आंदोलन का प्रसार और दमन

जैसे-जैसे सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) आंदोलन फैला, हज़ारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा, विदेशी कपड़े का बहिष्कार किया, शराब की दुकानों पर धरना दिया, किसानों ने लगान और चौकीदारी कर देने से इनकार कर दिया, और वनवासी लोगों ने वन कानूनों का उल्लंघन किया

चिंतित होकर सरकार ने कांग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। अप्रैल 1930 में जब अब्दुल गफ़्फ़ार खान (Abdul Ghaffar Khan) को गिरफ्तार किया गया, तो पेशावर (Peshawar) में भीड़ ने बख्तरबंद गाड़ियों और गोलीबारी का सामना करते हुए प्रदर्शन किया। जब स्वयं महात्मा गांधी को गिरफ्तार किया गया, तो शोलापुर (Sholapur) के औद्योगिक मज़दूरों ने ब्रिटिश शासन के प्रतीक सभी ढाँचों पर हमला किया। लगभग 1,00,000 लोग गिरफ्तार किए गए। इसके बाद गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया और 5 मार्च 1931 को गांधी–इरविन समझौते (Gandhi–Irwin Pact) पर हस्ताक्षर किए, जिसमें उन्होंने दिसंबर 1931 में लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेज सम्मेलन (Second Round Table Conference) में शामिल होने पर सहमति दी (और सरकार राजनीतिक बंदियों को रिहा करने पर सहमत हुई)। बातचीत विफल हो गई, और भारत लौटकर गांधी ने सविनय अवज्ञा फिर से शुरू की, परंतु 1934 तक इसकी गति मंद पड़ गई

किसान, व्यापारी और मज़दूर

विभिन्न सामाजिक समूह अलग-अलग कारणों से आंदोलन में शामिल हुए:

  • धनी किसानगुजरात के पाटीदार (Patidars) और उत्तर प्रदेश के जाट (Jats) — कीमतों में गिरावट से प्रभावित हुए और लगान नहीं चुका पा रहे थे। उनके लिए स्वराज का अर्थ था ऊँचे लगान के विरुद्ध संघर्ष; जब 1931 में लगान घटाए बिना ही आंदोलन वापस ले लिया गया, तो वे निराश हुए।
  • गरीब किसान — छोटे काश्तकार — चाहते थे कि उनके ज़मींदारों को दिए जाने वाले बकाया किराए माफ़ हों; वे समाजवादियों और साम्यवादियों के नेतृत्व वाले उग्र आंदोलनों में शामिल हुए, परंतु कांग्रेस 'नो रेंट' (लगान न देने) अभियानों का समर्थन करने को तैयार नहीं थी
  • व्यापारी वर्गपुरुषोत्तमदास ठाकुरदास (Purshottamdas Thakurdas) और जी.डी. बिड़ला (G.D. Birla) जैसे नेताओं के अधीन फिक्की (FICCI) (1927) में संगठित — आयात के विरुद्ध संरक्षण चाहते थे। पहले उन्होंने आंदोलन का समर्थन किया, परंतु गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद वे आशंकित हो गए।
  • औद्योगिक मज़दूर अधिकतर दूर ही रहे (नागपुर को छोड़कर), हालाँकि कुछ ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार जैसे विचारों को अपनाया।

महिलाओं की भागीदारी

सविनय अवज्ञा आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी। नमक यात्रा के दौरान हज़ारों महिलाएँ गांधी को सुनने के लिए अपने घरों से बाहर निकलीं। उन्होंने विरोध जुलूसों में भाग लिया, नमक बनाया, और विदेशी कपड़े व शराब की दुकानों पर धरना दिया, और कई जेल गईं। शहरी क्षेत्रों में ये महिलाएँ ऊँची जाति के परिवारों से थीं; ग्रामीण क्षेत्रों में धनी किसान परिवारों से। गांधी की पुकार से प्रेरित होकर वे राष्ट्र की सेवा को एक पवित्र कर्तव्य मानने लगीं।

फिर भी सार्वजनिक भूमिका बढ़ने से महिलाओं की स्थिति को देखने के नज़रिए में आवश्यक रूप से कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया। गांधी मानते थे कि घर-गृहस्थी संभालना महिलाओं का कर्तव्य है, और लंबे समय तक कांग्रेस महिलाओं को कोई अधिकार-पद देने में हिचकिचाती रही, केवल उनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति को महत्व देती रही।

प्रश्न और उत्तर

Q1. सविनय अवज्ञा आंदोलन को झेलने पड़े दमन का वर्णन करें। उत्तर. सरकार ने कांग्रेस के नेताओं को एक-एक करके गिरफ्तार कियाअब्दुल गफ़्फ़ार खान की गिरफ्तारी ने पेशावर की सड़कों पर भीड़ ला दी, और गांधी की गिरफ्तारी के कारण शोलापुर के मज़दूरों ने ब्रिटिश शासन के प्रतीकों पर हमला किया। शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों, महिलाओं और बच्चों को पीटा गया, और लगभग 1,00,000 लोग गिरफ्तार किए गए

Q2. धनी किसान सविनय अवज्ञा आंदोलन में क्यों शामिल हुए, और वे निराश क्यों हुए? उत्तर. पाटीदार और जाट जैसे धनी किसान, कीमतों में गिरावट से प्रभावित होकर, लगान नहीं चुका पा रहे थे, इसलिए उनके लिए स्वराज का अर्थ था ऊँचे लगान के विरुद्ध संघर्ष। जब 1931 में लगान की दरें बदले बिना ही आंदोलन वापस ले लिया गया, तो वे निराश हो गए।

प्रश्न और उत्तर (जारी)

Q3. व्यापारी वर्ग का सविनय अवज्ञा आंदोलन से क्या संबंध था? उत्तर. पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला जैसे नेताओं के अधीन फिक्की (FICCI) (1927) जैसे संगठनों में संगठित होकर, व्यापारी आयात के विरुद्ध संरक्षण चाहते थे। पहले उन्होंने धन देकर आंदोलन का समर्थन किया, परंतु गोलमेज सम्मेलन की विफलता और उग्र व समाजवादी विचारों के प्रसार के बाद वे आशंकित हो गए।

Q4. सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का वर्णन करें। उत्तर. महिलाओं ने बड़े पैमाने पर भाग लिया — जुलूसों में शामिल होकर, नमक बनाकर, दुकानों पर धरना देकर और जेल जाकर। शहरों में वे ऊँची जाति के परिवारों से थीं और गाँवों में धनी किसान परिवारों से। हालाँकि, कांग्रेस अधिकतर उनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति को ही महत्व देती थी और उन्हें अधिकार-पद देने में धीमी रही।

प्रश्न और उत्तर (जारी)

Q5. गांधी–इरविन समझौता क्या था? उत्तर. 5 मार्च 1931 को हस्ताक्षरित गांधी–इरविन समझौते ने सविनय अवज्ञा के पहले चरण को समाप्त किया: गांधी लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने पर सहमत हुए, और सरकार राजनीतिक बंदियों को रिहा करने पर सहमत हुई।