश्म ईंधन जलाने से गंभीर पर्यावरणीय समस्याएँ पैदा होती हैं, इसलिए सौर, पवन, ज्वारीय, भूतापीय और बायोगैस जैसे नवीकरणीय स्रोत चाहिए। — 1 अंक
- ज्वारीय: खाड़ियों के आर-पार बाढ़ द्वार वाले बाँध बनाए जाते हैं; ज्वार के समय पानी भीतर आता है और द्वार बंद होने पर रुक जाता है; ज्वार उतरने पर यह पानी एक पाइप से होकर, जो टरबाइन चलाता है, वापस समुद्र में जाता है। — 1 अंक
- भूतापीय: गहराई के साथ पृथ्वी अधिक गर्म होती जाती है; जहाँ यह बढ़त तेज़ है, वहाँ भूजल चट्टानों से ऊष्मा लेकर भाप बनकर ऊपर आता है, जिससे टरबाइन चलते हैं। — 1 अंक
- स्थान: ज्वारीय - खंभात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी या गंगा डेल्टा का सुंदरबन क्षेत्र; भूतापीय - मणिकरण के पास पार्वती घाटी (हिमाचल प्रदेश) या पूगा घाटी (लद्दाख)। — 1 अंक
अथवा
भारत में एक नई तेल शोधनशाला की योजना बन रही है। पेट्रोलियम और उसकी शोधनशालाएँ देश की अर्थव्यवस्था की किन तीन तरह से मदद करती हैं, स्पष्ट कीजिए, और बताइए कि भारत का पेट्रोलियम कहाँ मिलता है।
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- ईंधन: कोयले के बाद यह ऊर्जा का मुख्य स्रोत है, जो गर्मी, रोशनी और परिवहन के लिए ईंधन देता है।
- मशीनें और उद्योग: इससे मशीनों के लिए स्नेहक और कारखानों के लिए कच्चा माल मिलता है।
- नोडल उद्योग: कृत्रिम वस्त्र, उर्वरक और रसायन उद्योग शोधनशालाओं के आसपास पनपते हैं।
- कहाँ: यह टर्शियरी चट्टानों के मोड़ों और भ्रंशों में फँसा रहता है; समुद्र में मुंबई हाई सबसे अधिक देता है।
- गुजरात (अंकलेश्वर, कलोल) और सबसे पुराना उत्पादक असम (डिगबोई, नहरकटिया) बाकी देते हैं।
अंक योजना:
- कोयले के बाद यह ऊर्जा का अगला बड़ा स्रोत है और परिवहन सहित गर्मी और रोशनी के लिए ईंधन देता है। — 1 अंक
- इससे मशीनों के लिए स्नेहक और कई विनिर्माण उद्योगों के लिए कच्चा माल मिलता है। — 1 अंक
- शोधनशालाएँ नोडल उद्योग का काम करती हैं: कृत्रिम वस्त्र, उर्वरक और कई रसायन उद्योग इनके आसपास पनपते हैं। — 1 अंक
- अधिकांश पेट्रोलियम टर्शियरी युग की चट्टानों की अपनतियों और भ्रंश ट्रैपों में मिलता है; सबसे बड़ा हिस्सा समुद्र में मुंबई हाई (बसीन के साथ) से आता है। — 1 अंक
- गुजरात (सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र अंकलेश्वर, और कलोल) और सबसे पुराना तेल उत्पादक राज्य असम (डिगबोई, नहरकटिया, मोरन-हुगरीजन)। — 1 अंक
प्रश्न 12 (4 अंक)
नीचे दिए गए स्रोत को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
पहाड़ियों में पतली सुरंगें
मेघालय में जोवाई और चेरापूंजी के आसपास की पहाड़ी ढलानों पर आज भी छोटे-छोटे अँधेरे मुँह दिखते हैं, जो मुश्किल से एक आदमी के कंधों जितने चौड़े हैं। हर मुँह के पीछे एक सुरंग कोयले की पतली परत के साथ-साथ पहाड़ी में गहरे तक जाती है। खनिक रेंगकर भीतर जाते, कोयला खुरचकर निकालते और टोकरियों में खींचकर बाहर लाते थे। ये छेद चूहों के बिलों जैसे दिखते हैं, इसलिए इस तरीके को 'रैट होल' (चूहे का बिल) खनन कहा जाने लगा।
इसमें लगभग न मशीनें लगती थीं, न पैसा, इसलिए एक परिवार अकेले एक सुरंग चला सकता था। परिवार ऐसा इसलिए कर पाते थे क्योंकि पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों में खनिज सरकार के नहीं, व्यक्तियों या समुदायों के होते हैं। इसकी कीमत दूसरी तरह चुकानी पड़ी। सुरंगें बिना चेतावनी धँस जाती थीं या उनमें पानी भर जाता था, और पुरानी खदानों से रिसता पानी नीचे के नालों को खराब कर देता था। राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने 2014 में इस तरीके पर रोक लगा दी।
