अध्याय एक नज़र में
आनुवंशिकता — मुख्य बातें एक स्थान पर।
- जनन के दौरान उत्पन्न विविधता वंशागत हो सकती है; यह उत्तरजीविता बढ़ा सकती है। लैंगिक जनन अलैंगिक से अधिक विविधता देता है।
- आनुवंशिकता = जनक से संतति में लक्षणों की विश्वसनीय वंशागति। प्रत्येक लक्षण के दो जीन — एक-एक जनक से।
- यदि दो प्रतियाँ भिन्न हों, तो अभिव्यक्त होने वाला प्रभावी, छिपा अप्रभावी।
- लक्षण स्वतंत्र रूप से वंशागत हो सकते हैं, जिससे नए संयोजन बनते हैं।
- मनुष्यों में लिंग लिंग-गुणसूत्रों से तय: पिता का X (लड़की) या Y (लड़का)।
मेंडल के संकरण एवं अनुपात
| संकरण | जनक | F1 | F2 अनुपात |
|---|---|---|---|
| एकसंकर | TT × tt | सभी Tt (लंबे) | 3 : 1 (जीनप्ररूप 1:2:1) |
| द्विसंकर | RRYY × rryy | सभी RrYy | 9 : 3 : 3 : 1 |
| परीक्षण संकरण | Tt × tt | — | 1 : 1 |
- प्रभावी (T): एक प्रति में दिखता। अप्रभावी (t): केवल tt में।
- जीनप्ररूप = अक्षर (Tt); लक्षणप्ररूप = रूप (लंबा)।
- द्विसंकर F2 के नए संयोजन ⇒ स्वतंत्र वंशागति।
जीन, प्रोटीन एवं गुणसूत्र
- जीन = डी.एन.ए. का भाग जो एक प्रोटीन की सूचना रखता है।
- जीन प्रोटीन को नियंत्रित करके लक्षण नियंत्रित करते हैं: जीन → एंजाइम → हार्मोन की मात्रा → लक्षण (जैसे ऊँचाई)।
- कायिक कोशिकाओं में प्रत्येक जीन की दो प्रतियाँ जोड़ीदार गुणसूत्रों पर (एक-एक जनक से)।
- जनन कोशिकाओं में एक समुच्चय; निषेचन जोड़ी पुनः स्थापित करता है → स्पीशीज़ का डी.एन.ए. स्थिर।
- भिन्न गुणसूत्रों के जीन स्वतंत्र रूप से पृथक होते हैं → स्वतंत्र वंशागति।
लिंग निर्धारण एवं रक्त समूह
लिंग निर्धारण (मनुष्य)
- 23 जोड़ी = 22 अलिंगसूत्र जोड़ी + 1 लिंग-गुणसूत्र जोड़ी।
- मादा XX, नर XY। माता → सभी X; पिता → आधे X, आधे Y।
- X-शुक्राणु → लड़की; Y-शुक्राणु → लड़का। पिता लिंग तय करता है; अनुपात ~1:1।
- अन्य स्पीशीज़: तापमान (कुछ सरीसृप), लिंग-परिवर्तन (घोंघे)।
ABO रक्त समूह
| समूह | जीनप्ररूप |
|---|---|
| A | I^A I^A / I^A i |
| B | I^B I^B / I^B i |
| AB | I^A I^B (सहप्रभावी) |
| O | i i (अप्रभावी) |
मुख्य एक-पंक्तियाँ (परीक्षा-प्रातः पुनरावृत्ति)
- लैंगिक जनन → अधिक विविधता; पर्यावरण विभिन्नताओं का चयन → विकास का आधार।
- आनुवंशिकता = लक्षणों का संचरण; प्रत्येक लक्षण के दो जीन।
- स्वतंत्र/संलग्न कर्णपाली = वंशागत लक्षण उदाहरण।
- मेंडल ने मटर का उपयोग किया; पहले संतति की गणना की।
- एकसंकर F2 = 3:1; जीनप्ररूप 1:2:1।
- द्विसंकर F2 = 9:3:3:1; नए संयोजन → स्वतंत्र वंशागति।
- प्रभावी एक प्रति में; अप्रभावी को दोनों चाहिए।
- जीनप्ररूप = अक्षर; लक्षणप्ररूप = रूप। TT व Tt दोनों लंबे।
- परीक्षण संकरण Tt × tt = 1:1।
- जीन → प्रोटीन → लक्षण।
- कायिक कोशिकाएँ 2 प्रतियाँ; युग्मक 1; निषेचन जोड़ी पुनः स्थापित।
- भिन्न गुणसूत्रों के जीन → स्वतंत्र अपव्यूहन।
- मादा XX, नर XY; पिता लिंग तय करता है; अनुपात 1:1।
- मनुष्य: 22 अलिंगसूत्र जोड़ी + 1 लिंग जोड़ी।
- रक्त समूह O = ii; I^A, I^B, i पर प्रभावी एवं आपस में सहप्रभावी।