मुद्रण युग से पहले की पांडुलिपियाँ (Manuscripts)

भारत में हस्तलिखित पांडुलिपियों (manuscripts) की एक समृद्ध और पुरानी परंपरा थी — संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और विभिन्न देशी (स्थानीय) भाषाओं में। पांडुलिपियाँ ताड़पत्र (palm leaves) या हाथ से बने कागज़ पर नकल की जाती थीं, अक्सर सुंदर ढंग से सचित्र होती थीं, और उन्हें लकड़ी के गत्तों के बीच दबाकर रखा जाता या सिलकर बाँध दिया जाता था।

परंतु पांडुलिपियाँ बहुत महँगी और नाज़ुक होती थीं, उन्हें सावधानी से रखना पड़ता था, और उन्हें पढ़ना कठिन था क्योंकि लिपि अलग-अलग शैलियों में लिखी जाती थी। इसलिए रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इनका व्यापक उपयोग नहीं होता था। औपनिवेशिक काल से पहले के बंगाल में, जहाँ कई गाँव-पाठशालाएँ थीं, विद्यार्थी अक्सर केवल लिखना सीखते थे, पढ़ना नहीं — शिक्षक स्मृति से बोलकर लिखवाते थे, इसलिए बहुत-से लोग बिना कोई पाठ पढ़े ही साक्षर हो जाते थे।

मुद्रण भारत आता है

छापाखाना (printing press) सबसे पहले गोवा (Goa) आयापुर्तगाली मिशनरियों (Portuguese missionaries) के साथ सोलहवीं शताब्दी के मध्य में। जेसुइट पादरियों ने कोंकणी सीखी और पुस्तिकाएँ छापीं; पहली तमिल (Tamil) पुस्तक 1579 में कोच्चि (Cochin) में छपी, और पहली मलयालम पुस्तक 1713 में

1780 से जेम्स ऑगस्टस हिकी (James Augustus Hickey) ने साप्ताहिक पत्रिका बंगाल गजट (Bengal Gazette) का संपादन शुरू किया — इस तरह निजी अंग्रेज़ उद्यम से भारत में अंग्रेज़ी मुद्रण आरंभ हुआ। हिकी ने कंपनी अधिकारियों के बारे में गपशप छापी, जिससे गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings) इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने हिकी को प्रताड़ित किया और सरकारी रूप से मान्यता प्राप्त अखबारों को प्रोत्साहन दिया। पहला भारतीय अखबार साप्ताहिक बंगाल गजट (Bengal Gazette) था, जिसे गंगाधर भट्टाचार्य (Gangadhar Bhattacharya) ने निकाला, जो राममोहन राय (Rammohun Roy) के निकट थे।

धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें

उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ से, धार्मिक मुद्दों को लेकर तीव्र बहसें — जैसे विधवाओं को जलाना (सती), मूर्तिपूजा और ब्राह्मणवादी पौरोहित्यसार्वजनिक रूप से और छपाई के माध्यम से होने लगीं। मुद्रित पुस्तिकाओं और अखबारों ने नए विचार फैलाए और बहस को दिशा दी, जिससे व्यापक जनसमूह भाग ले सका।

राममोहन राय (Rammohun Roy) ने संबाद कौमुदी (Sambad Kaumudi) (1821 से) प्रकाशित किया, और हिंदू रूढ़िवादियों ने समाचार चंद्रिका (Samachar Chandrika) के ज़रिए जवाब दिया। उत्तर भारत में उलेमा (ulama) ने सस्ते शिलामुद्रण प्रेस (lithographic presses) से धार्मिक ग्रंथ छापे; देवबंद मदरसा (Deoband Seminary) (1867 में स्थापित) ने हज़ारों फ़तवे (fatwas) प्रकाशित किए। हिंदुओं में मुद्रण ने देशी भाषा में धार्मिक ग्रंथ पढ़ने को बढ़ावा दिया — रामचरितमानस (Ramcharitmanas) पहली बार 1810 में कलकत्ता में छपा, और नवल किशोर प्रेस (Naval Kishore Press) (लखनऊ) तथा श्री वेंकटेश्वर प्रेस (बंबई) जैसे प्रेसों ने अनेक देशी-भाषा ग्रंथ प्रकाशित किए। अखबारों ने भी समुदायों को जोड़ा, जिससे अखिल भारतीय पहचान बनी।

प्रश्न और उत्तर

Q1. भारत की पांडुलिपि परंपरा और उसकी सीमाओं का वर्णन कीजिए। उत्तर. भारत में संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और देशी भाषाओं में हस्तलिखित पांडुलिपियों की समृद्ध परंपरा थी, जो ताड़पत्र (palm leaves) या हाथ से बने कागज़ पर नकल की जाती थीं। परंतु पांडुलिपियाँ महँगी और नाज़ुक थीं, इन्हें रखना कठिन था और पढ़ना कठिन था (क्योंकि लिपियाँ भिन्न-भिन्न थीं), इसलिए रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इनका व्यापक उपयोग नहीं होता था।

Q2. मुद्रण भारत कैसे आया? उत्तर. छापाखाना सबसे पहले गोवा (Goa) आयापुर्तगाली मिशनरियों (Portuguese missionaries) के साथ सोलहवीं शताब्दी के मध्य में। पहली तमिल पुस्तक 1579 में कोच्चि (Cochin) में छपी, और 1780 से जेम्स ऑगस्टस हिकी के बंगाल गजट से भारत में अंग्रेज़ी मुद्रण आरंभ हुआ।

प्रश्न और उत्तर (जारी)

Q3. मुद्रण ने भारत में धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहस को कैसे आकार दिया? उत्तर. विधवाओं को जलाना (सती) और मूर्तिपूजा जैसे मुद्दों पर बहसें छपाई के माध्यम से हुईं। राममोहन राय (Rammohun Roy) ने संबाद कौमुदी (Sambad Kaumudi) (1821) प्रकाशित किया और रूढ़िवादियों ने समाचार चंद्रिका (Samachar Chandrika) से जवाब दिया; उलेमा (ulama) और देवबंद मदरसा (Deoband Seminary) (1867) ने धार्मिक ग्रंथ और फ़तवे छापे — इस तरह मुद्रण ने व्यापक जनसमूह को बहसों में शामिल होने दिया।

Q4. गंगाधर भट्टाचार्य कौन थे? उत्तर. वे वही भारतीय थे जिन्होंने पहला भारतीय-संपादित अखबार, साप्ताहिक बंगाल गजट (Bengal Gazette) निकाला, और राममोहन राय के निकट थे।

प्रश्न और उत्तर (जारी)

Q5. अखबारों ने पूरे भारत में जुड़ाव की भावना पैदा करने में कैसे मदद की? उत्तर. अखबारों ने एक स्थान की खबर दूसरे स्थान तक पहुँचाई, जिससे भारत के अलग-अलग हिस्सों के समुदाय और लोग जुड़े। सूचना के इस साझा प्रवाह ने अखिल भारतीय पहचान की भावना पैदा करने में मदद की।