लघु उद्योगों का प्रभुत्व
युद्ध के बाद कारखाना उद्योग तो बढ़े, परंतु बड़े उद्योग अर्थव्यवस्था का केवल एक छोटा हिस्सा थे। लगभग 67 per cent बड़े उद्योग (1911) बंगाल और बंबई में थे, और औद्योगिक श्रमशक्ति का केवल एक छोटा हिस्सा ही पंजीकृत कारखानों (registered factories) में था — 1911 में 5 per cent और 1931 में 10 per cent। बाकी लोग गलियों और उपगलियों में छोटी कार्यशालाओं और घरेलू इकाइयों में काम करते थे, जो राहगीरों को दिखाई नहीं देते थे।
वास्तव में, बीसवीं सदी में दस्तकारी उत्पादन का विस्तार हुआ। हथकरघा (handloom) कपड़े का उत्पादन 1900 और 1940 के बीच लगभग तीन गुना हो गया। यह आंशिक रूप से तकनीकी परिवर्तन के कारण था: सदी के दूसरे दशक तक बुनकर फ्लाई शटल (fly shuttle) का इस्तेमाल करने लगे, जिसने उत्पादकता बढ़ाई, उत्पादन को तेज़ किया और श्रम की माँग घटाई। 1941 तक 35 per cent से अधिक हथकरघों में फ्लाई शटल लगे थे (त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचीन और बंगाल में 70–80 per cent)।
कौन-से बुनकर टिके रहे
कुछ बुनकर मिलों की प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए बेहतर स्थिति में थे। जो बुनकर गरीबों के लिए मोटा कपड़ा बनाते थे, उन्हें बुरी तरह घटती-बढ़ती माँग का सामना करना पड़ता था — अकालों में ग्रामीण गरीब कपड़ा नहीं खरीद पाते थे। परंतु संपन्न लोगों द्वारा खरीदी जाने वाली बारीक किस्मों की माँग अधिक स्थिर थी: 'अकालों से बनारसी या बालूचरी (Baluchari) साड़ियों की बिक्री प्रभावित नहीं होती थी'। इसके अलावा, मिलें विशेष बुनावटों की नकल नहीं कर सकती थीं — बुने हुए किनारों वाली साड़ियाँ और मद्रास के प्रसिद्ध लुंगी तथा रूमाल आसानी से हटाए नहीं जा सकते थे।
जो बुनकर उत्पादन बढ़ाते रहे, उन्होंने ज़रूरी नहीं कि समृद्धि पाई हो — वे कठिन जीवन जीते थे और लंबे घंटे काम करते थे, जिसमें पूरा परिवार लगा रहता था। परंतु वे केवल अतीत के अवशेष नहीं थे; उनका जीवन और श्रम औद्योगीकरण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग था।
वस्तुओं का बाज़ार: विज्ञापन
जब नए उत्पाद बनते हैं, तो लोगों को उन्हें खरीदने के लिए राज़ी करना पड़ता है — इसका एक महत्वपूर्ण तरीका है विज्ञापन (advertisement), जो उत्पादों को वांछनीय और आवश्यक प्रतीत कराते हैं और एक नई उपभोक्ता संस्कृति गढ़ते हैं।
जब मैनचेस्टर के उद्योगपति भारत में कपड़ा बेचते थे, तो वे कपड़े के गट्ठरों पर लेबल (labels) लगाते थे। लेबल से निर्माता का नाम और स्थान परिचित हो जाता था और यह गुणवत्ता का प्रतीक होता था — 'MADE IN MANCHESTER' का उद्देश्य विश्वास जगाना था। लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं की छवियाँ (कृष्ण/Krishna, सरस्वती/Saraswati, लक्ष्मी) भी होती थीं, मानो दैवीय स्वीकृति देकर विदेशी वस्तुओं को परिचित बना रही हों। उन्नीसवीं सदी के अंत तक निर्माता उत्पादों को लोकप्रिय बनाने के लिए कैलेंडर (calendars) छापते थे, जो उन घरों में भी टँगे रहते थे जहाँ लोग पढ़ नहीं सकते थे। किसी उत्पाद के प्रति सम्मान जगाने के लिए बादशाहों और नवाबों की तस्वीरें भी इस्तेमाल की जाती थीं। जब भारतीय निर्माता विज्ञापन देते थे, तो स्वदेशी (swadeshi) संदेश स्पष्ट होता था: 'यदि आप राष्ट्र की परवाह करते हैं, तो भारतीयों द्वारा बनाई गई वस्तुएँ खरीदें।'
प्रश्न और उत्तर
Q1. दर्शाइए कि औपनिवेशिक भारत में लघु उत्पादन का प्रभुत्व था। उत्तर. बड़े उद्योग केवल एक छोटा हिस्सा थे — अधिकांश (लगभग 67 per cent) बंगाल और बंबई में — और औद्योगिक श्रमशक्ति का केवल 5 per cent (1911) और 10 per cent (1931) ही पंजीकृत कारखानों में था। अधिकांश लोग छोटी कार्यशालाओं और घरेलू इकाइयों में काम करते थे, और हथकरघा कपड़े का उत्पादन 1900 और 1940 के बीच वास्तव में तीन गुना हो गया।
Q2. फ्लाई शटल ने हथकरघा बुनकरों की किस प्रकार मदद की? उत्तर. फ्लाई शटल (fly shuttle) एक यांत्रिक उपकरण था जिससे बुनकर बड़े करघे चला सकते और चौड़ा कपड़ा बुन सकते थे, जिससे उत्पादकता बढ़ी, उत्पादन तेज़ हुआ और श्रम की माँग घटी। 1941 तक भारतीय हथकरघों में से 35 per cent से अधिक में फ्लाई शटल लगे थे।
प्रश्न और उत्तर (जारी)
Q3. कुछ बुनकर मिलों की प्रतिस्पर्धा में क्यों टिके रह सके? उत्तर. बारीक किस्मों के बुनकर (जैसे बनारसी और बालूचरी (Baluchari) साड़ियाँ) इसलिए टिके रहे क्योंकि संपन्न लोगों की माँग अकालों में भी स्थिर रहती थी, और क्योंकि मिलें विशेष बुनावटों की नकल नहीं कर सकती थीं — बुने हुए किनारों वाली साड़ियाँ और मद्रास के लुंगी मिल के कपड़े से नहीं हटाए जा सकते थे।
Q4. विज्ञापनों ने वस्तुओं का बाज़ार बनाने में किस प्रकार मदद की? उत्तर. विज्ञापनों ने उत्पादों को वांछनीय और आवश्यक प्रतीत कराया और एक नई उपभोक्ता संस्कृति गढ़ी। मैनचेस्टर ने विश्वास जीतने के लिए लेबल ('MADE IN MANCHESTER') और भारतीय देवताओं की छवियों का इस्तेमाल किया; निर्माताओं ने कैलेंडर छापे; और भारतीय उत्पादकों ने अपनी वस्तुएँ बेचने के लिए स्वदेशी संदेश का उपयोग किया।
प्रश्न और उत्तर (जारी)
Q5. कपड़े के लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं की छवियाँ क्यों इस्तेमाल की जाती थीं? उत्तर. कृष्ण (Krishna) और सरस्वती (Saraswati) जैसे देवताओं की छवियाँ वस्तुओं को दैवीय स्वीकृति का भाव देती थीं और विदेशी भूमि में बने माल को परिचित तथा भारतीय खरीदारों के लिए स्वीकार्य बना देती थीं, जिससे उन्हें खरीदने के लिए प्रोत्साहन मिलता था।