प्रकाशन के नए रूप
मुद्रण ने लेखन के नए प्रकारों की भूख पैदा की। जैसे-जैसे अधिक लोग पढ़ने लगे, वे अपने अपने जीवन और भावनाओं को प्रतिबिंबित होते देखना चाहते थे — एक यूरोपीय विधा उपन्यास (novel) ने इस ज़रूरत को बख़ूबी पूरा किया और जल्द ही उसने भारतीय रूप ले लिए। अन्य नए रूप — गीतिकाव्य, लघुकथाएँ और निबंध — भी सामने आए।
एक नई दृश्य संस्कृति बनी: अधिक प्रेसों के साथ, दृश्य चित्रों की अनेक प्रतियाँ बनाई जा सकती थीं। राजा रवि वर्मा (Raja Ravi Varma) जैसे चित्रकारों ने व्यापक प्रसार के लिए चित्र बनाए, और सस्ते चित्र तथा कैलेंडर गरीब लोग भी खरीद सकते थे। 1870 के दशक तक, व्यंग्यचित्र (caricatures) और कार्टून पत्रिकाओं और अखबारों में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करने लगे — कुछ पश्चिमी रुचियों का उपहास करते, कुछ राष्ट्रवादियों पर व्यंग्य करते या साम्राज्यवादी शासन की आलोचना करते।
स्त्रियाँ, गरीब और निम्न जातियाँ
मध्यवर्गीय घरों में स्त्रियों का पढ़ना बढ़ा, और उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य के बाद स्त्रियों के लिए विद्यालय खोले गए — हालाँकि रूढ़िवादियों को डर था कि पढ़ी-लिखी लड़कियाँ विधवा हो जाएँगी या बिगड़ जाएँगी। कुछ विद्रोही स्त्रियों ने इसका विरोध किया: राससुंदरी देवी (Rashsundari Debi) ने, एक रूढ़िवादी परिवार में, छिपकर पढ़ना सीखा और आमार जीबोन (Amar Jiban) (1876) लिखा, जो बांग्ला में पहली पूर्ण-लंबाई की आत्मकथा थी। ताराबाई शिंदे (Tarabai Shinde) और पंडिता रमाबाई (Pandita Ramabai) ने उच्च-जाति की विधवाओं के दयनीय जीवन के बारे में लिखा।
गरीबों और निम्न जातियों के लिए मुद्रण विरोध का साधन बना। ज्योतिबा फुले (Jyotiba Phule) ने गुलामगिरी (Gulamgiri) (1871) में जातिगत अन्याय के बारे में लिखा; बीसवीं शताब्दी में बी.आर. आंबेडकर (B.R. Ambedkar) और ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार) (Periyar) ने जाति पर सशक्त लेखन किया, जो पूरे भारत में पढ़ा गया। सस्ती किताबें मद्रास के गरीबों तक पहुँचीं, और मिल मज़दूरों (जैसे कानपुर में काशीबाबा, और बंगलौर के मज़दूर जिन्होंने पुस्तकालय बनाए) ने स्व-शिक्षा के लिए मुद्रण का उपयोग किया।
मुद्रण और सेंसरशिप
1798 से पहले, औपनिवेशिक राज्य को सेंसरशिप की अधिक चिंता नहीं थी — इसके आरंभिक नियंत्रण कंपनी के कुशासन की आलोचना करने वाले अंग्रेज़ों के विरुद्ध थे। 1820 के दशक तक कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट ने नियम बनाए, परंतु 1835 में गवर्नर-जनरल बेंटिंक (Bentinck) ने, थॉमस मैकाले (Thomas Macaulay) की सलाह पर, पहले की स्वतंत्रताएँ बहाल कर दीं।
