लेखिका परिचय: मन्नू भंडारी

मन्नू भंडारी का जन्म मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव में 1931 ई. में हुआ। इनकी इंटर तक की शिक्षा अजमेर शहर में हुई। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1952 ई. में हिन्दी में एम.ए. करने के बाद ये दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में अध्यापन कार्य करती रहीं। अवकाश प्राप्ति के बाद वे दिल्ली में ही रहकर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं। इनका विवाह प्रख्यात हिन्दी साहित्यकार श्री राजेंद्र यादव से हुआ। इनकी रचनाओं में स्त्री-मन से जुड़ी अनुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति देखी जा सकती है।

इन्हें साहित्यिक उपलब्धियों के लिए अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं — भारतीय भाषा परिषद् (कोलकाता), राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के पुरस्कारों के अतिरिक्त हिन्दी अकादमी का 'शिखर सम्मान' भी इनमें शामिल है।

प्रमुख कृतियाँ

  • कहानी संग्रह: मैं हार गई, एक प्लेट सैलाब, यही सच है, त्रिशंकु, मेरी प्रिय कहानियाँ, तीन निगाहों की एक तस्वीर आदि।
  • उपन्यास: आपका बंटी, महाभोज, एक इंच मुस्कान, स्वामी आदि।

पाठ का परिचय एवं उद्देश्य

'एक कहानी यह भी' मन्नू भंडारी की आत्मकथा का एक अंश है, जिसमें उन्होंने उन व्यक्तियों और घटनाओं के बारे में लिखा है जिन्होंने उनके व्यक्तित्व और साहित्यिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला — घर का वातावरण, माता-पिता का स्वभाव, भाई-बहनों व सहेलियों के साथ खेल-कूद, हिन्दी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का प्रभाव, तथा 1946-47 के स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका।

व्यक्तित्व-निर्माण में परिवार के सदस्यों एवं गुरुजनों की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करने के उद्देश्य से इस आत्मकथा-अंश का चयन पाठ्यक्रम में किया गया है।

विशेष जानकारी: लेखिका के प्रसिद्ध उपन्यास 'महाभोज' का प्रमुख पात्र 'दा साहब' उनके अपने पिता के व्यक्तित्व से प्रेरित बताया गया है — यह आत्मकथा और रचनात्मक साहित्य के बीच के गहरे संबंध को दर्शाता है।

आत्मकथा का सार — भाग 1: माता-पिता और बचपन

मन्नू भंडारी का जन्म भानपुरा में हुआ, पर उनकी यादें अजमेर के ब्रह्मपुरी मोहल्ले के दो-मंज़िला मकान से जुड़ी हैं। ऊपरी मंज़िल पर पिता का 'साम्राज्य' था — किताबों-पत्रिकाओं के बीच पढ़ते या डिक्टेशन देते हुए। इंदौर में पिता की बड़ी प्रतिष्ठा थी — कांग्रेस और समाज-सुधार से जुड़े, उदार और संवेदनशील व्यक्ति। परंतु एक बड़े आर्थिक झटके के कारण वे अजमेर आ गए, जहाँ उन्होंने अकेले दम पर एक विषयवार अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश का काम पूरा किया — इससे यश तो मिला, पर धन नहीं। गिरती आर्थिक स्थिति ने उनके व्यक्तित्व को क्रोधी, शक्की और अहंवादी बना दिया।

लेखिका बताती हैं कि वे स्वयं सांवली और बचपन में दुबली-मरियल थीं, जबकि पिता को गोरा रंग पसंद था। इस कारण उनकी दो साल बड़ी, गोरी और स्वस्थ बहन सुशीला से निरंतर तुलना ने उनके भीतर गहरी हीन-भावना पैदा कर दी, जिससे वे जीवन-भर पूरी तरह उबर नहीं पाईं। इसके विपरीत, उनकी माँ बेपढ़ी-लिखी परंतु असाधारण रूप से धैर्यवान और सहनशील थीं — उन्होंने जीवन-भर अपने लिए कुछ माँगा नहीं, केवल त्याग किया। फिर भी लेखिका स्वीकार करती हैं कि माँ का यह मजबूरी-भरा त्याग कभी उनका आदर्श नहीं बन सका।

आत्मकथा का सार — भाग 2: शीला अग्रवाल का प्रभाव और स्वतंत्रता आंदोलन

पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी मन्नू ने बहन सुशीला के साथ आँगन में सतोलिया, लंगड़ी-टांग जैसे खेल खेले और भाइयों के साथ गिल्ली-डंडा व पतंगबाज़ी भी की। उस दौर की 'पड़ोस-संस्कृति' में पूरा मोहल्ला परिवार जैसा था — आज के फ्लैट-जीवन ने यह आत्मीयता छीन ली है, ऐसा लेखिका मानती हैं।

1944 में बहन सुशीला का विवाह होने और भाइयों के बाहर पढ़ाई हेतु जाने पर पहली बार लेखिका को अपने अस्तित्व का एहसास हुआ और पिता का ध्यान उन पर केंद्रित हुआ। पिता चाहते थे कि वे रसोई (जिसे वे 'भटियारखाना' कहते) से दूर रहें, बल्कि घर में होने वाली राजनैतिक बहसों में शामिल हों। दसवीं कक्षा तक वे बिना गहरी समझ के ये बहसें सुनती और किताबें पढ़ती थीं, परंतु फर्स्ट ईयर में हिन्दी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से परिचय ने उनका जीवन बदल दिया — शरत्-प्रेमचंद से लेकर जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल तक साहित्य की गहरी समझ विकसित हुई।

शीला अग्रवाल ने ही उन्हें 1946-47 के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया — प्रभात-फेरियाँ, हड़तालें, जुलूस, भाषण। इससे पिता के साथ उनका टकराव शुरू हुआ, जो राजेंद्र यादव से विवाह तक चलता रहा। पिता के विरोधाभासी व्यक्तित्व के दो प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं — कॉलेज की अनुशासनात्मक कार्रवाई के डर के बावजूद प्रिंसिपल से मिलकर पिता गर्व से लौटे, और एक दकियानूसी मित्र की आलोचना के बाद क्रोधित पिता, उसी शाम डॉ. अंबालाल की प्रशंसा सुनकर गर्वित हो उठे — यह उनकी 'यश-लिप्सा' को दर्शाता है। मई 1947 में शीला अग्रवाल को नोटिस मिला और लेखिका सहित कुछ छात्राओं का प्रवेश निषिद्ध हुआ, पर अगस्त में आंदोलन के दबाव से क्लास पुनः खुली — फिर भी यह खुशी उस सबसे बड़ी खुशी के सामने फीकी पड़ गई: 15 अगस्त 1947 — शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि, भारत की स्वतंत्रता।