कठिन शब्दार्थ

शब्द अर्थ
निहायत बहुत अधिक
ओहदा पद
दरियादिली उदारता
भग्नावशेष खंडहर
विस्फारित खुला हुआ, फैला हुआ
हाशिया किनारा
शक्की संदेह करने वाला
खामियाँ कमियाँ
आक्रांत कष्टों से ग्रस्त
मरियल दुर्बल
पर्त परत
तुक्का बेकार उपाय, अंदाज़ा
माँजा धागा (पतंग उड़ाने का)
बरपना मुसीबत आना
पाबंदी प्रतिबंध
शिद्दत अधिकता
विच्छिन्न अलग होना
सुघड़ सुंदर, कुशल
शगल शौक, आदत
अहमियत महत्व
बवंडर तूफान
दकियानूसी पुराने ख्याल वाला

विशेष टिप्पणी: 'महाभोज' मन्नू भंडारी का चर्चित उपन्यास है, जिसका पात्र 'दा साहब' उनके पिता के व्यक्तित्व से प्रेरित माना जाता है।

मुहावरे

मुहावरा अर्थ
लू उतारना अहं उतारना, खरी-खोटी सुनाना
आग उगलना गुस्सा करना
थू-थू करना बेइज़्ज़ती करना
आग-बबूला होना बहुत क्रोधित होना

व्याख्या

गद्यांश 1

"एक ओर वे बेहद कोमल और संवेदनशील व्यक्ति थे तो दूसरी ओर बेहद क्रोधी और अहंवादी।"

प्रसंग: यह पंक्ति लेखिका मन्नू भंडारी ने अपने पिता के अंतर्विरोधी (विरोधाभासी) व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए कही है।

व्याख्या: लेखिका अपने पिता के जटिल व्यक्तित्व को स्पष्ट करती हैं — एक तरफ वे दयालु, कोमल-हृदय और दूसरों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील थे, तो दूसरी तरफ आर्थिक तंगी और टूटती प्रतिष्ठा के कारण वे अत्यंत क्रोधी और अहंकारी भी बन गए थे। यह द्वंद्व उनके संपूर्ण चरित्र-चित्रण की कुंजी है और लेखिका के अपने व्यक्तित्व-निर्माण को समझने का आधार भी।

गद्यांश 2

"पिता के ठीक विपरीत थीं हमारी बेपढ़ी-लिखी माँ।"

प्रसंग: यह पंक्ति उस भाग में आती है जहाँ लेखिका अपनी माँ का परिचय देती हुई उनकी तुलना पिता से करती हैं।

व्याख्या: लेखिका दिखाती हैं कि माँ, पिता के क्रोधी और अहंवादी स्वभाव के ठीक विपरीत, धैर्य और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति थीं। शिक्षा न होने के बावजूद उनमें असाधारण सहनशक्ति थी — वे पिता की हर ज्यादती और बच्चों की हर माँग को सहज भाव से स्वीकार करती थीं। यह तुलना पारिवारिक जीवन में स्त्री के त्याग और सहनशीलता की परंपरागत छवि को भी उजागर करती है, जिसे लेखिका स्वयं अपना आदर्श नहीं मानतीं।

गद्यांश 3

"यह लड़की मुझे कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रखेगी… पता नहीं क्या-क्या सुनना पड़ेगा वहाँ जाकर!"

प्रसंग: यह पिता का कथन है, जब कॉलेज से प्रिंसिपल का पत्र आया कि लेखिका की गतिविधियों के कारण उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है।

व्याख्या: यह पंक्ति पिता के प्रारंभिक भय और क्रोध को दर्शाती है — उन्हें डर था कि बेटी की स्वतंत्रता आंदोलन संबंधी गतिविधियों से समाज में उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचेगी। परंतु आगे की घटना में विडंबना यह है कि प्रिंसिपल से मिलकर लौटते समय पिता का भय गर्व में बदल जाता है, क्योंकि प्रिंसिपल स्वयं बेटी की देशभक्ति की सराहना करती हैं — यह पिता के अंतर्विरोधी व्यक्तित्व (सामाजिक छवि की चिंता बनाम यश-लिप्सा) को उजागर करता है।

गद्यांश 4

"वे बोलते जा रहे थे और पिताजी के चेहरे का संतोष धीरे-धीरे गर्व में बदलता जा रहा था।"

प्रसंग: यह उस प्रसंग में आता है जब डॉ. अंबालाल घर आकर लेखिका के भाषण की प्रशंसा करते हैं, जबकि उसी दिन एक दकियानूसी मित्र की आलोचना पर पिता क्रोधित हो चुके थे।

व्याख्या: यह पंक्ति पिता के व्यक्तित्व के मूल अंतर्विरोध को सबसे स्पष्ट रूप से प्रकट करती है — 'विशिष्ट' बनने और बनाने की उनकी प्रबल लालसा (यश-लिप्सा) उनकी सामाजिक छवि की चिंता पर हावी हो जाती है। एक ही दिन में क्रोध से गर्व तक का यह परिवर्तन दिखाता है कि पिता वास्तव में प्रशंसा और सम्मान के कितने भूखे थे, भले ही वह किसी भी स्रोत से क्यों न मिले।