यौवनारंभ — शरीर जनन के लिए तैयार होता है
बचपन से हमारा शरीर लगातार बढ़ता है (वृद्धि)। परंतु किशोरावस्था में एक भिन्न प्रकार के परिवर्तन आरंभ होते हैं जिन्हें केवल शरीर का बढ़ना नहीं कहा जा सकता — शरीर की बनावट बदलती है। इस अवस्था को यौवनारंभ (Puberty) कहते हैं।
लड़के-लड़कियों में समान परिवर्तन
- बगल एवं जननांग क्षेत्र में मोटे बाल (त्वचा गहरी हो सकती है)।
- हाथ, पैर एवं चेहरे पर पतले बाल।
- त्वचा प्रायः तैलीय हो जाती है, मुँहासे निकल सकते हैं।
लड़कों में विशिष्ट परिवर्तन
- चेहरे पर मोटे बाल आना।
- आवाज़ का भारी होना (फटना)।
- शिश्न का कभी-कभी बड़ा एवं उत्तेजित होना।
ये सब लैंगिक परिपक्वता के संकेत हैं। लड़कों में इन परिवर्तनों के पीछे टेस्टोस्टेरोन हार्मोन है, जो वृषण में बनता है।
नर जनन तंत्र — एक झलक

आरेख के अंग्रेज़ी लेबलों के हिन्दी अर्थ:
| English (in image) | हिन्दी |
|---|---|
| TESTIS | वृषण |
| SCROTUM | वृषण कोष |
| VAS DEFERENS | शुक्रवाहिका |
| SEMINAL VESICLE | शुक्राशय |
| PROSTATE GLAND | प्रोस्टेट ग्रंथि |
| URINARY BLADDER | मूत्राशय |
| URETHRA | मूत्रमार्ग |
| PENIS | शिश्न |
नर जनन तंत्र के दो कार्य हैं:
- नर युग्मक (शुक्राणु) बनाना — यह कार्य वृषण करता है।
- शुक्राणुओं को निषेचन-स्थल तक पहुँचाना — यह कार्य शुक्रवाहिका, मूत्रमार्ग, ग्रंथियाँ एवं शिश्न करते हैं।
मुख्य बिंदु: नर युग्मक = शुक्राणु — एक छोटी, गतिशील (motile) कोशिका।
वृषण एवं वृषण कोष
शुक्राणुओं का निर्माण वृषण (testes) में होता है।
एक महत्वपूर्ण बात — वृषण उदर गुहा के बाहर, वृषण कोष (scrotum) नामक थैली में स्थित होते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि शुक्राणु-निर्माण के लिए सामान्य शरीर के ताप से कम ताप चाहिए (लगभग 2–3 °C कम)। वृषण कोष एक प्राकृतिक शीतल-कक्ष की तरह कार्य करता है।
वृषण दो कार्य एक साथ करते हैं:
- शुक्राणु बनाना।
- टेस्टोस्टेरोन हार्मोन स्रावित करना — यह शुक्राणु-निर्माण को नियंत्रित करता है और यौवनारंभ में लड़कों के परिवर्तन लाता है।
[बोर्ड ट्रैप] प्रश्न — "वृषण उदर गुहा के बाहर क्यों होते हैं?" → क्योंकि शुक्राणु-निर्माण के लिए शरीर के ताप से कम ताप आवश्यक है।
शुक्राणु का मार्ग — वाहिकाएँ एवं ग्रंथियाँ
वृषण में बने शुक्राणु शुक्रवाहिका (vas deferens) से बाहर जाते हैं। शुक्रवाहिका मूत्राशय से आने वाली नली से जुड़ जाती है, जिससे मूत्रमार्ग (urethra) शुक्राणु एवं मूत्र — दोनों का सामान्य मार्ग बन जाता है।
रास्ते में दो ग्रंथियाँ अपना स्राव मिलाती हैं:
- शुक्राशय (seminal vesicles)
- प्रोस्टेट ग्रंथि (prostate gland)
ये स्राव शुक्राणुओं को एक तरल में डाल देते हैं जो उनके परिवहन को आसान बनाता है और पोषण देता है। शुक्राणु + यह तरल मिलकर वीर्य (semen) कहलाते हैं। अंततः वीर्य शिश्न (penis) से बाहर निकलता है।
याद रखने का मार्ग
वृषण → शुक्रवाहिका → मूत्रमार्ग (शुक्राशय व प्रोस्टेट के स्राव सहित) → शिश्न
शुक्राणु की संरचना

