अध्याय का सारांश

यह खंड पूरे अध्याय 4 — औद्योगीकरण का युग — का संक्षिप्त पुनरावलोकन है। बोर्ड परीक्षा से पहले अंतिम समय की पुनरावृत्ति के लिए इसका उपयोग करें।

औद्योगीकरण केवल कारखानों की कहानी नहीं थी। कारखानों से पहले भी आद्य-औद्योगीकरण (proto-industrialisation) था — ग्रामीण इलाकों के किसानों और कारीगरों द्वारा विश्व बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर किया जाने वाला उत्पादन, जिसे शहरी व्यापारी संगठित करते थे और जो शक्तिशाली शहरी श्रेणी-संगठनों (guilds) से बचकर चलते थे।

ब्रिटेन: कारखाना, तकनीक और श्रम

  • कारखाना: सबसे पहले 1730 के दशक में, 18वीं सदी के अंत में तेज़ी से बढ़े; कपास पहला प्रतीक; रिचर्ड आर्कराइट (Richard Arkwright) की सूती मिल ने सभी प्रक्रियाओं को एक ही छत के नीचे ला दिया।
  • बदलाव की गति: कपास 1840 के दशक तक अग्रणी रहा, फिर लोहा और इस्पात (रेलवे); उन्नत क्षेत्रों में कार्यबल का 20% से भी कम; तकनीक धीरे फैली (जेम्स वाट (James Watt) का भाप का इंजन, 1781 में पेटेंट; केवल 321 इंजन)।
  • हाथ का श्रम: श्रम सस्ता और प्रचुर था, इसलिए उद्योगपति हाथ के श्रम को प्राथमिकता देते थे; मौसमी माँग; उच्च वर्ग हस्तनिर्मित वस्तुओं को पसंद करते थे; मशीन का माल उपनिवेशों के लिए।
  • मज़दूरों का जीवन: रिश्तेदारी के तंत्र से नौकरियाँ; रैन बसेरे; मौसमी बेरोज़गारी; स्पिनिंग जेनी (हरग्रीव्ज़, 1764) पर महिलाओं ने हमला किया।

भारत: वस्त्र, बुनकर और मैनचेस्टर

  • भारतीय वस्त्रों का युग: रेशम और कपास का विश्व व्यापार में बोलबाला था; बंदरगाह — सूरत, मसूलीपट्टम, हुगली; पुराने बंदरगाहों का पतन हुआ, यूरोपियों के अधीन बंबई और कलकत्ता बढ़े।
  • बुनकर: गुमाश्ता (gomastha) और पेशगी की व्यवस्था ने बुनकरों को कंपनी से बाँध दिया; टकराव; बुनकरों ने गाँव छोड़ दिए या खेती करने लगे।
  • मैनचेस्टर भारत में: कपड़े का निर्यात 33% → 3% गिरा (1811-51); मैनचेस्टर से आयात 1870 के दशक तक आयात के 50% से अधिक हुआ; अमेरिकी गृहयुद्ध (1860 के दशक) ने कच्ची कपास की कीमतें बढ़ाईं।

भारतीय कारखाने और छोटे पैमाने का उद्योग

  • कारखाने: पहली सूती मिल बंबई 1854; पहली जूट मिल बंगाल 1855; उद्यमी — द्वारकानाथ टैगोर, टाटा परिवार (जमशेदपुर इस्पात, 1912), सेठ हुकुमचंद (जूट, 1917); यूरोपीय मैनेजिंग एजेंसियाँ प्रभावी; मज़दूर आस-पास के ज़िलों से; जॉबर
  • विशेषताएँ: एजेंसियाँ निर्यात उत्पादों पर केंद्रित; भारतीय मिलें मोटा सूत बनातीं; स्वदेशी; प्रथम विश्व युद्ध का उछाल; मैनचेस्टर कभी उबर नहीं पाया।
  • छोटे पैमाने का बोलबाला: पंजीकृत कारखानों में मज़दूर केवल 5% (1911), 10% (1931); हथकरघा उत्पादन तिगुना (1900-40); फ्लाई शटल; बारीक बुनाई (बनारसी, बालूचरी साड़ियाँ) बची रहीं।
  • माल का बाज़ार: विज्ञापन — मैनचेस्टर लेबल, भारतीय देवताओं की छवियाँ, कैलेंडर, स्वदेशी संदेश

त्वरित पुनरावृत्ति — अवश्य जानने योग्य तथ्य

  • आद्य-औद्योगीकरण = कारखानों से पहले, ग्रामीण इलाकों में किया जाने वाला उत्पादन।
  • आर्कराइट = सूती मिल; हरग्रीव्ज़ = स्पिनिंग जेनी (1764); वाट = भाप का इंजन (1781)।
  • गुमाश्ता = बुनकरों की देखरेख; पेशगी की व्यवस्था ने बुनकरों को कंपनी से बाँधा।
  • कपड़े का निर्यात 33% → 3% गिरा (1811-1851); मैनचेस्टर से आयात 1870 के दशक तक 50% से अधिक।
  • पहली भारतीय सूती मिल = बंबई 1854; पहली जूट मिल = बंगाल 1855; टाटा इस्पात = जमशेदपुर 1912।
  • प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय उद्योग को बढ़ावा दिया; फ्लाई शटल ने हथकरघों की मदद की।
  • विज्ञापन: मैनचेस्टर लेबल, भारतीय देवता, कैलेंडर, स्वदेशी संदेश।

त्वरित पुनरावृत्ति — प्रायः भ्रमित करने वाले बिंदु

  • गुमाश्ता (बुनकरों की देखरेख) बनाम जॉबर (मिल मज़दूरों की भर्ती)।
  • स्पिनिंग जेनी (हरग्रीव्ज़, कताई) बनाम फ्लाई शटल (बुनाई, चौड़ा कपड़ा)।
  • आद्य-औद्योगीकरण (कोई कारखाना नहीं) बनाम कारखाना व्यवस्था (एक छत, देखरेख)।
  • सूरत/हुगली (पुराने बंदरगाहों का पतन) बनाम बंबई/कलकत्ता (नए बंदरगाह बढ़े)।
  • मोटा कपड़ा (उतार-चढ़ाव वाली माँग) बनाम बनारसी साड़ियों जैसी बारीक बुनाई (स्थिर माँग)।
  • यूरोपीय मैनेजिंग एजेंसियाँ (निर्यात उत्पाद) बनाम भारतीय मिलें (मोटा सूत, फिर कपड़ा)।