1857 के विद्रोह के बाद, रवैया बदल गया। जैसे-जैसे देशी-भाषा अखबार मुखर रूप से राष्ट्रवादी होते गए, सरकार ने 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (Vernacular Press Act of 1878) पारित किया (जो आयरिश प्रेस कानूनों पर आधारित था), जिससे उसे देशी-भाषा प्रेस को सेंसर करने के व्यापक अधिकार मिले: राजद्रोही (seditious) समझे गए अखबार को चेतावनी दी जाती, और यदि चेतावनी अनसुनी की जाती, तो प्रेस जब्त कर ली जाती और मशीनरी छीन ली जाती। इसके बावजूद, राष्ट्रवादी अखबार बढ़ते गए। जब 1907 में पंजाब के क्रांतिकारियों को निर्वासित किया गया, तो बालगंगाधर तिलक (Balgangadhar Tilak) ने अपने केसरी (Kesari) में सहानुभूतिपूर्वक लिखा, जिससे 1908 में उनकी कैद हुई और व्यापक विरोध हुए।
प्रश्न और उत्तर
Q1. मुद्रण के साथ भारत में प्रकाशन और दृश्य संस्कृति के कौन-से नए रूप विकसित हुए? उत्तर. उपन्यास (novel) (भारतीय रूपों में), गीतिकाव्य, लघुकथाएँ और निबंध विकसित हुए। एक नई दृश्य संस्कृति उभरी क्योंकि चित्रों की अनेक प्रतियाँ बनाई जाने लगीं — राजा रवि वर्मा (Raja Ravi Varma) के व्यापक-प्रसार वाले चित्र, सस्ते कैलेंडर, और 1870 के दशक से, सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर व्यंग्यचित्र (caricatures) और कार्टून।
Q2. भारत में स्त्रियों के पढ़ने-लिखने की वृद्धि का वर्णन कीजिए। उत्तर. रूढ़िवादी भय के बावजूद, उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य के बाद स्त्रियों का पढ़ना बढ़ा और स्त्रियों के विद्यालय खोले गए। राससुंदरी देवी (Rashsundari Debi) जैसी विद्रोही स्त्रियों (जिनकी आमार जीबोन (Amar Jiban), 1876, बांग्ला की पहली पूर्ण-लंबाई की आत्मकथा थी) और ताराबाई शिंदे (Tarabai Shinde) तथा पंडिता रमाबाई (Pandita Ramabai) जैसी लेखिकाओं ने स्त्रियों के जीवन के बारे में लिखा।
प्रश्न और उत्तर (जारी)
Q3. भारत में गरीब लोगों और निम्न जातियों के लिए मुद्रण संस्कृति के क्या प्रभाव थे? उत्तर. मुद्रण ने गरीबों और निम्न जातियों को विरोध की आवाज़ दी। ज्योतिबा फुले (Jyotiba Phule) ने जातिगत अन्याय पर गुलामगिरी (Gulamgiri) (1871) लिखी; आंबेडकर (Ambedkar) और पेरियार (Periyar) ने जाति पर सशक्त लेखन किया। सस्ती किताबें मद्रास के गरीबों तक पहुँचीं, और मिल मज़दूरों ने स्व-शिक्षा के लिए पुस्तकालय बनाए।
Q4. 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट क्या था? उत्तर. 1857 के विद्रोह के बाद पारित, और आयरिश प्रेस कानूनों पर आधारित, वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (Vernacular Press Act) (1878) ने सरकार को देशी-भाषा प्रेस को सेंसर करने के व्यापक अधिकार दिए। राजद्रोही (seditious) समझे गए अखबार को चेतावनी दी जाती, और यदि वह चेतावनी अनसुनी करता, तो उसकी प्रेस जब्त कर ली जाती और मशीनरी छीन ली जाती।
प्रश्न और उत्तर (जारी)
Q5. समझाइए कि मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में कैसे सहायता की। उत्तर. वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट जैसी सेंसरशिप के बावजूद, पूरे भारत में राष्ट्रवादी अखबार बढ़ते गए, जो औपनिवेशिक कुशासन की रिपोर्टिंग करते और राष्ट्रवादी गतिविधियों को प्रोत्साहित करते। तिलक (Tilak) (केसरी (Kesari) में) जैसे लेखकों ने विरोध को प्रेरित किया; प्रेस का गला घोंटने के प्रयासों ने केवल अधिक विरोध भड़काया, इसलिए मुद्रण राष्ट्रवाद का शक्तिशाली वाहन बन गया।