एजेंसियों और भारतीय मिलों ने क्या उत्पादन किया
भारत में औद्योगिक विकास एक विचित्र प्रतिरूप (peculiar pattern) पर चला। यूरोपीय मैनेजिंग एजेंसियों (European Managing Agencies) की रुचि निर्यात (export) के लिए बनने वाले उत्पादों में थी, न कि भारत में बिक्री के लिए — उन्होंने चाय (tea) और कॉफ़ी (coffee) के बागान लगाए (सस्ती ज़मीन हासिल करके) और खनन, नील (indigo) तथा जूट (jute) में निवेश किया।
जब भारतीय व्यवसायियों ने उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उद्योग स्थापित किए, तो उन्होंने भारतीय बाज़ार में मैनचेस्टर (Manchester) से प्रतिस्पर्धा करने से परहेज़ किया। चूँकि सूत (यार्न/yarn) भारत में कोई प्रमुख ब्रिटिश आयात नहीं था, इसलिए आरंभिक भारतीय सूती मिलों ने कपड़े के बजाय मोटा सूती सूत (धागा/yarn) बनाया। इस सूत का इस्तेमाल भारतीय हथकरघा (handloom) बुनकर करते थे या इसे चीन (China) को निर्यात कर दिया जाता था।
स्वदेशी और कपड़े की ओर बदलाव
बीसवीं सदी के पहले दशक तक औद्योगीकरण के प्रतिरूप में बदलाव आने लगे। जैसे-जैसे स्वदेशी आंदोलन (swadeshi movement) ने ज़ोर पकड़ा, राष्ट्रवादियों ने लोगों को विदेशी कपड़े का बहिष्कार (boycott) करने के लिए संगठित किया, और औद्योगिक समूहों ने सरकार पर टैरिफ़ संरक्षण (tariff protection) के लिए दबाव डाला। 1906 से भारतीय सूत का चीन को निर्यात घटने लगा (क्योंकि चीनी और जापानी मिलों ने उस बाज़ार को भर दिया)।
इसलिए भारतीय उद्योगपति सूत से कपड़े के उत्पादन की ओर मुड़ गए: भारत में सूती टुकड़ा माल (cotton piece-goods) का उत्पादन 1900 और 1912 के बीच दोगुना हो गया।
प्रथम विश्व युद्ध की तेज़ी
प्रथम विश्व युद्ध तक औद्योगिक विकास धीमा था — परंतु युद्ध ने एकदम नई स्थिति पैदा कर दी। जब ब्रिटिश मिलें युद्ध सामग्री के उत्पादन में व्यस्त हो गईं, तो भारत में मैनचेस्टर (Manchester) का आयात घट गया, जिससे भारतीय मिलों को आपूर्ति के लिए एक विशाल घरेलू बाज़ार मिल गया। जैसे-जैसे युद्ध चलता रहा, भारतीय कारखानों से युद्ध की ज़रूरतों की आपूर्ति करने को कहा गया — जूट (jute) के बोरे, वर्दियों का कपड़ा, तंबू, जूते और काठियाँ। नए कारखाने लगाए गए, पुराने कारखाने कई पालियों (multiple shifts) में चलने लगे, और औद्योगिक उत्पादन में ज़बरदस्त उछाल आया।
युद्ध के बाद मैनचेस्टर भारतीय बाज़ार में अपनी पुरानी स्थिति कभी वापस नहीं पा सका। आधुनिकीकरण करने और अमेरिका, जर्मनी तथा जापान से प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ, ब्रिटेन का सूती निर्यात ढह गया, और उपनिवेशों के भीतर स्थानीय उद्योगपतियों ने अपनी स्थिति मज़बूत कर ली और घरेलू बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया।
प्रश्न और उत्तर
Q1. आरंभिक भारतीय सूती मिलों ने कपड़े के बजाय मोटा सूत क्यों बनाया? उत्तर. भारतीय व्यवसायियों ने कपड़े के बाज़ार में मैनचेस्टर (Manchester) से प्रतिस्पर्धा करने से परहेज़ किया। चूँकि सूत (yarn) कोई प्रमुख ब्रिटिश आयात नहीं था, इसलिए आरंभिक मिलों ने मोटा सूती सूत बनाया, जिसका इस्तेमाल भारतीय हथकरघा (handloom) बुनकर करते थे या जिसे चीन (China) को निर्यात किया जाता था।
Q2. स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय उद्योग को किस प्रकार प्रभावित किया? उत्तर. स्वदेशी आंदोलन (swadeshi movement) ने लोगों को विदेशी कपड़े का बहिष्कार (boycott) करने के लिए संगठित किया और औद्योगिक समूहों को टैरिफ़ संरक्षण (tariff protection) की माँग करने के लिए प्रेरित किया। इससे भारतीय मिलों को लाभ हुआ, जो तेज़ी से सूत से कपड़े के उत्पादन की ओर मुड़ गईं।
प्रश्न और उत्तर (जारी)
Q3. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा? उत्तर. जब ब्रिटिश मिलें युद्ध सामग्री के उत्पादन में व्यस्त हो गईं, तो मैनचेस्टर (Manchester) का आयात घट गया, जिससे भारतीय मिलों को एक विशाल घरेलू बाज़ार मिल गया। भारतीय कारखानों ने युद्ध की ज़रूरतों की भी आपूर्ति की — जूट के बोरे, वर्दियाँ, तंबू, जूते और काठियाँ। नए कारखाने खुले और पुराने कई पालियों (multiple shifts) में चले, इसलिए उत्पादन में ज़बरदस्त उछाल आया।
Q4. प्रथम विश्व युद्ध के बाद मैनचेस्टर भारतीय बाज़ार को फिर से क्यों नहीं पा सका? उत्तर. युद्ध के बाद ब्रिटेन अमेरिका, जर्मनी और जापान से आधुनिकीकरण या प्रतिस्पर्धा नहीं कर सका; उसका सूती उत्पादन ढह गया और निर्यात गिर गया। इस बीच भारतीय उद्योगपतियों ने अपनी स्थिति मज़बूत कर ली थी और घरेलू बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया।