लघु-उत्तरीय प्रश्न (आदर्श उत्तर)
प्रश्न 1: रहीम जी ने मनुष्य की प्रतिष्ठा के संबंध में क्या कहा है?
उत्तर: रहीम जी ने दोहा 2 में मनुष्य की प्रतिष्ठा को 'पानी' (चमक/आत्म-सम्मान) के रूप में वर्णित किया है। उनके अनुसार आत्म-सम्मान की रक्षा सर्वोपरि है, क्योंकि इसके बिना जीवन शून्य के समान है। जैसे मोती अपनी चमक खोकर मूल्यहीन हो जाता है, वैसे ही मनुष्य अपनी प्रतिष्ठा खोकर सम्मानरहित हो जाता है — प्रतिष्ठा एक बार चली जाए तो पुनः प्राप्त करना अत्यंत कठिन है।
प्रश्न 2: रहीम जी ने चिता और चिंता के अंतर को कैसे समझाया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: रहीम जी ने दोहा 3 में एक शब्द-क्रीड़ा के माध्यम से चिता और चिंता के अंतर को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार चिता केवल निर्जीव (मृत) शरीर को जलाती है, जिसका दर्द मृतक को महसूस नहीं होता। परन्तु चिंता जीवित मनुष्य को उसके प्राणों सहित लगातार जलाती रहती है — यह शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार से व्यक्ति को क्षीण कर देती है। इस प्रकार रहीम बताते हैं कि चिंता चिता से भी अधिक विनाशकारी है।
प्रश्न 3: कर्मयोग के स्वरूप के बारे में रहीम के क्या विचार हैं?
उत्तर: रहीम दोहा 4 में कर्मयोग का सिद्धांत बताते हैं — मनुष्य को अपने कर्तव्य/कर्म का पालन स्वयं करना चाहिए, क्योंकि यही उसके अपने हाथ में है। परन्तु उस कर्म का फल क्या होगा, यह भाग्य या ईश्वर के हाथ में है। वे इसे पाँसे के खेल से समझाते हैं — पाँसा फेंकना खिलाड़ी के हाथ में है, परन्तु दाँव का परिणाम उसके नियंत्रण में नहीं। यह सिद्धांत गीता के निष्काम कर्मयोग से मिलता-जुलता है।
प्रश्न 4: अहंकार के संबंध में रहीम के विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर: दोहा 5 में रहीम अहंकार-त्याग की शिक्षा देते हैं। उनके अनुसार भक्ति/प्रेम का मार्ग इतना संकरा है कि उसमें अहंकार (आपु) और भगवान (हरि) दोनों एक साथ नहीं रह सकते। जिस हृदय में अहंकार है, वहाँ ईश्वर का वास संभव नहीं, और जहाँ ईश्वर का वास है, वहाँ अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है — अतः सच्ची भक्ति के लिए अहंकार का त्याग अनिवार्य है।
प्रश्न 5: वाणी को क्यों संयत रखना चाहिए?
उत्तर: रहीम दोहा 6 में कहते हैं कि जीभ 'बावरी' (पागल) होती है, जो बिना सोचे-समझे स्वर्ग-पाताल तक की बड़ी-बड़ी बातें कह डालती है। परन्तु समस्या यह है कि जीभ स्वयं तो मुँह के भीतर सुरक्षित रहती है, जबकि उसकी अविवेकपूर्ण बातों के दुष्परिणाम मनुष्य के सिर (कपाल) को भुगतने पड़ते हैं — अर्थात् वाणी से उत्पन्न विवाद, शत्रुता या अपमान का सामना पूरे व्यक्तित्व को करना पड़ता है। इसीलिए वाणी को सदैव संयमित और विचारपूर्वक बोलना चाहिए।
प्रश्न 6: भगवान की अनन्य भक्ति के बारे में रहीम क्या कहते हैं?
उत्तर: रहीम के अनुसार भगवान की अनन्य भक्ति के लिए हृदय में अहंकार का पूर्ण त्याग आवश्यक है। दोहा 5 में उनका स्पष्ट संदेश है कि प्रेम/भक्ति की गली संकरी है, जहाँ केवल एक ही (या तो अहंकार या भगवान) रह सकता है। जब तक व्यक्ति अपने 'मैं' को त्याग नहीं देता, तब तक वह भगवान के साथ पूर्ण एकत्व स्थापित नहीं कर सकता — यही सच्ची, अनन्य भक्ति का सार है।