विद्युत जनित्र
विद्युत जनित्र यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। यह मोटर का उल्टा है व विद्युत चुंबकीय प्रेरण पर कार्य करता है: जब कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है, तो उससे गुजरता बदलता चुंबकीय क्षेत्र धारा प्रेरित करता है।

आरेख के अंग्रेज़ी लेबलों के हिन्दी अर्थ:
| English (in image) | हिन्दी |
|---|---|
| Coil ABCD | कुंडली ABCD |
| North pole (N) | उत्तरी ध्रुव (N) |
| South pole (S) | दक्षिणी ध्रुव (S) |
| Slip rings | सर्पी वलय |
| Brushes | ब्रश |
| Galvanometer | धारामापी |
| Rotation | घूर्णन |
मुख्य भाग:
- आयताकार कुंडली ABCD जो चुंबक के ध्रुवों के बीच क्षेत्र में घुमाई जाती है।
- कुंडली के सिरों से जुड़े दो वलय।
- वलयों पर दबते दो ब्रश, जो कुंडली को बाहरी परिपथ (धारामापी सहित) से जोड़ते हैं।
AC तथा DC जनित्र
जैसे कुंडली घूमती है, हर भुजा एक ओर ऊपर व दूसरी ओर नीचे जाती है, क्षेत्र रेखाओं को काटती है व धारा प्रेरित करती है (दिशा फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम से)।
- AC जनित्र: कुंडली के सिरे दो पूर्ण सर्पी वलयों से जुड़े होते हैं। हर आधे घूर्णन के बाद बाहरी परिपथ में धारा दिशा उलट देती है - इससे प्रत्यावर्ती धारा (AC) मिलती है। भारत में मेन्स AC प्रति सेकंड 50 बार उलटती है (50 Hz)।
- DC जनित्र: यदि इसके बजाय विभाजित वलय दिक्परिवर्तक (मोटर की भाँति) प्रयुक्त हो, तो ब्रश सदा नियत दिशा में गतिमान भुजा को छूते हैं, अतः निर्गत धारा एक दिशा में रहती है - दिष्ट धारा (DC)।
मुख्य बिंदु: सर्पी वलय → AC जनित्र; विभाजित वलय दिक्परिवर्तक → DC जनित्र।
AC बनाम DC; मुख्य तुलना
- प्रत्यावर्ती धारा (AC) समय-समय पर अपनी दिशा उलटती है; दिष्ट धारा (DC) केवल एक दिशा में बहती है।
- AC का एक बड़ा लाभ यह है कि इसे बिना अधिक ऊर्जा हानि के लंबी दूरी तक संचरित किया जा सकता है (ट्रांसफार्मर द्वारा), इसीलिए घरों में AC आपूर्ति होती है।
| मोटर | जनित्र | |
|---|---|---|
| परिवर्तित करता | विद्युत → यांत्रिक | यांत्रिक → विद्युत |
| नियम | फ्लेमिंग बायाँ हाथ | फ्लेमिंग दायाँ हाथ |
| वलय | विभाजित वलय दिक्परिवर्तक | सर्पी वलय (AC)/विभाजित वलय (DC) |
[परीक्षा युक्ति] जनित्र = यांत्रिक → विद्युत, दायाँ हाथ नियम। सर्पी वलय = AC, विभाजित वलय दिक्परिवर्तक = DC। घरेलू आपूर्ति AC, 220 V, 50 Hz है।
हल किए गए उदाहरण
उदाहरण 1: जनित्र में ऊर्जा रूपांतरण
विद्युत जनित्र में कौन-सा ऊर्जा रूपांतरण होता है?
हल: विद्युत जनित्र विद्युत चुंबकीय प्रेरण द्वारा यांत्रिक ऊर्जा (कुंडली का घूर्णन) को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है।
उदाहरण 2: AC बनाम DC जनित्र
कौन-सा एक परिवर्तन AC जनित्र को DC जनित्र में बदल देता है?
हल: दो सर्पी वलयों को विभाजित वलय दिक्परिवर्तक से बदलना AC जनित्र को DC जनित्र में बदल देता है। दिक्परिवर्तक ब्रशों को सदा नियत दिशा में गतिमान कुंडली भुजा से संपर्क कराता है, अतः निर्गत धारा एक दिशा में रहती है।
उदाहरण 3: AC व DC का अर्थ
प्रत्यावर्ती धारा व दिष्ट धारा में क्या अंतर है?
हल: प्रत्यावर्ती धारा (AC) समय-समय पर अपनी दिशा उलटती है (भारत में प्रति सेकंड 50 बार, 50 Hz)। दिष्ट धारा (DC) केवल एक दिशा में बहती है। AC को बिना अधिक ऊर्जा हानि के लंबी दूरी तक संचरित किया जा सकता है, अतः इसका उपयोग मेन्स आपूर्ति में होता है।
उदाहरण 4: जनित्र में प्रेरित धारा का नियम
चुंबकीय क्षेत्र में घूमती कुंडली में उत्पन्न धारा की दिशा कौन-सा नियम देता है?
हल: फ्लेमिंग के दाएँ हाथ का नियम प्रेरित (उत्पन्न) धारा की दिशा देता है - तर्जनी = क्षेत्र, अंगूठा = चालक की गति, मध्यमा = प्रेरित धारा।