आरेख के अंग्रेज़ी लेबलों के हिन्दी अर्थ:
| English (in image) | हिन्दी |
|---|---|
| HEAD | शीर्ष |
| MIDDLE PIECE | मध्य भाग |
| TAIL | पूँछ |
| DNA (genetic material) | डी.एन.ए. (आनुवंशिक पदार्थ) |
शुक्राणु शरीर की सबसे छोटी कोशिकाओं में से एक है, जो यात्रा एवं डी.एन.ए. पहुँचाने के लिए बनी है। इसमें होते हैं —
- शीर्ष (head): मुख्यतः आनुवंशिक पदार्थ (डी.एन.ए.)।
- लंबी पूँछ (tail): शुक्राणु को तैरकर अंड की ओर बढ़ने में सहायक।
[NEET महत्वपूर्ण] दोनों युग्मकों की तुलना — शुक्राणु छोटा एवं गतिशील (पूँछ सहित); अंड बड़ा, अगतिशील एवं भोजन-संचयी।
स्मृति कैप्सूल — खंड 4
त्वरित पुनरावृत्ति: नर जनन तंत्र।
1. वृषण (वृषण कोष में) → शुक्राणु + टेस्टोस्टेरोन। 2. वृषण कोष → वृषण को शरीर के बाहर रखता है → कम ताप (शुक्राणु-निर्माण हेतु)। 3. शुक्रवाहिका → शुक्राणु ले जाती है। 4. मूत्रमार्ग → शुक्राणु एवं मूत्र का सामान्य मार्ग। 5. शुक्राशय + प्रोस्टेट → तरल (परिवहन + पोषण = वीर्य)। 6. शिश्न → शुक्राणु पहुँचाता है। • शुक्राणु = शीर्ष (डी.एन.ए.) + पूँछ (गति)। छोटा एवं गतिशील।
हल किए गए उदाहरण
उदाहरण 1: NCERT — वृषण के कार्य
मानव में वृषण के क्या कार्य हैं?
हल: वृषण दो मुख्य कार्य करते हैं —
- शुक्राणुओं का निर्माण।
- टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्राव, जो शुक्राणु-निर्माण को नियंत्रित करता है और यौवनारंभ में लड़कों के द्वितीयक लैंगिक लक्षण लाता है।
उदाहरण 2: वृषण कोष शरीर के बाहर क्यों?
वृषण उदर गुहा के बाहर वृषण कोष में क्यों स्थित होते हैं?
हल: क्योंकि शुक्राणु-निर्माण के लिए सामान्य शरीर के ताप से कम ताप (लगभग 2–3 °C कम) आवश्यक होता है। वृषण कोष, शरीर के बाहर होने के कारण, यह ठंडा वातावरण प्रदान करता है।
उदाहरण 3: NCERT — शुक्राशय एवं प्रोस्टेट का कार्य
शुक्राशय एवं प्रोस्टेट ग्रंथि का क्या कार्य है?
हल: ये ग्रंथियाँ शुक्रवाहिका से गुजरते शुक्राणुओं में अपना स्राव मिलाती हैं। यह स्राव —
- शुक्राणुओं के परिवहन को आसान बनाता है।
- शुक्राणुओं को पोषण देता है।
शुक्राणु + यह तरल = वीर्य।
उदाहरण 4: सामान्य मार्ग की समस्या
मानव नर में शुक्राणु एवं मूत्र का सामान्य मार्ग कौन-सी संरचना है? यह कैसे बनता है?
हल: सामान्य मार्ग मूत्रमार्ग (urethra) है।
शुक्रवाहिका (शुक्राणु ले जाती है) मूत्राशय से आने वाली नली से जुड़ जाती है। इस संगम के बाद एकल नली — मूत्रमार्ग — मूत्र एवं शुक्राणु दोनों को शिश्न से बाहर ले जाती है (परंतु एक साथ नहीं)।
उदाहरण 5: मार्ग एवं शुक्राणु संरचना
(अ) शुक्राणु का बनने से बाहर निकलने तक का मार्ग बताइए। (ब) शुक्राणु की संरचना का वर्णन कीजिए।
हल: (अ) मार्ग: वृषण → शुक्रवाहिका → मूत्रमार्ग (यहाँ शुक्राशय एवं प्रोस्टेट के स्राव मिलते हैं) → शिश्न → शरीर के बाहर।
(ब) संरचना: शुक्राणु में एक शीर्ष होता है जिसमें मुख्यतः आनुवंशिक पदार्थ (डी.एन.ए.) होता है, तथा एक लंबी पूँछ होती है जो उसे अंड की ओर तैरने में सहायता करती है। यह छोटी, गतिशील कोशिका है।