(a) पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों में खनिजों का स्वामी कौन है? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
वहाँ खनिज व्यक्तियों या समुदायों के होते हैं।
अंक योजना:
- व्यक्ति या समुदाय। — 1 अंक
(b) इस तरीके को 'रैट होल' खनन क्यों कहते हैं? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
कोयला चूहे के बिल जैसी लंबी, पतली सुरंग से निकाला जाता है, जिसमें खनिक रेंगकर जाता है।
अंक योजना:
- कोयला चूहे के बिल जैसी लंबी, पतली सुरंग से निकाला जाता है, जिसमें आदमी को रेंगकर जाना पड़ता है। — 1 अंक
(c) इस तरीके से खनिकों को होने वाला एक खतरा और पर्यावरण को होने वाला एक खतरा स्पष्ट कीजिए। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- सुरंगें अचानक धँस सकती हैं या उनमें पानी भर सकता है, जिससे खनिक भीतर फँस जाते हैं।
- खदानों से बहकर निकलता पानी पास के नालों को दूषित करता है।
अंक योजना:
- खनिक: पतली सुरंगें बिना चेतावनी के धँस सकती हैं या उनमें पानी भर सकता है, जिससे भीतर के लोग फँस जाते हैं। — 1 अंक
- पर्यावरण: खदानों से निकलता पानी नालों को दूषित करता है, और खोदी गई पहाड़ियाँ और कचरा भूमि को खराब करते हैं। — 1 अंक
प्रश्न 13 (4 अंक)
नीचे दिए गए स्रोत को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
गोशाला के पीछे का संयंत्र
हरियाणा के एक गाँव में सुनीता का परिवार चार गायें पालता है। कुछ साल पहले तक उनका गोबर उपलों के रूप में थापा जाता, दीवार पर सुखाया जाता और रसोई में जलाया जाता था, और घर हमेशा धुएँ से भरा रहता था। अब गोबर, खेतों के कचरे के साथ, गोशाला के पीछे बनी एक छोटी बंद टंकी में जाता है। भीतर यह धीरे-धीरे सड़ता है और एक गैस छोड़ता है, जो पाइप से चूल्हे तक आती है। यह गैस साफ़ लौ से जलती है और मिट्टी के तेल, उपलों या लकड़ी के कोयले से अधिक ऊष्मा देती है।
गैस बनने के बाद जो बचता है, वह उत्तम खाद है, जो सीधे खेतों में जाती है। ऐसे 'गोबर गैस' संयंत्र एक परिवार, सहकारी समिति या नगरपालिका चला सकती है। (यहाँ बताया गया परिवार काल्पनिक है।)
(a) स्रोत में बताए गए बायोगैस संयंत्र में क्या डाला जाता है? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
पशुओं का गोबर और खेतों का कचरा।
अंक योजना:
- पशुओं का गोबर और खेतों का कचरा (झाड़ियाँ, पशु और मानव अपशिष्ट भी स्वीकार्य)। — 1 अंक
(b) रसोई के ईंधन के रूप में बायोगैस उपलों से बेहतर क्यों है? (1 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
यह उपलों से अधिक ऊष्मा देती है और बिना घर में धुआँ भरे साफ़ जलती है।
अंक योजना:
- यह उपलों, मिट्टी के तेल या लकड़ी के कोयले से अधिक ऊष्मा देती है (अधिक तापीय दक्षता) और बिना धुएँ के साफ़ लौ से जलती है। — 1 अंक
(c) कहा जाता है कि बायोगैस संयंत्र किसान को 'दोहरा लाभ' देता है। दोनों लाभ स्पष्ट कीजिए। (2 अंक)
उत्तर।
आदर्श उत्तर:
- परिवार को अच्छी तरह जलने वाला स्वच्छ ईंधन मिलता है।
- बची हुई स्लरी अच्छी खाद है, इसलिए जो गोबर पहले जलता था, वह अब खेतों को उपजाऊ बनाता है।
अंक योजना:
- ऊर्जा: इससे खाना पकाने (और रोशनी) के लिए स्वच्छ, कुशल ईंधन मिलता है। — 1 अंक
- खाद: गोबर उपलों के रूप में नहीं जलता, और गैस बनने के बाद बची स्लरी बेहतर खाद है, इसलिए खेतों को अधिक और अच्छी खाद मिलती है। — 1 अंक