कवि परिचय: रहीम
रहीम का पूरा नाम अब्दुरहीम खानखाना है। इनके पिता बैरमखाँ खानखाना थे। अब्दुरहीम खानखाना मुगल सम्राट अकबर के मंत्री और सेनापति थे। बचपन से ही इनकी रुचि साहित्य की ओर थी। इन्होंने अनेक भाषाओं में दक्षता प्राप्त की थी और बड़ी सफलता के साथ तुर्की, फारसी, अरबी, संस्कृत तथा हिन्दी का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया। अवधी, ब्रज और खड़ी बोली पर इनका असाधारण अधिकार था। इनके काव्य में भाषा-वैविध्य, छंद-वैविध्य और विषय-वैविध्य पाया जाता है।
प्रमुख रचनाएँ: 'रहीम दोहावली', 'बरवै नायिका भेद', 'मदनाष्टक', 'श्रृंगार-सोरठ' आदि।
पाठ का परिचय एवं उद्देश्य
प्रस्तुत दोहों में कवि रहीम ने मनुष्य-जन्म की सार्थकता, कर्मयोग, मनुष्य की प्रतिष्ठा, अहंकार, वाणी की मधुरता तथा सांसारिक वस्तुओं की नश्वरता आदि के संबंध में अपने विचार प्रकट किए हैं। ये दोहे नीतिपरक होते हुए भी अत्यंत सरल और जनसामान्य के लिए सहज ग्राह्य हैं।
सारांश भाग 1: मानव-जन्म की सार्थकता और आत्म-सम्मान (दोहे 1-2)
पहले दोहे में रहीम कहते हैं कि जिस मनुष्य में विद्या, बुद्धि, धर्म, यश और दान — इनमें से कुछ भी नहीं है, उसका पृथ्वी पर जन्म व्यर्थ है, ठीक वैसे ही जैसे बिना पूँछ और सींग वाला पशु। यह दोहा मानव-जीवन की सार्थकता के लिए गुणों के महत्व को रेखांकित करता है।
दूसरे दोहे में रहीम आत्म-सम्मान ('पानी') की रक्षा की बात करते हैं — बिना पानी (चमक/प्रतिष्ठा/जल) के सब कुछ शून्य है। पानी चले जाने पर मोती, मनुष्य और आटा (चून) — तीनों ही अपना मूल्य खो बैठते हैं। यह प्रसिद्ध दोहा 'पानी' शब्द के त्रि-अर्थी प्रयोग (चमक, आत्म-सम्मान, जल) के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।
सारांश भाग 2: चिंता, कर्मयोग एवं अहंकार (दोहे 3-6)
तीसरे दोहे में रहीम चिता (शव जलाने की अग्नि) और चिंता की तुलना करते हुए कहते हैं कि चिता तो केवल निर्जीव शरीर को जलाती है, परन्तु चिंता जीवित व्यक्ति को उसके प्राणों सहित जला देती है — यह चिंता की विनाशकारी शक्ति को उजागर करता है।
चौथे दोहे में रहीम कर्मयोग का सिद्धांत बताते हैं — मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन स्वयं करना चाहिए, परन्तु उसका फल भाग्य/ईश्वर के हाथ में है, जैसे पाँसे (dice) हमारे हाथ में हैं, परन्तु दाँव (परिणाम) हमारे हाथ में नहीं।
पाँचवें दोहे में रहीम प्रेम/भक्ति की गली को संकरी बताते हैं, जहाँ दो नहीं समा सकते — यदि अहंकार (आपु) है तो भगवान (हरि) नहीं हो सकते, और यदि हरि हैं तो अहंकार नहीं रह सकता। यह अहंकार-त्याग की शिक्षा देने वाला अत्यंत गहन दोहा है।
छठे दोहे में रहीम जीभ को 'बावरी' (पागल) कहते हैं, जो स्वर्ग-पाताल तक की बातें कह डालती है, परन्तु स्वयं मुँह के भीतर सुरक्षित रहती है, जबकि उसकी बातों का परिणाम सिर (कपाल) को भुगतना पड़ता है — यह वाणी को संयमित रखने की शिक्षा देता है।
सारांश भाग 3: लघुता का महत्व और एकाग्रता (दोहे 7-8)
सातवें दोहे में रहीम छोटे जलाशय के कीचड़-युक्त जल की प्रशंसा करते हैं, जिसे छोटे जीव पीकर तृप्त हो जाते हैं — जबकि विशाल सागर की क्या बड़ाई, जिसके खारे जल से संसार प्यासा ही रह जाता है। यह दोहा विनम्रता और उपयोगिता के महत्व को दर्शाता है — बड़प्पन का मूल्य तभी है जब वह दूसरों के काम आए।
आठवें दोहे में रहीम एकाग्रता का संदेश देते हैं — यदि एक (मूल) वस्तु को सिद्ध कर लिया जाए तो सब कुछ सिद्ध हो जाता है, परन्तु सब कुछ एक साथ साधने के प्रयास में सब कुछ नष्ट हो जाता है। रहीम कहते हैं कि यदि जड़ को सींचा जाए, तो वृक्ष फूलों और फलों से भरपूर हो जाता है — यह एकाग्रता और मूल पर ध्यान केंद्रित करने के महत्व की शिक्षा देता है।