मूल दोहे

  1. रहिमन विद्या बुद्धि नहिं, नहीं धरम, जस, दान। भू पर जनम वृथा धरै, पसु बिनु पूँछ बिषान।।
  2. रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।
  3. रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत। चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत।।
  4. निज कर क्रिया रहीम कहि, सुधि भावी के हाथ। पाँसे अपने हाथ में, दाँव न अपने हाथ।।
  5. रहिमन गली है साँकरी, दूजो ना ठहराहिं। आपु अहै तो हरि नहीं, हरि तो आपुन नाहिं।।
  6. रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल। आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।।
  7. धनि रहीम जल पंक को, लघु जिय पिअत अघाय। उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय।।
  8. एके साधे सब सधै, सब साधे सब जाय। रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय।।

कठिन शब्दार्थ

  1. जस = यश; भू = पृथ्वी; बिषान = सींग।
  2. पानी = चमक, प्रतिष्ठा, जल; सून = शून्य।
  3. चितान = चिता; दहति = जलाती है; निर्जीव = मृतक।
  4. निज = अपने; क्रिया = कर्म; सुधि = फल; भावी = भाग्य, ईश्वर।
  5. गली = प्रेम मार्ग; साँकरी = संकीर्ण; आपु = अहंकार; अहै = है।
  6. जिह्वा = जीभ; सरग = स्वर्ग; कपाल = खोपड़ी, मस्तक।
  7. पंक = कीचड़; लघु जिय = छोटे जीव; उदधि = सागर; अघाय = पूर्ण तृप्त होकर; पिआसो = प्यासा।
  8. साधे = साधना करने पर; सधे = सिद्ध होना; मूलहिं = जड़ को।

भावार्थ भाग 1: दोहे 1-2

दोहा 1: "रहिमन विद्या बुद्धि नहिं, नहीं धरम, जस, दान। भू पर जनम वृथा धरै, पसु बिनु पूँछ बिषान।" — रहीम कहते हैं कि जिस मनुष्य में न विद्या है, न बुद्धि, न धर्म, न यश और न दान करने का गुण, उसका पृथ्वी पर जन्म लेना व्यर्थ है — वह उस पशु के समान है जिसकी न पूँछ है और न सींग (अर्थात् जो पूर्णतः निरुपयोगी है)।

दोहा 2: "रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।" — रहीम कहते हैं कि अपना 'पानी' (चमक/आत्म-सम्मान) सदैव बनाए रखना चाहिए, क्योंकि इसके बिना सब कुछ शून्य (व्यर्थ) है। एक बार पानी चले जाने पर मोती (जिसकी चमक चली जाती है), मनुष्य (जिसकी प्रतिष्ठा चली जाती है) और आटा (जो बिना पानी के गूँधा नहीं जा सकता) — तीनों ही अपनी उपयोगिता खो बैठते हैं।

भावार्थ भाग 2: दोहे 3-5

दोहा 3: "रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत। चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत।" — रहीम कहते हैं कि चिता से भी अधिक भयंकर चिंता है — क्योंकि चिता तो मृत (निर्जीव) शरीर को ही जलाती है, परन्तु चिंता जीवित मनुष्य को उसके प्राणों सहित जला देती है।

दोहा 4: "निज कर क्रिया रहीम कहि, सुधि भावी के हाथ। पाँसे अपने हाथ में, दाँव न अपने हाथ।" — रहीम कहते हैं कि अपने कर्म करना हमारे अपने हाथ में है, परन्तु उसका फल भाग्य/ईश्वर के हाथ में है — जैसे पाँसे फेंकना हमारे हाथ में है, परन्तु उसका परिणाम (दाँव) हमारे वश में नहीं होता।

दोहा 5: "रहिमन गली है साँकरी, दूजो ना ठहराहिं। आपु अहै तो हरि नहीं, हरि तो आपुन नाहिं।" — रहीम कहते हैं कि भक्ति/प्रेम का मार्ग इतना संकरा है कि उसमें दो नहीं समा सकते — यदि हृदय में अहंकार (आपु) है, तो भगवान (हरि) का वास नहीं हो सकता, और यदि हरि का वास है, तो अहंकार शेष नहीं रहता।

भावार्थ भाग 3: दोहे 6-8

दोहा 6: "रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल। आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।" — रहीम कहते हैं कि जीभ बड़ी 'बावरी' (पागल) है, जो बिना सोचे-समझे स्वर्ग-पाताल तक की बातें कह डालती है। परन्तु जीभ स्वयं तो मुँह के भीतर सुरक्षित रहती है, जबकि उसकी अविवेकपूर्ण बातों का दंड सिर (कपाल) को भुगतना पड़ता है — अर्थात् वाणी को संयमित रखना चाहिए।

दोहा 7: "धनि रहीम जल पंक को, लघु जिय पिअत अघाय। उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय।" — रहीम छोटे जलाशय के कीचड़-युक्त जल की प्रशंसा करते हैं, जिसे पीकर छोटे जीव तृप्त हो जाते हैं। इसके विपरीत, विशाल सागर की क्या बड़ाई है, जिसके खारे जल से संसार प्यासा ही रह जाता है — छोटी वस्तु की उपयोगिता बड़प्पन से अधिक महत्वपूर्ण है।

दोहा 8: "एके साधे सब सधै, सब साधे सब जाय। रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय।" — रहीम कहते हैं कि यदि एक मूल वस्तु (लक्ष्य) को सिद्ध कर लिया जाए, तो सब कुछ सिद्ध हो जाता है, परन्तु सब कुछ एक साथ पाने का प्रयत्न करने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है। जैसे वृक्ष की जड़ को सींचने से वह फूलों और फलों से भरपूर हो जाता है, वैसे ही एकाग्रता से मूल पर ध्यान केंद्रित करना सफलता की कुंजी है।

अलंकार एवं काव्य-सौंदर्य

रहीम के दोहों में दृष्टांत अलंकार प्रमुख है — पशु-सींग, चिता-चिंता, पाँसे-दाँव, जड़-फल जैसे दृष्टांतों से नीति-तत्व को स्पष्ट किया गया है। दोहा 2 में 'पानी' शब्द का श्लेष अलंकार (एक ही शब्द के अनेक अर्थ) अत्यंत प्रसिद्ध है — चमक, आत्म-सम्मान और जल तीनों अर्थ एक साथ ध्वनित होते हैं। रहीम की भाषा ब्रज एवं अवधी मिश्रित है, और उनकी शैली सूत्र-वाक्य जैसी संक्षिप्त परन्तु गहन है — यही 'गागर में सागर' की काव्य-परंपरा का उदाहरण है। इन दोहों में शांत रस तथा नीति काव्य की प्रधानता है।