पहले भारतीय कारखाने
बंबई में पहली कपास मिल 1854 में स्थापित हुई और दो वर्ष बाद उत्पादन शुरू हुआ; 1862 तक चार मिलें चल रही थीं। लगभग इसी समय, बंगाल में जूट मिलें (jute mill) स्थापित हुईं (पहली 1855 में)। उत्तर भारत में एल्गिन मिल (Elgin Mill) 1860 के दशक में कानपुर (Kanpur) में शुरू हुई, और जल्द ही अहमदाबाद की पहली कपास मिल; 1874 तक मद्रास की पहली कताई और बुनाई मिल ने उत्पादन शुरू किया।
आरंभिक उद्यमी
उद्योग तरह-तरह के लोगों द्वारा स्थापित किए गए, जिनमें से कइयों ने पहले चीन के साथ व्यापार में (अफ़ीम (opium) व्यापार को धन देकर और उसका माल ढोकर) धन कमाया था:
- बंगाल में द्वारकानाथ टैगोर (Dwarkanath Tagore) ने चीन व्यापार में अपनी संपत्ति बनाई और 1830–40 के दशकों में छह संयुक्त-पूँजी कंपनियाँ स्थापित कीं।
- बंबई में दिनशॉ पेटिट और जमशेदजी नुसरवानजी टाटा जैसे पारसियों (Parsi) ने चीन निर्यात और कच्ची-कपास की खेप से विशाल औद्योगिक साम्राज्य खड़े किए; जे.एन. टाटा (J.N. Tata) ने 1912 में जमशेदपुर (Jamshedpur) में पहला लोहा और इस्पात कारखाना स्थापित किया।
- मारवाड़ी सेठ हुकुमचंद (Seth Hukumchand) ने 1917 में कलकत्ता में पहली भारतीय जूट मिल स्थापित की, और जी.डी. बिड़ला (G.D. Birla) का परिवार भी चीन के साथ व्यापार करता था।
परंतु जैसे-जैसे औपनिवेशिक नियंत्रण कसता गया, भारतीय व्यापारियों को यूरोप के साथ व्यापार से रोक दिया गया और जहाज़रानी से बाहर कर दिया गया। प्रथम विश्व युद्ध तक, यूरोपीय मैनेजिंग एजेंसियों (European Managing Agencies) (बर्ड हीगलर्स, एंड्रयू यूल, जार्डिन स्किनर) ने भारतीय उद्योग के एक बड़े हिस्से को नियंत्रित किया, पूँजी जुटाई और निर्णय लिए, जबकि भारतीय पूँजीपति अक्सर केवल पूँजी उपलब्ध कराते थे।
मज़दूर कहाँ से आते थे?
कारखानों को मज़दूरों की ज़रूरत थी, और यह माँग बढ़ती गई: 1901 में भारतीय कारखानों में 5,84,000 मज़दूर थे, और 1946 तक 24,36,000 से अधिक।
अधिकांश क्षेत्रों में मज़दूर आसपास के ज़िलों से आते थे। जिन किसानों और कारीगरों को गाँव में काम नहीं मिलता, वे औद्योगिक केंद्रों की ओर जाते — 1911 में बंबई के 50 प्रतिशत से अधिक कपास मज़दूर रत्नागिरी (Ratnagiri) से आए थे, और कानपुर की मिलें कानपुर ज़िले से मज़दूर लेती थीं। मिल मज़दूर अक्सर गाँव और शहर के बीच आते-जाते रहते, फसल कटाई और त्योहारों के लिए घर लौट जाते थे।
नौकरी पाना कठिन था — काम माँगने वालों की संख्या हमेशा नौकरियों से अधिक रहती। उद्योगपति नए मज़दूर जुटाने के लिए प्रायः एक जॉबर (jobber) रखते थे: अक्सर कोई विश्वसनीय पुराना मज़दूर जो अपने गाँव से लोगों को लाता, उन्हें नौकरियाँ दिलाता और बसने में मदद करता। इस तरह जॉबर अधिकार और शक्ति पा लेता, और अपनी कृपा के बदले पैसे और उपहार माँगने लगता।
प्रश्न और उत्तर
Q1. भारत में पहली कपास मिल और पहली जूट मिल कब और कहाँ स्थापित हुई? उत्तर. पहली कपास मिल 1854 में बंबई में स्थापित हुई, और दो वर्ष बाद उत्पादन शुरू हुआ। पहली जूट मिल 1855 में बंगाल में स्थापित हुई।
Q2. कुछ आरंभिक भारतीय औद्योगिक उद्यमी कौन थे? उत्तर. इनमें बंगाल में द्वारकानाथ टैगोर, बंबई में पारसी दिनशॉ पेटिट और जे.एन. टाटा (टाटा ने 1912 में जमशेदपुर में पहला लोहा और इस्पात कारखाना स्थापित किया), और मारवाड़ी सेठ हुकुमचंद (पहली भारतीय जूट मिल, कलकत्ता, 1917) शामिल थे। कइयों ने पहले चीन (अफ़ीम) व्यापार में धन कमाया था।
प्रश्न और उत्तर (जारी)
Q3. यूरोपीय मैनेजिंग एजेंसियों की क्या भूमिका थी? उत्तर. प्रथम विश्व युद्ध तक, यूरोपीय मैनेजिंग एजेंसियों (जैसे बर्ड हीगलर्स, एंड्रयू यूल और जार्डिन स्किनर) ने भारतीय उद्योग के एक बड़े हिस्से को नियंत्रित किया। वे पूँजी जुटातीं, संयुक्त-पूँजी कंपनियाँ स्थापित करतीं और उनका प्रबंधन करतीं थीं, जिसमें अक्सर भारतीय पूँजीपति पूँजी देते पर निर्णय यूरोपीय लोग लेते थे।
Q4. जॉबर कौन था और उसके पास क्या शक्ति थी? उत्तर. जॉबर प्रायः कोई विश्वसनीय पुराना मज़दूर होता था जिसे उद्योगपति नए मज़दूर जुटाने के लिए रखते थे। वह अपने गाँव से लोगों को लाता, उन्हें नौकरियाँ दिलाता और बसने में मदद करता — और इस तरह अधिकार और शक्ति पा लेता, यहाँ तक कि अपनी कृपा के बदले पैसे और उपहार माँगता था।
प्रश्न और उत्तर (जारी)
Q5. भारतीय कारखानों के मज़दूर मुख्यतः कहाँ से आते थे? उत्तर. अधिकतर औद्योगिक केंद्रों के आसपास के ज़िलों से — उदाहरण के लिए, 1911 में बंबई के 50 प्रतिशत से अधिक कपास मज़दूर रत्नागिरी से आए थे। जिन किसानों और कारीगरों को गाँव में काम नहीं मिलता, वे मिलों की ओर पलायन करते, अक्सर फसल कटाई और त्योहारों के लिए घर लौट जाते थे।