कृषि — भारत की प्राथमिक क्रिया

कृषि भारत की सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक क्रिया है। भारत की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या आज भी कृषि कार्यों में लगी हुई है, जो खाद्यान्न और अनेक उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराती है।

देश के विभिन्न भागों में भौतिक पर्यावरण, तकनीक और सामाजिक रीति-रिवाजों के आधार पर विभिन्न प्रकार की कृषि की जाती है।

Four types of farming in India

आरेख के अंग्रेज़ी लेबलों के हिन्दी अर्थ:

English (in image) हिन्दी
Types of farming कृषि के प्रकार
Primitive subsistence (slash-and-burn / jhum) आदिकालीन जीविका कृषि (झूम)
Intensive subsistence गहन जीविका कृषि
Commercial farming वाणिज्यिक कृषि
Plantation agriculture रोपण कृषि

आदिकालीन जीविका कृषि

आदिकालीन जीविका कृषि (primitive subsistence farming) आज भी भारत के कुछ भागों में की जाती है। यह 'स्लैश और बर्न' (कर्तन एवं दहन) प्रकार की कृषि है:

  • किसान भूमि के एक टुकड़े को साफ़ करके अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए अनाज तथा अन्य खाद्य फसलें उगाते हैं।
  • यह आदिकालीन औज़ारों (कुदाल, दाओ, खुदाई करने वाली छड़ी) और परिवार/समुदाय के श्रम से की जाती है, तथा यह मानसून, मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता और अन्य पर्यावरणीय दशाओं की अनुकूलता पर निर्भर करती है।
  • जब मिट्टी अपनी उर्वरता खो देती है, तो किसान भूमि के नए टुकड़े पर चले जाते हैं — जिससे प्रकृति पुरानी भूमि की उर्वरता पुनः स्थापित कर लेती है।

इस स्थानांतरी कृषि को विभिन्न स्थानीय नामों से जाना जाता है — पूर्वोत्तर में 'झूम' (jhumming), तथा भारत और विश्व भर में अनेक अन्य नामों से।

गहन जीविका कृषि

गहन जीविका कृषि (intensive subsistence farming) उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ भूमि पर जनसंख्या का दबाव अधिक है:

  • यह श्रम-प्रधान होती है, जिसमें अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए जैव-रासायनिक निवेशों (उर्वरकों) की अधिक मात्रा और सिंचाई का उपयोग किया जाता है।
  • चूँकि जोत के आकार छोटे होते हैं ('उत्तराधिकार के अधिकार' के कारण भूमि निरंतर पीढ़ियों में बँटती रहती है), इसलिए किसान सीमित भूमि से अधिकतम उत्पादन लेते हैं।

मुख्य बिंदु: आदिकालीन जीविका कृषि प्रकृति पर निर्भर करती है और भूमि बदलती रहती है; गहन जीविका कृषि उसी छोटे टुकड़े पर बनी रहती है और अधिक श्रम व निवेशों का उपयोग करती है।

वाणिज्यिक कृषि और रोपण कृषि

वाणिज्यिक कृषि (commercial farming) का उद्देश्य बाज़ार में बिक्री के लिए फसलें उगाना है:

  • इसमें अधिक उत्पादकता प्राप्त करने के लिए आधुनिक निवेशों — उन्नत किस्म के (HYV) बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक तथा पीड़कनाशी — का उपयोग होता है। (जो एक क्षेत्र में वाणिज्यिक है वह दूसरे में जीविका कृषि हो सकती है — जैसे पंजाब में चावल वाणिज्यिक है परंतु ओडिशा में जीविका।)

रोपण कृषि (plantation) वाणिज्यिक कृषि का एक विशेष प्रकार है:

  • इसमें एक बड़े क्षेत्र पर एक ही फसल उगाई जाती है, जिसमें पूँजी-प्रधान निवेशों और प्रवासी श्रमिकों का उपयोग होता है।
  • चाय, कॉफ़ी, रबड़, गन्ना और केला महत्वपूर्ण रोपण फसलें हैं। इसका सारा उत्पाद उद्योगों में कच्चे माल के रूप में प्रयोग होता है, इसलिए रोपण क्षेत्रों, कारख़ानों और बाज़ारों को जोड़ने वाला सुविकसित परिवहन और संचार का जाल आवश्यक है।

प्रश्न और उत्तर

प्र1. आदिकालीन जीविका कृषि क्या है?

उत्तर: आदिकालीन जीविका कृषि एक स्लैश और बर्न (कर्तन एवं दहन) प्रकार की कृषि है जो भूमि के छोटे टुकड़ों पर आदिकालीन औज़ारों और परिवार/समुदाय के श्रम से की जाती है। यह मानसून और मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता पर निर्भर करती है। जब मिट्टी उर्वरता खो देती है, तो किसान नए टुकड़े पर चले जाते हैं। इसे पूर्वोत्तर में झूम तथा अन्यत्र दूसरे नामों से पुकारा जाता है।

प्र2. गहन जीविका कृषि वाणिज्यिक कृषि से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर: गहन जीविका कृषि अधिक जनसंख्या दबाव के अंतर्गत छोटे टुकड़ों पर की जाती है, जिसमें परिवार के लिए अधिकतम उत्पादन हेतु अधिक श्रम, उर्वरक और सिंचाई का उपयोग होता है। वाणिज्यिक कृषि में फसलें मुख्यतः बाज़ार में बिक्री के लिए उगाई जाती हैं, जिसमें आधुनिक निवेशों (HYV बीज, उर्वरक, पीड़कनाशी) का उपयोग होता है। एक ही फसल किसी क्षेत्र में वाणिज्यिक और किसी अन्य में जीविका कृषि हो सकती है।

प्र3. रोपण कृषि क्या है? किन्हीं तीन रोपण फसलों के नाम बताइए।

उत्तर: रोपण कृषि वाणिज्यिक कृषि का एक प्रकार है जिसमें एक बड़े क्षेत्र पर एक ही फसल उगाई जाती है, जिसमें पूँजी-प्रधान निवेशों और प्रवासी श्रमिकों का उपयोग होता है, और उत्पाद औद्योगिक कच्चे माल के रूप में प्रयोग होता है। तीन रोपण फसलें हैं चाय, कॉफ़ी और रबड़ (गन्ना और केला भी)।