अध्याय एक नज़र में
जीव कैसे जनन करते हैं? — मुख्य बातें एक स्थान पर।
- जनन किसी व्यक्ति को जीवित रखने हेतु आवश्यक नहीं, पर स्पीशीज़ की निरंतरता एवं स्थिरता देता है।
- आधारभूत घटना = डी.एन.ए. की प्रतिलिपि (+ अतिरिक्त कोशिकीय तंत्र)। प्रतिलिपि पूर्ण नहीं → विविधता → विकास का आधार।
- दो प्रकार: अलैंगिक (एक जनक, कम विविधता) एवं लैंगिक (दो जनक, अधिक विविधता)।
अलैंगिक जनन — त्वरित पुनरावृत्ति
| विधि | उदाहरण | मुख्य बात |
|---|---|---|
| द्विखंडन | अमीबा, जीवाणु | दो में विभाजन |
| बहुखंडन | प्लैज़्मोडियम | एक साथ अनेक |
| मुकुलन | हाइड्रा, यीस्ट | मुकुल निकलकर अलग |
| खंडन | स्पाइरोगाइरा | टुकड़ों में टूटना |
| पुनर्जनन | हाइड्रा, प्लेनेरिया | टुकड़ा → पूर्ण जीव (जनन नहीं) |
| बीजाणुजनन | राइज़ोपस | बीजाणुधानी में बीजाणु |
| कायिक प्रवर्धन | आलू, ब्रायोफिलम | जड़/तना/पत्ती से नया पौधा |
ऊतक संवर्धन: ऊतक → कैलस → अनेक रोगमुक्त पौधे।
पादपों में लैंगिक जनन — त्वरित पुनरावृत्ति
- पुष्प चक्र: बाह्यदल (रक्षा) → दल (आकर्षण) → पुंकेसर (नर: परागकोश + तंतु) → स्त्रीकेसर (मादा: वर्तिकाग्र + वर्तिका + अंडाशय)।
- एकलिंगी (पपीता) बनाम द्विलिंगी (गुड़हल)।
- परागण = परागकोश → वर्तिकाग्र (स्व/पर)। निषेचन = नर युग्मक + अंड → युग्मनज (परागनलिका वर्तिका से होकर जाती है)।
- निषेचन के बाद: बीजांड → बीज; अंडाशय → फल।
परागण बनाम निषेचन
| परागण | निषेचन |
|---|---|
| परागकण का वर्तिकाग्र तक जाना | युग्मकों का संलयन → युग्मनज |
| संलयन नहीं | संलयन होता है |
| पहले होता है | बाद में होता है |
मानव जनन तंत्र — त्वरित पुनरावृत्ति
नर तंत्र
- वृषण (वृषण कोष में, कम ताप हेतु शरीर के बाहर) → शुक्राणु + टेस्टोस्टेरोन।
- शुक्रवाहिका → शुक्राणु ले जाती है; शुक्राशय + प्रोस्टेट → तरल (परिवहन + पोषण = वीर्य)।
- मूत्रमार्ग → मूत्र + शुक्राणु का सामान्य मार्ग; शिश्न → शुक्राणु पहुँचाता है।
- शुक्राणु = शीर्ष (डी.एन.ए.) + पूँछ (गतिशील)।
मादा तंत्र
- अंडाशय → अंड (जन्म पर हज़ारों; एक/माह) + हार्मोन।
- अंडवाहिका → निषेचन का स्थल; गर्भाशय → विकास का स्थल; ग्रीवा → द्वार; योनि → शुक्राणु ग्रहण, जन्म-मार्ग।
- अंड = बड़ा, अगतिशील, भोजन-संचयी।
यौवनारंभ
- लड़कियाँ: स्तन-वृद्धि, स्तनाग्र गहरा, ऋतुस्राव आरंभ।
- लड़के: चेहरे पर बाल, आवाज़ भारी (टेस्टोस्टेरोन द्वारा)।
निषेचन, गर्भावस्था एवं ऋतुस्राव — त्वरित पुनरावृत्ति
शृंखला: शुक्राणु + अंड → युग्मनज (अंडवाहिका) → भ्रूण (गर्भाशय में स्थापित) → गर्भ (अंग बनते हैं) → जन्म (~9 माह; गर्भाशय-पेशी संकुचन)।
अपरा: गर्भाशय-भित्ति में तश्तरी; अंकुर (भ्रूण-ओर) + रक्त-जगहें (माता-ओर) → बड़ा सतही क्षेत्रफल → ग्लूकोज़+ऑक्सीजन भ्रूण को, अपशिष्ट माता को।
ऋतुस्राव: गर्भाशय-भित्ति हर माह मोटी; अंड निषेचित न होने पर टूटकर रक्त+श्लेष्मा (~2–8 दिन)।
जननात्मक स्वास्थ्य, गर्भनिरोधन एवं यौन रोग — त्वरित पुनरावृत्ति
गर्भनिरोधक विधियाँ
| प्रकार | उदाहरण | कैसे कार्य करती | यौन-रोग रक्षा? |
|---|---|---|---|
| अवरोधक | कंडोम | शुक्राणु रोके | हाँ |
| हार्मोनल | मुख गोलियाँ | अंड-मोचन रोके | नहीं |
| IUCD | लूप, कॉपर-टी | गर्भाशय में रखी | नहीं |
| शल्य | पुरुष/स्त्री नसबंदी | शुक्रवाहिका/फैलोपियन अवरुद्ध | नहीं |
यौन रोग (कारण के आधार पर)
- जीवाणुजनित: गोनोरिया, सिफलिस।
- विषाणुजनित: मस्सा, एच.आई.वी.-एड्स।
- रोकथाम: कंडोम (अवरोधक विधि)।
सामाजिक बिंदु
- लिंग अनुपात बनाए रखें; कन्या भ्रूण हत्या से बाल लिंग अनुपात घटता; जन्मपूर्व लिंग निर्धारण अवैध; जनसंख्या = जन्म-दर व मृत्यु-दर।
मुख्य एक-पंक्तियाँ (परीक्षा-प्रातः पुनरावृत्ति)
अंत में, प्रश्नपत्र से ठीक पहले पढ़ें।
- जनन की आधारभूत घटना = डी.एन.ए. की प्रतिलिपि।
- विविधता → स्पीशीज़ की उत्तरजीविता + विकास का आधार।
- द्विखंडन = दो; बहुखंडन = अनेक।
- मुकुलन = हाइड्रा, यीस्ट; खंडन = स्पाइरोगाइरा; बीजाणु = राइज़ोपस।
- कायिक प्रवर्धन → संतति आनुवंशिक रूप से समान।
- पुंकेसर = परागकोश + तंतु; स्त्रीकेसर = वर्तिकाग्र + वर्तिका + अंडाशय।
- परागण = परागकण वर्तिकाग्र तक; निषेचन = युग्मक-संलयन → युग्मनज।
- बीजांड → बीज; अंडाशय → फल।
- वृषण शरीर के बाहर → कम ताप (शुक्राणु-निर्माण हेतु)।
- मूत्रमार्ग = मूत्र + शुक्राणु का सामान्य मार्ग (केवल नर)।
- निषेचन = अंडवाहिका; विकास = गर्भाशय।
- भ्रूण का पोषण अपरा (अंकुर + रक्त-जगहें) से।
- निषेचन नहीं → ऋतुस्राव (भित्ति टूटना, 2–8 दिन)।
- केवल अवरोधक विधियाँ यौन रोगों से बचाती हैं।
- जन्मपूर्व लिंग निर्धारण कानूनन प्रतिबंधित है।