वैश्वीकरण और इसका लंबा इतिहास
वैश्वीकरण (globalisation) — किसी देश की अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण — भारतीय कृषि के लिए पूर्णतः नया नहीं है। औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत, भारतीय किसानों को पहले से ही विदेशी बाजारों के लिए कपास, नील, अफीम, चाय और जूट जैसी फसलें उगाने के लिए बाध्य किया जाता था, और प्रायः ब्रिटिश उद्योग की सेवा हेतु उनका शोषण किया जाता था।
1991 के आर्थिक सुधारों के बाद, वैश्वीकरण ने गति पकड़ी, जिसने भारतीय कृषि को विश्व बाजार के लिए खोल दिया — जिससे अवसर और चुनौतियाँ दोनों आईं।

आरेख के अंग्रेज़ी लेबलों के हिन्दी अर्थ:
| English (in image) | हिन्दी |
|---|---|
| Globalisation and Indian agriculture | वैश्वीकरण और भारतीय कृषि |
| Challenge | चुनौती |
| Competition from subsidised developed-country agriculture | अनुदानित विकसित-देश कृषि से प्रतिस्पर्धा |
| Small holdings | छोटी जोतें |
| Way forward | आगे का रास्ता |
| Gene revolution (biotechnology) | जीन क्रांति (जैव प्रौद्योगिकी) |
| Organic farming (chemical-free) | जैविक कृषि (रसायन-मुक्त) |
| Food security and fair prices | खाद्य सुरक्षा और उचित मूल्य |
प्रतिस्पर्धा की चुनौती
वैश्वीकरण के अंतर्गत, भारतीय किसानों को विकसित देशों की अत्यधिक अनुदानित (subsidised) कृषि से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है:
- विकसित राष्ट्र अपने किसानों को भारी अनुदान (subsidy) देते हैं, जिससे वे अपनी उपज सस्ते में बेच सकते हैं। छोटी जोतों और कम संसाधनों वाले भारतीय किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो जाता है।
- सस्ती आयातित उपज भारतीय किसानों को मिलने वाले मूल्यों को घटा सकती है।
यही कारण है कि उत्पादकता, गुणवत्ता और अवसंरचना में सुधार करके भारतीय कृषि को सफल और प्रतिस्पर्धी बनाने की आवश्यकता है।
आगे का मार्ग — जीन क्रांति और जैविक कृषि
अनेक रणनीतियाँ भारतीय कृषि को टिकाऊ बने रहते हुए वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने में सहायता कर सकती हैं:
- 'जीन क्रांति (gene revolution)' — बेहतर, अधिक उपज देने वाली और कीट-प्रतिरोधी फसल किस्में विकसित करने के लिए आनुवंशिक अभियांत्रिकी और जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग।
- जैविक कृषि (organic farming) — रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बिना की जाने वाली कृषि, जिसकी माँग बढ़ रही है, जो पर्यावरण-अनुकूल है और अच्छे मूल्य दिलाती है।
- किसानों को बेहतर बीज, भंडारण, ऋण, विपणन और उचित मूल्य प्रदान करना, तथा अवसंरचना में सुधार करना।
मुख्य बिंदु: लक्ष्य एक प्रतिस्पर्धी किंतु टिकाऊ भारतीय कृषि है जो देश की खाद्य सुरक्षा (food security) भी सुनिश्चित करे — सभी के लिए, हर समय पर्याप्त भोजन।
प्रश्न और उत्तर
प्र1. औपनिवेशिक काल में भी वैश्वीकरण ने भारतीय कृषि को किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर: वैश्वीकरण नया नहीं है: औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत, भारतीय किसानों को विदेशी (मुख्यतः ब्रिटिश) बाजारों के लिए कपास, नील, अफीम, चाय और जूट जैसी व्यावसायिक फसलें उगाने के लिए बाध्य किया जाता था। किसानों का प्रायः शोषण किया जाता था, वे अपने भोजन के बजाय निर्यात के लिए नकदी फसलें उगाते थे।
प्र2. वैश्वीकरण भारतीय किसानों के समक्ष कौन-सी मुख्य चुनौती प्रस्तुत करता है?
उत्तर: मुख्य चुनौती विकसित देशों की अत्यधिक अनुदानित कृषि से प्रतिस्पर्धा है। ये देश अपने किसानों को भारी अनुदान देते हैं, जो फिर सस्ते में बेच सकते हैं, जबकि छोटी जोतों और कम संसाधनों वाले भारतीय किसान प्रतिस्पर्धा में संघर्ष करते हैं। इससे भारतीय किसानों को मिलने वाले मूल्य घट सकते हैं।
प्र3. वैश्वीकरण के अंतर्गत भारतीय कृषि को प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ बनाने के उपाय सुझाइए।
उत्तर: भारत 'जीन क्रांति' (बेहतर, कीट-प्रतिरोधी फसलों के लिए आनुवंशिक अभियांत्रिकी) अपना सकता है, जैविक कृषि (रसायन-मुक्त, पर्यावरण-अनुकूल और माँग में) को बढ़ावा दे सकता है, तथा किसानों को बेहतर बीज, ऋण, भंडारण, विपणन और उचित मूल्य के साथ-साथ बेहतर अवसंरचना प्रदान कर सकता है — साथ ही खाद्य सुरक्षा की रक्षा करते हुए।